सोमवार, 20 जुलाई 2026

पहाड़ में ‘सेर’ और ‘पाथा’

जब तराजू नहीं, भरोसा तौलता था सौदा, गांव की अर्थव्यवस्था का आधार था ‘पाथा’ न डिजिटल तराजू थे, न इलेक्ट्रानिक कांटे, फिर भी व्यापार में थी ईमानदारी की मिसाल डिजिटल जमाने ने छीन लिया पहाड़ के ‘सेर-पाथा’ वाला वह आपसी विश्वास देहरादून। आज जब हर दुकान पर डिजिटल मशीनें लगी हैं और वजन ग्रामों में मापा जाता है, तब नई पीढ़ी शायद यह भी नहीं जानती कि कभी उत्तराखंड के पहाड़ों में सेर और पाथा ही व्यापार और जीवन का आधार हुआ करते थे। ये केवल वजन और माप की इकाइयां नहीं थीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक संस्कृति, विश्वास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की पहचान थीं। पहाड़ के गांवों में धान, झंगोरा, मंडुवा, गेहूं, राजमा, गहत, भट्ट और मसूर जैसे अनाज का लेन-देन अक्सर पाथा से होता था। लकड़ी से बना एक विशेष पात्र होता था, जिसे पाथा कहा जाता था। उसमें अनाज भरकर मापा जाता था। किसी ने दो पाथा मंडुवा दिया, किसी ने पांच पाथा गेहूं उधार लिया। गांव की छोटी-बड़ी खरीद-बिक्री का यही सबसे विश्वसनीय तरीका था। उस समय न रसीद होती थी, न बिल। केवल जुबान और भरोसा ही सबसे बड़ा दस्तावेज होता था। जब गांव से लोग कस्बों के बाजार पहुंचते थे, तब वहां सेर का बोलबाला होता था। घी, तेल, गुड़, चीनी, नमक और दालें सेर के हिसाब से खरीदी जाती थीं। दुकानदार लोहे के बाट और तराजू से सामान तौलता था। एक सेर, आधा सेर, पाव और छटांक जैसी इकाइयां हर घर की महिलाओं और किसानों की जुबान पर रहती थीं। आज की पीढ़ी किलो और ग्राम जानती है, लेकिन कभी पूरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था सेर के इर्द-गिर्द घूमती थी। उस दौर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि व्यापार केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं था। दुकानदार जानता था कि सामने वाला ग्राहक उसका पड़ोसी भी है। किसान जानता था कि अगली फसल तक उधार भी मिल जाएगा। यदि किसी के घर शादी होती, तो पूरा गांव अनाज पाथा-पाथा जोड़कर मदद करता। यदि किसी परिवार की फसल खराब हो जाती, तो पड़ोसी बिना हिसाब-किताब के अनाज दे देते। यही पहाड़ की असली सामाजिक पूंजी थी। पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में नकदी का प्रचलन बहुत कम था। कई बार लोहार, बढ़ई, दर्जी और अन्य पारंपरिक कारीगरों को मजदूरी पैसे से नहीं, बल्कि अनाज में दी जाती थी। इसे स्थानीय स्तर पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता था। कटाई के मौसम में पूरा गांव श्रमदान करता और बाद में पाथा के हिसाब से अनाज बांटा जाता। यह केवल लेन-देन नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का हिस्सा था। स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे भारत में मीट्रिक प्रणाली लागू हुई। सेर की जगह किलोग्राम और पाथा जैसे पारंपरिक मापों का स्थान आधुनिक मानकों ने ले लिया। बाजार आधुनिक हुए, पैकेजिंग आई, इलेक्ट्रानिक तराजू आए और पुरानी माप-तौल की प्रणालियां इतिहास बनने लगीं। आज गांवों के बुजुर्ग ही शायद बता सकें कि एक पाथा में कितना अनाज आता था या एक सेर का वास्तविक महत्व क्या था। सेर और पाथा के खत्म होने के साथ केवल माप-तौल नहीं बदली, बल्कि गांवों की जीवनशैली भी बदल गई। अब उधार मोबाइल ऐप में दर्ज होता है। रिश्ते बैंक खाते से मापे जाने लगे हैं। सामुदायिक सहयोग की जगह बाजार ने ले ली है। विश्वास की जगह लिखित अनुबंध ने ले ली है। पहाड़ की पारंपरिक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे आधुनिक बाजार में समा गई। आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात करता है, तब केवल लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा ही नहीं, बल्कि सेर, पाथा, नाली, मुट्ठी, छटांक जैसी पारंपरिक माप प्रणालियां भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। स्कूलों में स्थानीय इतिहास पढ़ाया जाए, संग्रहालयों में पुराने बाट, तराजू और पाथा प्रदर्शित किए जाएं, और गांवों के बुजुर्गों की स्मृतियों को दस्तावेज़ बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि पहाड़ की पहचान केवल हिमालय नहीं, बल्कि उसकी जीवन-पद्धति भी है। पहाड़ का सेर केवल वजन नहीं था और पाथा केवल माप नहीं था। वे उस दौर के प्रतीक थे, जब इंसान की नीयत तराजू से भारी होती थी, भरोसा किसी रसीद का मोहताज नहीं था और गांव की समृद्धि केवल धन से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास से मापी जाती थी। शायद यही कारण है कि पुराने लोग आज भी कहते हैंकृपहाड़ बदल गया है, लेकिन सेर और पाथा के साथ जो अपनापन गया, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी।

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