मंगलवार, 21 जुलाई 2026

कलाकार नहीं, लोक स्मृति के प्रहरी थे ‘दर्जी’

ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर और लोकगीतों की महककृयही थे पहाड़ में दर्जी जब गांवों का चौक ही बन जाता था रंगमंच और दर्जी होते थे उसके असली नायक गीतों की गूंज, ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर होता था पूरे गांव की मुस्कान देहरादून। हे दर्जी दिदा मीकू तु अंगढी बणै दे मेरि घगरि परै चमकदार मज़री लगै दे..गढ़वाल के इस पुराने गीत की धुन जब भी सुनी जाती है तो पहाड़ के गांवों का जीवन जीने वाले के जहन में पहाड़ के उस दर्जी की याद आती है, जो पहाड़ के लिए एक कलाकार ही नहीं लोक संस्कृति का संरक्षक था। पहाड़ के गांवों में एक समय ऐसा भी था, जब मनोरंजन के लिए न टेलीविजन था, न मोबाइल और न ही डीजे की कानफोड़ू आवाज। तब गांव की असली रौनक बनकर आते थे दर्जी और उनके साथ कुछ कलाकार भी जिन्हें बद्दी और बदयौण कहा जाता था। उत्तराखंड के पहाड़ों में अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था, लेकिन उनका काम एक ही थाकृगीतों, नृत्य, लोककथाओं और अपने हुनर से पूरे गांव को एक सूत्र में पिरो देना। जैसे ही किसी गांव में शादी-ब्याह, मेला, देवी-देवताओं का उत्सव या कोई बड़ा सामाजिक आयोजन होता, दर्जी अपने साथ ढोल, लोकगीत, रंग-बिरंगे वस्त्र और सुई-धागे का हुनर लेकर पहुंच जाते। उनके आने की खबर पूरे गांव में उत्सव का संदेश बन जाती। सूरज ढलते ही गांव का चौक जगमगा उठता। बच्चे सबसे आगे, महिलाएं समूह बनाकर, बुजुर्ग अपने अनुभवों के साथ और युवा उत्साह से भरेकृहर कोई एक जगह इकट्ठा हो जाता। फिर शुरू होता लोकगीतों, नृत्यों और हास्य-व्यंग्य का ऐसा सिलसिला, जो देर रात तक चलता। दर्जी केवल गीत नहीं गाते थे, वह पहाड़ की आत्मा गाते थे। उनके गीतों में प्रेम था, विरह था, देवी-देवताओं की महिमा थी, वीरों की गाथाएं थीं और समाज को जोड़ने वाले संदेश भी थे। उनकी प्रस्तुति में मनोरंजन के साथ लोकशिक्षा भी छिपी होती थी। दर्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह केवल लोक कलाकार नहीं थे। गांव में ठहरने के दौरान वह कपड़े सिलते, नए वस्त्र तैयार करते, पुराने कपड़ों की मरम्मत करते और शादी-ब्याह के लिए विशेष परिधान भी बनाते थे। आज जिसे मल्टी-स्किल कहा जाता है, वह कला बद्दी सदियों पहले जी रहे थे। वह अपने श्रम से आजीविका कमाते थे और अपनी कला से गांव को आनंद देते थे। दर्जी एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। वह केवल कार्यक्रम नहीं करते थे, बल्कि लोककथाएं, नए गीत, सामाजिक संदेश और आसपास के क्षेत्रों की खबरें भी साथ लेकर चलते थे। इस तरह वह पहाड़ के गांवों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी बन जाते थे। उनके आने से केवल एक आयोजन नहीं होता था, बल्कि गांव का सामाजिक जीवन भी जीवंत हो उठता था। समय बदला। गांवों में सड़कें आईं, फिर टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट ने जगह बना ली। रेडीमेड कपड़ों ने सुई-धागे की जरूरत कम कर दी और डीजे ने लोकधुनों की जगह ले ली। धीरे-धीरे दर्जी की आवाज पहाड़ की घाटियों से ओझल होने लगी। आज गांवों के चौक तो हैं, लेकिन वहां लोकगीतों की वह सामूहिक गूंज नहीं है। नई पीढ़ी बद्दी शब्द से भी अपरिचित होती जा रही है। बद्दी किसी एक व्यक्ति या समुदाय का नाम भर नहीं थे। वह उस पहाड़ की पहचान थे, जहां कला आजीविका भी थी और समाज को जोड़ने का माध्यम भी। उन्होंने बिना किसी मंच, बिना किसी प्रचार और बिना किसी पुरस्कार के पीढ़ियों तक पहाड़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखा। आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात कर रहा है, तब जरूरत है कि दर्जी जैसी लोक परंपराओं का दस्तावेजीकरण हो, उन पर शोध हो और उन्हें लोक महोत्सवों, विद्यालयों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में सम्मानपूर्वक स्थान मिले।

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