गुरुवार, 16 जुलाई 2026

पहाड़ में ‘कुयेड़ी’ है जादुई ‘स्वप्नलोक’

पहाड़ की सुबह का जादुई स्वप्नलोक, प्रकृति का ध्यानमग्न रूप जब देवदार और बुरांश के जंगलों पर छाता है प्रकृति का जादू पहाड़ की सुबह का रहस्यमयी सौंदर्य जो अब होता जा रहा दुर्लभ देहरादून। पहाड़ की सुबह का अपना एक अलग ही जादू होता है। सूरज निकलने से पहले जब ऊँचे पर्वत की ऊपरी धार और चोटियाँ सफेद धुंध की चादर से ढक जाती हैं, तो स्थानीय लोग कहते हैंकृआज कुयेड़ी छाई छ। यह केवल धुंध नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, लोकभाषा और प्रकृति का ऐसा हिस्सा है, जो सदियों से पहाड़ के जीवन को आकार देता आया है। आज भी बरसात और सर्दियों की सुबह जब कुयेड़ी घाटियों से उठकर डांडि-कांठ्यूँ को अपने आगोश में ले लेती है, तो पूरा वातावरण किसी स्वप्नलोक जैसा दिखाई देता है। दूर-दूर तक फैले देवदार, बुरांश और बांज के जंगल धुंध में ऐसे खो जाते हैं, मानो प्रकृति स्वयं ध्यानमग्न हो गई हो। गढ़वाली और कुमाऊँनी बोली में कुयेड़ी का अर्थ है घना कोहरा या धुंध। लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह केवल मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति का एक जीवंत रूप है। सुबह-सुबह खेतों में काम करने वाले किसान कहते हैं कि यदि कुयेड़ी देर तक बनी रहे तो दिन में मौसम सुहावना रहने की संभावना रहती है। वहीं कभी-कभी यही कुयेड़ी तेज बारिश का संकेत भी मानी जाती है। पहाड़ के ऊँचे डांडि-कांठ्यूँ पर जब कुयेड़ी उतरती है, तो ऐसा लगता है जैसे बादल धरती पर आ गए हों। पहाड़ की चोटियाँ कभी दिखाई देती हैं, तो अगले ही पल पूरी तरह गायब हो जाती हैं। सूरज की पहली किरण जब इस धुंध को चीरती हुई निकलती है, तो पूरा आकाश सुनहरे रंग में रंग जाता है। यही दृश्य हर साल हजारों पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को पहाड़ की ओर खींच लाता है। गढ़वाली और कुमाऊँनी लोकगीतों में कुयेड़ी का विशेष स्थान है। लोकगीतों में प्रेमिका अपने प्रिय का इंतजार करते हुए कहती है कि डांडि-कांठ्यूँ में छाई कुयेड़ी रास्ता रोक रही है। कई गीतों में यह विरह का प्रतीक है तो कहीं मिलन का संदेश लेकर आती है। स्थानीय लोककथाओं में भी धुंध को देवताओं की उपस्थिति और प्रकृति की पवित्रता से जोड़कर देखा गया है। पहाड़ों में कुयेड़ी केवल सुंदरता नहीं लाती, बल्कि खेती के लिए भी महत्वपूर्ण होती है। यह वातावरण में नमी बनाए रखती है। फसलों को अत्यधिक तापमान से बचाती है। जंगलों और घास के मैदानों में प्राकृतिक नमी बनाए रखने में मदद करती है। कई जंगली पौधों और औषधीय वनस्पतियों के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले बरसात और सर्दियों में कई-कई दिनों तक डांडि-कांठ्यूँ कुयेड़ी से ढके रहते थे। लेकिन अब मौसम में बदलाव साफ दिखाई देने लगा है। जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और बढ़ते तापमान के कारण धुंध बनने का प्राकृतिक चक्र भी प्रभावित हो रहा है। कई क्षेत्रों में पहले जैसी घनी कुयेड़ी अब कम दिखाई देती है। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि जंगलों का संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में यह प्राकृतिक दृश्य केवल तस्वीरों तक सीमित हो सकता है। पहाड़ में बर्फबारी और फूलों की घाटी जितनी लोकप्रिय है, उतनी ही आकर्षक कुयेड़ी से ढकी पहाड़ों की सुबह भी हो सकती है। यदि राज्य सरकार और पर्यटन विभाग इस प्राकृतिक धरोहर को मार्निंग मिस्ट टूरिज्म या क्लाउड व्यू ट्रेल जैसी अवधारणाओं से जोड़ें, तो यह ग्रामीण पर्यटन को नई दिशा दे सकती है। स्थानीय होमस्टे, ट्रैकिंग मार्ग और गाँवों की अर्थव्यवस्था को भी इसका लाभ मिल सकता है। पहाड़ की पहचान केवल हिमालय, मंदिर और नदियाँ नहीं हैं। डांडि-कांठ्यूँ में उतरती कुयेड़ी भी पहाड़ की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। जब अगली बार किसी पहाड़ी गाँव की सुबह कुयेड़ी में लिपटी दिखाई दे, तो उसे केवल धुंध समझकर आगे न बढ़ जाएँ। वह प्रकृति का एक ऐसा संदेश है, जो हमें याद दिलाता है कि पहाड़ की असली खूबसूरती उसकी सादगी, उसकी लोकसंस्कृति और उसके बदलते मौसम में बसती है।

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