शनिवार, 18 जुलाई 2026

‘पंदेरा’ था पहाड़ का ‘सोशल नेटवर्क’

यहां रिश्तों की मिठास व लोकगीतों की गूंज से बुझती थी प्यास पहाड़ के उसकी कहानी जो कभी था सामाजिक विश्वविद्यालय यहां पहाड़ का मीठा पानी और यहां सजती थी रिश्तों की चौपाल आज नल बुझा रहे हैं प्यास, लेकिन सूख गए रिश्तों के वह झरने देहरादून। पहाड़ में अगर किसी बुजुर्ग से पूछिए कि गांव की सबसे जीवंत जगह कौन-सी थी, तो शायद वह मंदिर, चौपाल या बाजार का नाम न ले। वह मुस्कुराते हुए कहेगाकृपंदेरा। पंदेरा... यानी वह पत्थरों से बना प्राकृतिक जलस्रोत, जहां पहाड़ की छाती से रिसता हुआ मीठा पानी पूरे गांव की प्यास बुझाता था। लेकिन पंदेरा केवल पानी भरने की जगह नहीं था। वह गांव का सामाजिक विश्वविद्यालय था, जहां जीवन बहता था, रिश्ते बनते थे, गीत गूंजते थे और पूरे गांव की धड़कन सुनाई देती थी। सुबह की पहली किरण के साथ सिर पर गागर और कमर पर डलिया लिए महिलाएं पंदेरे की ओर निकल पड़ती थीं। रास्ते भर हंसी-मजाक, लोकगीत और पहाड़ी बोली की मिठास बिखरी रहती थी। कोई अपनी बहू की तारीफ कर रही होती, कोई बेटी की शादी की चिंता साझा करती, तो कोई खेतों की फसल का हाल सुनाती। गांव की आधी खबरें अखबार से पहले पंदेरे पर पहुंच जाती थीं। पंदेरा केवल जलस्रोत नहीं था, बल्कि समाज को जोड़ने वाली अदृश्य डोर था। यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं होता था। अमीर-गरीब का भेद मिट जाता था। सबकी गागर एक ही धार से भरती थी। नई-नवेली बहुओं के लिए पंदेरा गांव को समझने की पहली पाठशाला था। यहीं उन्हें रिश्तों की पहचान मिलती, रीति-रिवाजों की सीख मिलती और गांव की संस्कृति से परिचय होता। बुजुर्ग महिलाओं का अनुभव और युवतियों का उत्साह मिलकर एक ऐसा संसार रचते थे, जिसे किसी किताब में नहीं पढ़ाया जा सकता। पहाड़ के अनेक लोकगीतों में पंदेरा बार-बार आता है। पानी भरती महिलाओं की सामूहिक आवाजें घाटियों में गूंजती थीं। वे गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि दुख-सुख बांटने का माध्यम भी थे। कई प्रेम कहानियों की शुरुआत भी पंदेरे की पगडंडियों से हुई और कई सामाजिक रिश्तों की नींव भी यहीं पड़ी। समय बदला। जल जीवन मिशन और पाइपलाइन गांव-गांव पहुंची। यह विकास की बड़ी उपलब्धि थी। महिलाओं का श्रम कम हुआ, पानी घर तक पहुंचा और जीवन आसान हुआ। लेकिन इस सुविधा के साथ अनजाने में एक सामाजिक विरासत भी पीछे छूट गई। अब गागर की जगह प्लास्टिक की टंकी है। पंदेरे की जगह रसोई का नल है। लोकगीतों की जगह मोबाइल की रिंगटोन है। गांव की खबरें अब सोशल मीडिया से मिलती हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं है जो पंदेरे की बैठकों में होता था। आज उत्तराखंड के हजारों पारंपरिक नौले, धारे और पंदेरे उपेक्षा का शिकार हैं। कहीं झाड़ियां उग आई हैं, कहीं पानी का स्रोत ही सूख गया है। कुछ जगहों पर सीमेंट और निर्माण ने प्राकृतिक जलधाराओं का रास्ता रोक दिया है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि इन पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी पहाड़ में पंदेरा नाम की भी कोई जगह होती थी। जरूर इसके लिए केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी भी जरूरी है। गांव के लोग यदि अपने पंदेरों की सफाई, संरक्षण और पुनर्जीवन का संकल्प लें, तो ये जलस्रोत फिर से जीवित हो सकते हैं। कई गांवों ने यह कर भी दिखाया है। इसके साथ ही, पंदेरे को केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। स्कूलों के बच्चे वहां जाएं, लोकगीत गाए जाएं, पारंपरिक जल संरक्षण की शिक्षा दी जाए और स्थानीय त्योहारों में इन स्थलों का सम्मान हो। क्योंकि पहाड़ का पंदेरा सिर्फ पत्थरों के बीच बहता पानी नहीं था। वह पहाड़ की सामूहिक स्मृति था। वहां से केवल गागरें नहीं भरती थीं, मन भी भरते थे। वहां केवल पानी नहीं बहता था, बल्कि अपनापन, संवाद और संस्कृति भी बहती थी। आज जब हम आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, तब यह याद रखना होगा कि विकास का अर्थ केवल नई सुविधाएं नहीं होता। विकास वह भी है, जिसमें हम अपनी जड़ों को बचाकर आगे बढ़ें। क्योंकि जिस दिन पहाड़ का आखिरी पंदेरा सूख जाएगा, उस दिन केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि पहाड़ की एक पूरी संस्कृति भी इतिहास बन जाएगी।

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