शनिवार, 4 जुलाई 2026
विपक्ष ही नहीं ‘अपनों’ से भी घिरी ‘सरकार’
अपने ही सवालों के घेरे में सरकार, नाराज विधायकों ने बढ़ाई भाजपा की चिंता
अधिकारियों की रफ्तार बेलगाम, माननीयों की ही नहीं सुन रही ब्यूरोक्रेसी
जनता की उम्मीदें व फाइलों में दबे विकास, जमीनी हकीकत से बेबस होते विधायक
चुनावी जीत का भारी बोझ, दूसरी पारी में विपक्ष से ज्यादा खुद की परछाईं से चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर उठ रहे असंतोष के स्वर हैं। सरकार के कामकाज को लेकर भाजपा के कई विधायक जिस तरह सार्वजनिक मंचों से अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, उसने यह संकेत दे दिया है कि सब कुछ उतना सहज नहीं है, जितना सत्ता के गलियारों से दिखाने की कोशिश की जा रही है। सत्ता में दूसरी बार वापसी के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही अपेक्षाओं का बोझ है। विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच हैं, जहां उन्हें विकास कार्यों, सड़कों, पेयजल, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर जवाब देना पड़ रहा है। लेकिन जब जनप्रतिनिधि स्वयं यह कहने लगें कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही, अधिकारी उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे और योजनाएं फाइलों में अटक रही हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर बढ़ती दूरी का संकेत है।
उत्तराखंड की राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है, जब सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ स्वर बुलंद किए हों। राज्य गठन के बाद लगभग हर सरकार को नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल के संकट का सामना करना पड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह असंतोष ऐसे समय सामने आ रहा है, जब विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। भाजपा की राजनीतिक ताकत हमेशा उसके मजबूत संगठन और अनुशासित कार्यशैली को माना जाता रहा है। लेकिन यदि विधायक लगातार सार्वजनिक रूप से असंतोष जताते रहे, तो विपक्ष को सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने का मजबूत आधार मिल जाएगा। कांग्रेस पहले ही यह कह रही है कि जब सत्ता पक्ष के विधायक ही संतुष्ट नहीं हैं, तो आम जनता की परेशानियों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
वास्तविक चिंता इस बात की है कि क्या सरकार और संगठन के बीच संवाद की कमी बढ़ रही है? क्या नौकरशाही जनप्रतिनिधियों पर हावी होती जा रही है? और क्या चुनाव से पहले विधायकों की अपेक्षाओं और सरकार की प्राथमिकताओं के बीच दूरी बढ़ती जा रही है? राजनीति में असंतोष तब तक सामान्य माना जाता है, जब तक वह बंद कमरों तक सीमित रहे। लेकिन जब नाराजगी सार्वजनिक मंचों से व्यक्त होने लगे, तो वह एक राजनीतिक संदेश बन जाती है। उत्तराखंड में आज यही संदेश सुनाई दे रहा है। भाजपा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। विपक्ष की आलोचना से अधिक चिंता उन आवाजों की होनी चाहिए, जो पार्टी के भीतर से उठ रही हैं। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष के हमले चुनाव नहीं हराते, लेकिन अपने ही लोगों की नाराजगी सत्ता की राह को कठिन जरूर बना देती है।
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