मंगलवार, 7 जुलाई 2026
पहाड़ की ‘कौणी’ बदलेगी ‘तकदीर’
पहाड़ की थाली का भूला-बिसरा स्वाद फिर बना सेहत का सितारा
कभी हर गांव के खेतों में लहलहाती थी कौणी, अब बना सुपरफूड
किसानों के लिए बन सकती है आय का जरिया,बाजार में बढ़ी मांग
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी कौणी केवल एक अनाज नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। बरसात के मौसम में खेतों में लहलहाती कौणी की बालियां और सर्दियों में इसकी खीर, भात व रोटी हर घर की रसोई की पहचान हुआ करती थीं। समय के साथ आधुनिक खेती, पलायन और बदलती खानपान की आदतों ने इस पारंपरिक फसल को हाशिए पर पहुंचा दिया। लेकिन अब स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने कौणी को फिर से चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। आज के दौर में यदि कौणी की खेती को प्रोत्साहन दिया जाए और इसे संगठित बाजार से जोड़ा जाए तो यह उत्तराखंड के पर्वतीय किसानों के लिए आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार बन सकती है।
कौणी पहाड़ की जलवायु के अनुकूल पारंपरिक मोटा अनाज है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कम पानी, कम उर्वरक और सीमित संसाधनों में भी अच्छी पैदावार देती है। यही कारण है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वर्षों तक यह किसानों की पसंदीदा फसल रही। जलवायु परिवर्तन और घटते जलस्रोतों के दौर में कृकृषि विशेषज्ञ अब कौणी जैसी फसलों को भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार मान रहे हैं। कौणी में प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और कई आवश्यक खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे स्वास्थ्यवर्धक आहार माना जाता है। चिकित्सकों के अनुसार यह मधुमेह, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए भी लाभकारी हो सकती है।
पहाड़ों में आज भी कई परिवार कौणी की खीर, भात, दलिया और रोटी को पारंपरिक भोजन के रूप में तैयार करते हैं। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन, खेती में घटती रुचि और जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने कौणी की खेती पर भी असर डाला, जिन गांवों में कभी बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती थी, वहां अब यह सीमित क्षेत्रों तक सिमट गई है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युवाओं को आधुनिक तकनीक, बाजार और उचित मूल्य उपलब्ध कराया जाए तो कौणी की खेती फिर से गांवों में रोजगार का माध्यम बन सकती है। देश-विदेश में मोटे अनाजों की बढ़ती मांग का लाभ उत्तराखंड को भी मिल सकता है। आर्गेनिक उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कौणी अब हेल्थ फूड के रूप में अपनी पहचान बना रही है। बड़े शहरों के सुपरमार्केट, आनलाइन प्लेटफार्म और जैविक उत्पादों की दुकानों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार कौणी की ब्रांडिंग, प्रोसेसिंग और विपणन पर विशेष ध्यान दे तो यह किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पलायन रोकने में भी सहायक साबित हो सकती है। कौणी केवल एक फसल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। पहाड़ की पारंपरिक कृकृषि व्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बदलते समय में जब दुनिया रसायन मुक्त और पौष्टिक भोजन की ओर लौट रही है, तब कौणी जैसी पारंपरिक फसलें उत्तराखंड की नई पहचान बन सकती हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कौणी को पर्यटन, होमस्टे और स्थानीय व्यंजनों से जोड़ा जाए तो यह राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
बता दें कि जिस कौणी को कभी पहाड़ की मजबूरी समझकर लोग छोड़ने लगे थे, वही आज स्वास्थ्य और पोषण का प्रतीक बनकर नई पहचान हासिल कर रही है। यदि नीति, बाजार और किसानों का साथ मिला तो यह पारंपरिक फसल केवल खेतों में ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था और पहचान में भी फिर से मजबूती के साथ लौट सकती है।
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