बुधवार, 15 जुलाई 2026
पहाड़ में सूख गए ‘नौले’ मौन हुए ‘धारे’
जलस्रोतों ने सदियों तक गांवों को जिंदा रखा
वह धारे अब कहां गए जहां बसती थी जिंदगी
आज वही खुद लड़ रहे हैं अस्तित्व की लड़ाई
देहरादून। पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवदार और बुग्याल नहीं हैं। यहां की असली जीवनरेखा सदियों से धारे और नौले रहे हैं। यही वह प्राकृतिक जलस्रोत हैं, जिनके आसपास गांव बसे, खेत सींचे गए, पशुधन पला और पहाड़ की संस्कृति विकसित हुई। लेकिन विडंबना यह है कि आज विकास के दावों के बीच पहाड़ की यही जलधाराएं दम तोड़ रही हैं। एक समय था जब गांव की सुबह नौले पर शुरू होती थी। महिलाएं पानी भरते हुए लोकगीत गाती थीं, बच्चे वहीं खेलते थे और बुजुर्ग पत्थर की सीढ़ियों पर बैठकर गांव की चौपाल सजाते थे। नौला केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का केंद्र था। आज अधिकांश नौले सूख चुके हैं, कई कूड़े के ढेर में बदल गए हैं और कुछ केवल इतिहास की किताबों तक सिमटकर रह गए हैं।
गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश गांवों का चयन इस आधार पर होता था कि वहां धारा या नौला उपलब्ध है या नहीं। पहाड़ का वास्तुशिल्प, खेती और जीवनशैली पानी की उपलब्धता के अनुसार विकसित हुई। पत्थरों से बने नौलों का निर्माण इस तरह किया जाता था कि प्राकृतिक जलधारा वर्षों तक सुरक्षित रहे। यह पारंपरिक जल संरक्षण का ऐसा माडल था, जिसकी आज दुनिया भी सराहना करती है।
पहाड़ में पानी का संकट केवल प्यास का संकट नहीं है जहां पानी खत्म हुआ, वहां खेती बंद हुई। खेती बंद हुई तो रोजगार खत्म हुआ। रोजगार खत्म हुआ तो पलायन शुरू हो गया। उत्तराखंड के अनेक गांवों में आज खाली मकान और बंद दरवाजे इस बात की गवाही देते हैं कि पानी का संकट विकास की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। राज्य और केंद्र सरकार समय-समय पर जल संरक्षण, अमृत सरोवर, स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन, मनरेगा और कैचमेंट ट्रीटमेंट जैसी योजनाएं चलाती रही हैं। कई स्थानों पर सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं, लेकिन बड़ी संख्या में धारे और नौले अब भी उपेक्षा का शिकार हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि योजनाएं कागजों में अधिक और धरातल पर कम दिखाई देती हैं।
धारा-नौला केवल जल स्रोत नहीं थे। इनके साथ लोकगीत, लोककथाएं, रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन जुड़ा था। नौलों की नियमित सफाई पूरे गांव की जिम्मेदारी होती थी। आज पाइपलाइन और टैंकरों के दौर में वह सामुदायिक भावना भी कमजोर पड़ गई है। पानी नल तक तो पहुंच गया, लेकिन समाज से जुड़ी वह सांस्कृतिक धारा सूखने लगी। पहाड़ के कई गांवों में स्थानीय युवाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और ग्राम समितियों ने पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का अभियान शुरू किया है। जलागम क्षेत्रों में पौधरोपण, नौलों की सफाई और वर्षा जल संरक्षण के प्रयासों से कई सूखे स्रोत फिर से जीवित हुए हैं। यह बताता है कि यदि सरकार और समाज मिलकर काम करें तो पहाड़ की प्यास बुझाई जा सकती है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें