गुरुवार, 2 जुलाई 2026

धिंगारू: हरी चादर पर सजे ‘लाल मोती’

धिंगारू को कहते हैं पहाड़ के गांवों में बचपन की मीठी याद धिंगारू डालियों पर टंगी होती थी बचपन की लाल मुस्कान बचपन में धिंगारू के लाल फल बन जाते थे सबसे बड़ी दौलत देहरादून। पहाड़ के बच्चों का बचपन कभी बाजारों में नहीं बिकता था। वह जंगलों की पगडंडियों, सीढ़ीनुमा खेतों, गाड़-गधेरों और पेड़ों की डालियों पर पलता था। जेब में पैसे कम होते थे, लेकिन प्रकृति की दौलत इतनी थी कि हर मौसम अपने साथ कोई न कोई मिठास लेकर आता था। उन्हीं मिठासों में एक नाम है दृधिंगारू। गर्मियों की तपती दोपहर में जब पहाड़ की ढलानों पर हवा धीरे-धीरे बहती है, तब गांवों के आसपास और जंगलों के किनारों पर खड़े धिंगारू के पेड़ लाल-लाल फलों से भर उठते हैं। दूर से देखने पर लगता है, मानो किसी ने हरी चादर पर लाल मोती टांक दिए हों। शायद यही वजह है कि पहाड़ के निचले इलाकों में इसे प्यार से पहाड़ी सेब कहा जाता है। एक समय था जब स्कूल से लौटते बच्चों के कदम सीधे घर की ओर नहीं, बल्कि धिंगारू के पेड़ों की ओर मुड़ जाते थे। कोई पेड़ की शाखा पकड़कर ऊपर चढ़ जाता, कोई नीचे खड़ा होकर गिरते फलों को अपनी कमीज में समेट लेता। फिर शुरू होता खट्टे-मीठे स्वाद का उत्सव। एक फल मुंह में जाता, दूसरा जेब में और तीसरा किसी दोस्त के हिस्से में। उस समय न किसी को विटामिन का पता था और न एंटीआक्सीडेंट का। बच्चों के लिए धिंगारू सिर्फ एक फल नहीं था, बल्कि गर्मियों की छुट्टियों का साथी, दोस्ती का स्वाद और बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक था। आज जब पहाड़ के अनेक गांव सूने हो रहे हैं और बच्चों की दुनिया मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट गई है, तब धिंगारू के पेड़ भी जैसे किसी का इंतजार कर रहे हैं। वह अब भी हर साल लाल फलों से लद जाते हैं, लेकिन उन्हें तोड़ने वाले छोटे-छोटे हाथ कम होते जा रहे हैं। उनकी शाखाओं पर अब भी हवा गुनगुनाती है, लेकिन बच्चों की खिलखिलाहट पहले जैसी नहीं सुनाई देती। धिंगारू को स्वास्थ्य का वरदान माना गया है। कहा जाता है कि यह फल हृदय को स्वस्थ रखने, पाचन को बेहतर बनाने और शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देने में सहायक होता है। इसमें पाए जाने वाले प्राकृतिक एंटीआक्सीडेंट शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मददगार माने जाते हैं। शायद इसी कारण पहाड़ के बुजुर्ग इसे केवल फल नहीं, बल्कि प्रकृति की दवा भी कहते हैं। लेकिन धिंगारू की सबसे बड़ी विशेषता उसके औषधीय गुण नहीं, बल्कि उसकी भावनात्मक विरासत है। यह फल उस दौर की याद दिलाता है, जब जीवन सरल था, खुशियां छोटी थीं और प्रकृति ही सबसे बड़ा खिलौना और सबसे बड़ा बाजार हुआ करती थी। धिंगारू का स्वाद आज भी उन लोगों की स्मृतियों में बसा है, जो रोज़गार की तलाश में पहाड़ छोड़कर शहरों में बस गए। जब कभी गांव की याद आती है, तो आंखों के सामने सबसे पहले किसी पहाड़ी ढलान पर खड़ा वह पेड़ उभरता है, जिसकी शाखाओं पर लाल-लाल धिंगारू चमक रहे होते हैं। दरअसल, धिंगारू केवल एक फल नहीं है। वह पहाड़ के बचपन की लाल मुस्कान है, जो हर गर्मी में चुपचाप खिल उठती है और हमें याद दिलाती है कि प्रकृति ने हमारी स्मृतियों में कितनी मिठास घोल रखी है। शायद इसलिए पहाड़ के लोग कहते हैंकृजिसने धिंगारू का स्वाद चखा है, उसने पहाड़ के बचपन का एक टुकड़ा अपने भीतर हमेशा के लिए संजो लिया है।

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