बुधवार, 15 जुलाई 2026
भाजपा के भीतर ‘बगावत के सुर’
सामूहिक इस्तीफों ने खोली संगठन की अंदरूनी दरारें
चुनावी रण से पहले भाजपा के लिए खतरे की घंटी
क्या भाजपा कार्यकर्ता सिर्फ झंडे-डंडे उठाने के लिए!
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारियों के बीच सत्तारूढ़ भाजपा के संगठन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। रुद्रप्रयाग जिले में भाजपा के कई पदाधिकारियों के एक साथ इस्तीफा देने से पार्टी के भीतर सुलग रहा असंतोष अब सार्वजनिक मंच पर आ गया है। इस्तीफा देने वाले नेताओं का सबसे बड़ा आरोप है कि क्या हम सिर्फ झंडे-डंडे उठाने के लिए हैं? भाजपा हमेशा अपने अनुशासित संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं पर गर्व करती रही है। पार्टी का दावा रहा है कि उसका सबसे बड़ा आधार कार्यकर्ता है, न कि केवल बड़े चेहरे। लेकिन रुद्रप्रयाग की घटना ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी ही स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि संगठनात्मक संवाद में कमी का संकेत भी हो सकता है।
इस्तीफा देने वाले नेताओं का आरोप है कि वर्षों तक पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं को अब केवल कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने, झंडे उठाने और नारे लगाने तक सीमित कर दिया गया है। निर्णय लेने का अधिकार कुछ चुनिंदा नेताओं तक सिमट गया है। उनका कहना है कि संगठन में अब मेहनत से ज्यादा नजदीकी का महत्व बढ़ गया है। यदि यह धारणा कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत होती है, तो यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए गंभीर चेतावनी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा का संगठन तेजी से सत्ता-केंद्रित हुआ है। सरकार और संगठन के बीच समन्वय की बात तो होती है, लेकिन कई जिलों में पुराने कार्यकर्ताओं को लगने लगा है कि उनकी भूमिका धीरे-धीरे कम होती जा रही है। चुनाव के समय उनकी याद आती है, लेकिन निर्णयों और नियुक्तियों के समय उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। रुद्रप्रयाग की घटना ने इसी बहस को फिर हवा दे दी है।
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या यह मामला केवल रुद्रप्रयाग तक सीमित रहेगा? या फिर यह असंतोष दूसरे जिलों में भी दिखाई देगा? उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर स्थानीय स्तर की नाराजगी समय रहते संभाल ली जाती रही है, लेकिन यदि कार्यकर्ताओं को यह संदेश गया कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, तो चुनावी वर्ष में इसका असर बूथ स्तर तक दिखाई दे सकता है। भाजपा की चुनावी ताकत हमेशा उसका मजबूत बूथ नेटवर्क रहा है। यही कार्यकर्ता घर-घर जाकर सरकार की उपलब्धियां गिनाते हैं, मतदाताओं तक पहुंचते हैं और चुनावी मशीनरी को गति देते हैं। यदि यही कार्यकर्ता निराश हो जाएं तो किसी भी संगठन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है। चुनाव पोस्टरों और सोशल मीडिया से नहीं, बल्कि बूथ पर खड़े कार्यकर्ताओं के भरोसे जीते जाते हैं।
उत्तराखंड में भाजपा के सामने विपक्ष से पहले अपने कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। कांग्रेस लगातार भाजपा पर सत्ता के अहंकार का आरोप लगाती रही है। अब यदि भाजपा के अपने पदाधिकारी भी संगठनात्मक उपेक्षा की बात करने लगें, तो विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल सकता है। हालांकि भाजपा नेतृत्व की ओर से अब तक इस मामले को लेकर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी के सामने दो विकल्प हैंकृया तो वह इसे कुछ नाराज नेताओं का व्यक्तिगत मामला मानकर आगे बढ़ जाए, या फिर इसे संगठन के लिए चेतावनी मानते हुए संवाद की प्रक्रिया शुरू करे। राजनीतिक अनुभव बताता है कि चुनाव से पहले छोटे दिखने वाले असंतोष कई बार बड़े संकट का रूप ले लेते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में कार्यकर्ता हमेशा किसी भी दल की रीढ़ रहे हैं। भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों दलों ने कठिन दौर में कार्यकर्ताओं के दम पर ही अपनी राजनीतिक जमीन बचाई है। ऐसे में यदि किसी दल के कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से यह कहने लगें कि उन्हें केवल ष्झंडे-डंडे उठानेष् तक सीमित कर दिया गया है, तो यह केवल संगठन का नहीं, नेतृत्व शैली का भी सवाल बन जाता है। रुद्रप्रयाग की घटना का राजनीतिक संदेश दूर तक जाएगा। विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन चुनावी माहौल बनने लगा है। ऐसे समय में सामूहिक इस्तीफे यह संकेत देते हैं कि सत्ता की चमक के पीछे संगठन के भीतर असंतोष की परतें भी मौजूद हैं। यदि इन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो यही परतें चुनावी रणनीति को कमजोर कर सकती हैं।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि संगठन केवल बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं चलता, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं के विश्वास से चलता है जो बिना किसी पद और प्रचार के वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाए रहते हैं। यदि वही कार्यकर्ता एक दिन यह सवाल पूछने लगें कि क्या हम सिर्फ झंडे-डंडे उठाने के लिए हैं? तो समझ लेना चाहिए कि नाराजगी अब बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक चौपाल तक पहुंच चुकी है। अब देखना यह है कि भाजपा नेतृत्व इस घटनाक्रम को साधारण अनुशासनहीनता मानकर नजरअंदाज करता है या इसे संगठन के भीतर बजी खतरे की घंटी समझकर आत्ममंथन करता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में विरोधियों के हमले जितना नुकसान नहीं पहुंचाते, उससे कहीं अधिक नुकसान अपने घर की नाराजगी पहुंचा सकती है।
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