सोमवार, 20 जुलाई 2026
सात मोड़ पर ‘सियासत’ सात सौ पर ‘सन्नाटा’
जहाँ तक आराम से दौड़ सकती हैं एसी गाड़ियाँ, कैमरे व बयानबाजी का पाखंड सिर्फ वहीं तक
जनता ने नेताओं को फर्श से अर्श पर पहुँचाया, बदले में मिलीं सिर्फ अधूरी सड़कें
उत्तराखंड का हाल, जहां सड़क नहीं पहुंची, वहां राजनीति भी नहीं पहुंचती
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का भी अपना एक भूगोल है। यह भूगोल नक्शे से नहीं, बल्कि सड़कों से तय होता है। जहां तक एसी वाली गाड़ियां आराम से पहुंच जाती हैं, वहां धरना भी होता है, प्रदर्शन भी होता है, कैमरे भी पहुंचते हैं और नेताओं के बयान भी। लेकिन जहां पहुंचने के लिए सात सौ मोड़ पार करने पड़ें, जहां सड़क आज भी अधूरी हो, जहां एंबुलेंस नहीं पहुंचती और मरीजों को चारपाई पर ढोना पड़ता हो, वहां न कोई आंदोलन दिखाई देता है और न कोई राजनीतिक संवेदना।
प्रदेश बनने के बाद से लेकर आज तक पुरोला की जनता ने हर दल और हर चेहरे पर भरोसा किया। कभी कांग्रेस को मौका दिया, कभी भाजपा को। मालामाल नेताओं को जनता ने वोट देकर विधानसभा और संसद तक पहुंचाया। किसी को विधायक बनाया, किसी को सांसद। चुनाव दर चुनाव उम्मीद यही रही कि अब शायद गांव तक सड़क पहुंचेगी, अस्पताल बेहतर होंगे, पलायन रुकेगा और पहाड़ की जिंदगी आसान होगी। नेता बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, चुनावी नारे बदलते रहे, मगर पुरोला के कई गांवों की तस्वीर नहीं बदली। जिन नेताओं को जनता ने सिर आंखों पर बैठाया, वह राजधानी की राजनीति में रम गए। उनके परिवार शहरों में बस गए। बच्चों की पढ़ाई महानगरों में हुई, इलाज बड़े अस्पतालों में हुआ और सुविधाओं से भरपूर जीवन उनकी नई पहचान बन गया। दूसरी ओर, जिन लोगों के वोट से यह राजनीतिक सफर तय हुआ, वह आज भी सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हाल के दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में सड़क और प्रदर्शन दोनों चर्चा का विषय बने हैं। लेकिन एक सवाल बार-बार उठता हैकृक्या आंदोलन भी अब सड़क देखकर तय होंगे? जहां तक आरामदायक सड़क है, वहां प्रदर्शन करना आसान है। मीडिया पहुंच जाएगा, कैमरे लग जाएंगे, सोशल मीडिया पर वीडियो बन जाएंगे और कुछ घंटे बाद सब अपने-अपने घर लौट जाएंगे। लेकिन प्रदेश के पुरोला जैसे इलाकों में, जहां गांव तक पहुंचने के लिए सैकड़ों मोड़ और कई किलोमीटर पैदल रास्ता तय करना पड़ता है, वहां कौन जाएगा? क्या किसी बड़े नेता ने कभी दोणी जैसे दूरस्थ गांवों तक जाकर वहां की वास्तविक स्थिति देखने की कोशिश की?
बता दें कि पुरोला क्षेत्र का दोणी गांव केवल एक गांव नहीं, बल्कि उस विकास माडल पर सवाल है, जिसमें राजधानी चमकती है लेकिन सीमांत अंधेरे में रह जाता है। बताया जाता है कि आज भी गांव के लोग सड़क के अभाव में गंभीर कठिनाइयों का सामना करते हैं। बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की तकलीफें चुनावी भाषणों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन समाधान का नहीं। जब कोई मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाता, तब वह केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरे सिस्टम की असफलता होती है।
आज का दौर सोशल मीडिया का है। नेताओं के वीडियो वायरल होते हैं। कहीं पेड़ के चारों ओर घूमकर रील बनाई जाती है, कहीं विकास के दावे कैमरे के सामने दोहराए जाते हैं। लेकिन पहाड़ की असली रील कोई कैमरा रिकार्ड नहीं करता। वह रील उस मरीज की है जिसे चार लोग कंधे पर उठाकर सड़क तक ला रहे हैं। वह रील उस बुजुर्ग की है जो इलाज के लिए घंटों सफर करता है। वह रील उस छात्र की है जिसे पढ़ाई के लिए गांव छोड़ना पड़ता है। वह रील उस मां की है जो बारिश में फिसलते रास्तों पर राशन ढोती है। यह रील वायरल नहीं होती, क्योंकि यहां कैमरे कम और तकलीफें ज्यादा हैं।
कल्पना कीजिए, यदि दोणी गांव तक अच्छी सड़क होती, यदि वहां एसी कारें पहुंच सकतीं, यदि राजनीतिक काफिले आसानी से पहुंच जाते, तो शायद वहां भी मंच सजता, नारे लगते, फोटो खिंचती और सरकार पर दबाव बनाने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते। शायद किसी राष्ट्रीय नेता का काफिला रोकने की घोषणा भी होती। शायद संसद में आवाज उठाने की चेतावनी भी दी जाती। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यह गांव सात मोड़ों पर नहीं, सात सौ मोड़ों के पार है। वहां पहुंचना कठिन है, इसलिए वहां की पीड़ा भी राजनीति की प्राथमिकता नहीं बन पाती।
उत्तराखंड सरकार लगातार विकसित उत्तराखंड, अंतिम छोर तक विकास और सड़क हर गांव तक जैसे दावे करती रही है। कई सड़क परियोजनाओं की घोषणाएं भी हुई हैं। लेकिन यदि राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी सीमांत गांव सड़क के लिए तरस रहे हैं, तो सवाल केवल किसी एक गांव का नहीं, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा का है। क्या विकास केवल चारधाम मार्ग तक सीमित रहेगा? क्या राजधानी और पर्यटन क्षेत्रों की चमक ही विकास का पैमाना होगी?क्या सीमांत क्षेत्रों का नागरिक केवल चुनाव के समय याद किया जाएगा?
प्रदेश में पुरोला, दोणी और ऐसे ही अनेक गांव अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होंगे। उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनकी सड़क कब बनेगी, एंबुलेंस कब पहुंचेगी, अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता कब आसान होगा और उनके बच्चों को भी वही सुविधाएं कब मिलेंगी जो राजधानी के लोगों को सहज उपलब्ध हैं। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा राजधानी की चौड़ी सड़कों पर नहीं, बल्कि उन सात सौ मोड़ों के पार होती है जहां आज भी विकास पहुंचने का इंतजार कर रहा है।
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