शनिवार, 27 जून 2026
‘करोंजा’ पहाड़ के जंगलों का ‘काला मोती’
इसकी मिठास में बसी है पहाड़ के बचपन की पूरी एक अनोखी दुनिया
गुमनामी के अंधेरे में खो गया पीढ़ियों को मिठास बांटने वाला करोंजा
आधुनिकता की चकाचौंध में पहाड़ की विरासत जंगलों में पड़ी है लावारिस
देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल उसके मंदिरों, लोकगीतों और पर्व-त्योहारों में ही नहीं बसती, बल्कि उन जंगली फलों में भी जीवित है, जिन्होंने यहां की कई पीढ़ियों के बचपन को स्वाद और यादों से भर दिया। इन्हीं अनमोल प्राकृतिक उपहारों में एक नाम है करोंजा का। छोटा-सा, काले रंग का यह मीठा जंगली फल आज भी उत्तराखंड के जंगलों, खेत-खलिहानों और पहाड़ी ढलानों में कहीं-कहीं दिखाई दे जाता है, लेकिन इसकी पहचान अब धीरे-धीरे नई पीढ़ी की स्मृतियों से मिटती जा रही है।
एक समय था जब गर्मियों के दिनों में गांव के बच्चे सुबह से ही करोंजा के पेड़ों की तलाश में निकल पड़ते थे। स्कूल की छुट्टी होते ही बस्ता घर के किसी कोने में फेंका जाता और फिर दोस्तों की टोली जंगलों और पगडंडियों की ओर दौड़ पड़ती थी। किस पेड़ पर करोंजा सबसे ज्यादा लगा है, किसकी डालियां फलों से झुकी हुई हैं और किस रास्ते पर सबसे मीठे करोंजा मिलेंगे, इसकी जानकारी बच्चों को किसी नक्शे से नहीं, बल्कि अपने अनुभव और दोस्तों से मिलती थी।
कई बार बच्चे घंटों जंगलों में भटकते, पेड़ों पर चढ़ते और अपनी कमीज या जेबों को करोंजा से भर लेते थे। घर लौटने तक आधे फल रास्ते में ही खा लिए जाते और बाकी घर पर भाई-बहनों के साथ बांटकर खाए जाते थे। करोंजा का स्वाद केवल उसकी मिठास में नहीं था, बल्कि उस आनंद में था जो उसे खोजने और दोस्तों के साथ बांटने में मिलता था।
आज की पीढ़ी के लिए चाकलेट, चिप्स और बाजार के रंग-बिरंगे स्नैक्स बचपन का हिस्सा हैं, लेकिन पहाड़ के बच्चों के लिए कभी करोंजा, हिसालू, काफल, किनगोड़ और बेडू ही सबसे बड़े स्वाद थे। इन फलों को खरीदने के लिए पैसे नहीं लगते थे। प्रकृति ही इनकी सबसे बड़ी दुकान थी और जंगल उसका खुला खजाना।
गांवों के बुजुर्ग बताते हैं कि करोंजा खाने का आनंद किसी मेले से कम नहीं होता था। बच्चे सुबह से शाम तक जंगलों में घूमते, पेड़ों की छांव में बैठकर फल खाते और फिर शाम को हंसी-खुशी घर लौट आते थे। यही पहाड़ का असली बचपन था, जो प्रकृति के साथ सांस लेता था।
स्थानीय लोगों के अनुसार करोंजा केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। इसमें प्राकृतिक मिठास, विटामिन और कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। पहाड़ के लोग इसे शरीर को ऊर्जा देने वाला फल मानते रहे हैं। जंगलों में बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के उगने वाला यह फल पूरी तरह प्राकृतिक और शु( होता है।
पलायन, बदलती जीवनशैली और जंगलों से बढ़ती दूरी ने करोंजा जैसे जंगली फलों को भी प्रभावित किया है। गांव खाली हो रहे हैं, बच्चों का प्रकृति से रिश्ता कमजोर पड़ रहा है और मोबाइल की दुनिया ने जंगलों की उन पगडंडियों को पीछे छोड़ दिया है, जहां कभी करोंजा की तलाश में बच्चों की टोलियां घूमती थीं। आज स्थिति यह है कि शहरों में रहने वाले कई पहाड़ी परिवारों के बच्चे करोंजा का नाम तक नहीं जानते। वह यह भी नहीं जानते कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का बचपन किन जंगली फलों की मिठास से भरा हुआ था।
करोंजा सिर्फ एक जंगली फल नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। यह हमें उस दौर की याद दिलाता है जब पहाड़ के लोग प्रकृति के साथ जीते थे और जंगल उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। आज जरूरत इस बात की है कि करोंजा जैसे जंगली फलों का संरक्षण किया जाए, इनके पौधों को बचाया जाए और नई पीढ़ी को इनके बारे में बताया जाए। स्कूलों और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को अपनी प्राकृतिक धरोहर से जोड़ने की पहल होनी चाहिए।
क्योंकि जिस दिन पहाड़ के जंगलों से करोंजा की मिठास पूरी तरह खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक फल नहीं खोएगा, बल्कि पहाड़ के बचपन की हंसी, जंगलों की खुशबू और हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का एक अनमोल अध्याय भी हमेशा के लिए खो जाएगा। करोंजा की मिठास दरअसल पहाड़ की आत्मा की मिठास है, जिसे बचाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
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