बुधवार, 2 सितंबर 2026
खिसकती जमीन और सत्ता की छटपटाहट
गंगाजल व हवन के बहाने राजनीतिक हिसाब-किताब
मुद्दों की सियासत पर भारी पड़ा शुद्धिकरण का दांव
देवभूमि में नीयत व विचारधारा का सीधा मुकाबला
भाजपा बोली-सत्ता की भूख, कांग्रेस का पलटवार
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े शुद्धिकरण प्रकरण ने उत्तराखंड की सियासत को गरमा दिया है। मंच पर गंगाजल छिड़कने और शुद्धिकरण हवन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मामला अब महज एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके बहाने दोनों दल एक-दूसरे की विचारधारा, राजनीति और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा जहां इसे कांग्रेस की सत्ता की बेचौनी और तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति का उदाहरण बता रही है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार राजनीतिक रंग देकर जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को जनता के बीच अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का अहसास हो चुका है, इसलिए वह ऐसे मुद्दों के सहारे राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं ने इसे कांग्रेस की सत्ता की भूख से जोड़ते हुए कहा कि जनता अब इस तरह की राजनीति को स्वीकार करने वाली नहीं है।
भाजपा का कहना है कि उत्तराखंड की जनता ने हमेशा धार्मिक आस्था का सम्मान किया है और किसी भी धार्मिक प्रतीक को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश उचित नहीं है। पार्टी नेताओं के मुताबिक कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर राजनीति करने के बजाय उसे अपने शासन और नीतियों का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। भाजपा के निशाने पर कांग्रेस के साथ-साथ राहुल गांधी और पार्टी नेतृत्व भी है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस एक तरफ संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बात करती है, दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाती है।
कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा खुद इस मामले को लगातार राजनीतिक मुद्दा बना रही है और अब कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा को महंगाई, बेरोजगारी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्तराखंड के विकास जैसे मुद्दों पर जवाब देना चाहिए, लेकिन वह धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का माहौल तैयार करना चाहती है।
कांग्रेस नेताओं के मुताबिक लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को धार्मिक भावनाओं के नाम पर दूसरे दल को कठघरे में खड़ा करने का अधिकार नहीं है। पार्टी का कहना है कि भाजपा को इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी तय करने के बजाय इसे राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाने से बचना चाहिए। शुद्धिकरण प्रकरण की राजनीतिक गूंज उत्तराखंड से बाहर भी सुनाई दे रही है। कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की बयानबाजी के बाद यह विवाद अब राज्य की राजनीति में एक बड़े प्रतीकात्मक मुद्दे का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की कथित सत्ता की हताशा बता रही है, दूसरी ओर कांग्रेस इसे भाजपा की धर्म आधारित राजनीति के रूप में पेश कर रही है। दोनों दलों के लिए यह विवाद आगामी राजनीतिक संघर्ष की जमीन तैयार करने का अवसर भी बन गया है।
इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या धर्म और आस्था से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाया जाना चाहिए? गंगाजल और शुद्धिकरण जैसे धार्मिक प्रतीकों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां दोनों दल एक-दूसरे की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा इसे कांग्रेस की सत्ता पाने की बेचौनी बता रही है तो कांग्रेस भाजपा पर धार्मिक धु्रवीकरण का आरोप लगा रही है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में धर्म और आस्था हमेशा संवेदनशील विषय रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों के लिए चुनौती यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए कदम कहीं सामाजिक विभाजन को और गहरा न कर दें।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही इस विवाद का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में ‘शुद्धिकरण’ विवाद दोनों दलों के लिए एक-दूसरे पर हमला बोलने का नया हथियार बन गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद कितना लंबा खिंचता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन इतना तय है कि हल्द्वानी का शुद्धिकरण अब केवल एक धार्मिक प्रतीक का विवाद नहीं रहाकृयह उत्तराखंड की सियासत में सत्ता, धर्म और विचारधारा की लड़ाई का नया मोर्चा बन चुका है।
सेवा संकल्प के लिए भाजपा ने उतारी ‘फौज’
सेवा संकल्प अभियान के सहारे चुनावी मोड में बीजेपी, मंत्रियों,दिग्गजों को कमान
जमीनी स्तर पर उतरेगी पूरी टीम, सरकार और संगठन मिलकर साधेंगे लक्ष्य
सेवा संकल्प के दम पर जनता के बीच रिपोर्ट कार्ड लेकर जाएगी भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को अब पूरी तरह चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी ने सेवा संकल्प अभियान को जमीन तक पहुंचाने के लिए मंत्रियों से लेकर वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रमुख भाजपा नेताओं तक को जिम्मेदारियां सौंपकर पूरी टीम मैदान में उतारने की तैयारी कर ली है। पार्टी का जोर अभियान को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय इसे सरकार के कामकाज और संगठन की सक्रियता से जोड़कर जनता तक पहुंचाने पर है। भाजपा नेतृत्व ने अभियान की सफलता के लिए जिम्मेदारियां तय करते हुए नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों और गतिविधियों की कमान सौंपी है। सरकार के मंत्री जहां अपने विभागीय कामकाज और सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच रखने की भूमिका निभाएंगे, वहीं संगठन के पदाधिकारी बूथ और मंडल स्तर तक अभियान की गतिविधियों को गति देने का काम करेंगे।
भाजपा की रणनीति साफ हैकृसरकार की उपलब्धियों का संदेश संगठन के नेटवर्क के जरिए घर-घर तक पहुंचाया जाए। इसके लिए मंत्री, विधायक, सांसद, प्रदेश पदाधिकारी, जिला संगठन और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं को अभियान से जोड़ने की तैयारी है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि चुनावी वर्ष से पहले सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय ही राजनीतिक संदेश को प्रभावी बना सकता है। इसी कारण अभियान में जनप्रतिनिधियों के साथ संगठन के कार्यकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रखी गई है।
सेवा संकल्प अभियान में मंत्रियों को विशेष जिम्मेदारी दिए जाने को भाजपा की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। मंत्रियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच पहुंचकर सरकार की योजनाओं की जानकारी दें और स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं को भी सुनें। पार्टी के लिए यह अभियान सरकार और जनता के बीच संवाद बढ़ाने का माध्यम भी है। संगठन की कोशिश है कि सरकार की योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों तक सीधे पहुंच बनाई जाए और उनसे फीडबैक लिया जाए।
भाजपा की असली ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन माना जाता है। यही वजह है कि सेवा संकल्प अभियान को बूथ तक ले जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मंडल और जिला स्तर के पदाधिकारियों को अभियान की निगरानी और समन्वय की जिम्मेदारी दी जा रही है। कार्यकर्ताओं के जरिए केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों तथा संगठन की सेवा गतिविधियों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति बनाई गई है।
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो सेवा संकल्प अभियान केवल जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा अपने संगठन को लगातार सक्रिय रखने और जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खिलाफ बनने वाली संभावित नाराजगी को समय रहते समझना और उसे दूर करना है। ऐसे में लगातार जनसंपर्क अभियान संगठन को जनता की नब्ज टटोलने का अवसर भी देगा। विपक्ष जहां सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों को लेकर सवाल उठा रहा है, वहीं भाजपा सेवा और सरकार की उपलब्धियों को अपने राजनीतिक संदेश का आधार बनाने की तैयारी में है।
पार्टी नेतृत्व की ओर से संगठन को सक्रिय रखने का संदेश स्पष्ट हैकृचुनाव की घोषणा का इंतजार नहीं करना है, बल्कि उससे पहले ही जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करनी है। मंत्रियों से लेकर प्रदेश पदाधिकारियों और बूथ कार्यकर्ताओं तक जिम्मेदारी बांटने की रणनीति इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव आने तक संगठन का हर स्तर सक्रिय रहे और पार्टी के पास सरकार के कामकाज के साथ-साथ जमीनी फीडबैक का मजबूत नेटवर्क मौजूद हो।
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की लड़ाई के लिए दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस जहां सरकार को घेरने के लिए मुद्दे तलाश रही है, वहीं भाजपा लगातार संगठनात्मक गतिविधियों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए सिर्फ सेवा का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सरकार-संगठन-कार्यकर्ता को एक साथ मैदान में उतारने की रणनीति भी है। अब सवाल यही है कि भाजपा की यह फौज जनता तक सरकार का संदेश पहुंचाने में कितनी सफल होती है और क्या यह अभियान 2027 की चुनावी जंग में पार्टी के लिए राजनीतिक बढ़त तैयार कर पाता है?
सूखे राजनीतिक मैदान में ‘संजीवनी’
राहुल गांधी की गिरफ्तारी से मिलेगी कांग्रेस को आक्सीजन
उत्तराखंड में भाजपा के सामने आ सकता है सियासी संकट
मुद्दा एफआईआर से निकलकर सूबे की सियासत में पहुंचेगा
एक बड़ा राजनीतिक चेहरे के साथ मिलेगा भावनात्मक नैरेटिव
आरोपी से ज्यादा राजनीतिक प्रतीक बन जाएंगे राहुल गांधी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 की चुनावी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है कि एक ऐसा मुद्दा आकार लेने लगा है, जो आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख दलों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर अगर वह उत्तराखंड पहुंचकर गिरफ्तारी देने का राजनीतिक फैसला लेते हैं, तो यह महज कानूनी कार्रवाई नहीं रहेगी। इसके राजनीतिक मायने कहीं ज्यादा बड़े होंगे। कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम सूखे राजनीतिक मैदान में संजीवनी साबित हो सकता है, जबकि भाजपा के सामने ऐसा मुद्दा खड़ा हो सकता है, जिसे संभालना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब गिरफ्तारी को कांग्रेस राजनीतिक प्रतिशोध के तौर पर जनता के बीच ले जाने की कोशिश करे।
राहुल गांधी यदि खुद उत्तराखंड पहुंचकर गिरफ्तारी देने का ऐलान करते हैं, तो कांग्रेस के पास इसे बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने का अवसर होगा। प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लामबंद करने से लेकर राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता तक, पूरा घटनाक्रम तेजी से प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन सकता है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लंबे समय से सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों के साथ उसे एक बड़ा राजनीतिक चेहरा और भावनात्मक नैरेटिव भी मिल जाएगा। यानी कांग्रेस जिस मुद्दे को अभी प्रदेश की सीमा में लड़ रही है, राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी उसे राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा सकती है।
भाजपा के सामने मुश्किल यह होगी कि वह इस मामले को कितना कानूनी और कितना राजनीतिक रहने देती है। कार्रवाई होती है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक दमन बताएगी और कार्रवाई नहीं होती तो भाजपा पर कानून के सवाल उठ सकते हैं। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी राजनीतिक पेचीदगी है। भाजपा चाहेगी कि मामला कानून और एफआईआर तक सीमित रहे। कांग्रेस की कोशिश स्वाभाविक रूप से इसे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और राजनीतिक संघर्ष का मुद्दा बनाने की होगी। अगर कांग्रेस अपना नैरेटिव स्थापित करने में सफल होती है तो भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में आना पड़ सकता है।
राहुल गांधी का उत्तराखंड पहुंचना अपने आप में कांग्रेस संगठन के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर होगा। प्रदेशभर से कार्यकर्ताओं के जुटने, प्रदर्शन और विरोध की राजनीति शुरू हो सकती है। राष्ट्रीय मीडिया की निगाहें भी उत्तराखंड पर टिकेंगी। कांग्रेस इसे डरेंगे नहीं, लड़ेंगे जैसे राजनीतिक संदेश में बदल सकती है। इससे प्रदेश संगठन में नई ऊर्जा आने की संभावना है। विशेषकर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण है। पार्टी को एक ऐसे मुद्दे की जरूरत है, जो संगठन को सड़क पर उतार सके और अलग-अलग गुटों को एक मंच पर ला सके। राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी ऐसा ही मुद्दा बन सकती है।
कांग्रेस को यह भी ध्यान रखना होगा कि सिर्फ राजनीतिक नारे से चुनाव नहीं जीते जाते। गिरफ्तारी का मुद्दा तभी राजनीतिक लाभ देगा, जब पार्टी इसे उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दों से जोड़ सके। अगर पूरा अभियान केवल राहुल गांधी बनाम भाजपा तक सीमित रह गया, तो भाजपा इसे कांग्रेस की व्यक्तिवादी राजनीति बताकर पलटवार कर सकती है। भाजपा का तर्क होगा कि कानून अपना काम करेगा और किसी नेता को राजनीतिक पहचान के आधार पर विशेष छूट नहीं मिल सकती। यहीं से असली राजनीतिक मुकाबला शुरू होगा।
उत्तराखंड में भाजपा लगातार संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश में है। ऐसे समय में राहुल गांधी से जुड़ा कोई बड़ा घटनाक्रम कांग्रेस के लिए मुद्दों की कमी से निकलने का रास्ता बन सकता है। भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ राहुल गांधी नहीं होंगे। चुनौती होगी उस राजनीतिक नैरेटिव की, जो उनकी गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस तैयार कर सकती है।
अगर कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया तो भाजपा को हर बयान सोच-समझकर देना होगा। एक गलत राजनीतिक प्रतिक्रिया कांग्रेस को और ताकत दे सकती है। राजनीति में कई बार कानूनी कार्रवाई का असर अदालत से बाहर ज्यादा दिखाई देता है। राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी भी ऐसा ही मोड़ पैदा कर सकती है। कांग्रेस इसे संघर्ष की शुरुआत बताएगी, भाजपा कानून की कार्रवाई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने की कोशिश करेगी, भाजपा संगठनात्मक ताकत से मुकाबला करेगी और उत्तराखंड इस टकराव का केंद्र बन सकता है। यही कारण है कि राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी कांग्रेस के लिए संजीवनी और भाजपा के लिए गले की फांस बन सकती है।
लेकिन अंतिम फैसला अदालत, कानून और संबंधित जांच प्रक्रिया के दायरे में ही होगा। राजनीतिक दल इस घटनाक्रम को किस तरह जनता के सामने पेश करते हैं, असली लड़ाई वहीं तय होगी। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में यह मामला अब सिर्फ एफआईआर का नहींकृनैरेटिव की लड़ाई का मामला बनता दिख रहा है।
मंगलवार, 1 सितंबर 2026
udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार
udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार: अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब 200 से ज्...
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हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार
अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम
अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब
200 से ज्यादा छात्र-छात्राएं, बारिश के बीच आज सिर्फ 25 पहुंचे स्कूल
वर्षों से स्कूल के मरम्मत की गुहार, विभाग आज दिन तक है इससे बेखबर
केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा का क्षेत्र, राज्य मंत्री कुंदन लटवाल का भी गृह क्षेत्रकृफिर भी बच्चों की सुरक्षा पर क्यों खामोशी
देहरादून। पहाड़ में बारिश कहर बरपा रही है और इसी बारिश के बीच अल्मोड़ा के लोधिया में सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत बच्चों के सिर पर सवाल बनकर खड़ी है। नगर से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित राजकीय इंटर कालेज लोधिया का भवन ऐसी हालत में है कि किसी भी समय गंभीर हादसे की आशंका बनी हुई है। विद्यालय में 200 से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं, लेकिन सोमवार को बारिश और भवन की खस्ताहाली के चलते सिर्फ 25 बच्चे ही स्कूल पहुंचे। यह आंकड़ा सिर्फ उपस्थिति रजिस्टर का नंबर नहीं है। यह उस डर की गवाही है, जो अभिभावकों के मन में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बैठ चुका है।
सबसे चुभने वाली बात यह है कि भवन की हालत अचानक खराब नहीं हुई। विद्यालय और अभिभावक लंबे समय से इसे दुरुस्त कराने की मांग कर रहे हैं। शिकायतें हुईं, आवाजें उठीं, लेकिन सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूटी। अब लगातार बारिश ने जर्जर भवन को और जोखिम भरा बना दिया है। आखिर जिम्मेदार विभाग को किस चीज का इंतजार है? क्या किसी बच्चे के घायल होने का? क्या भवन का कोई हिस्सा गिरने का? या फिर उस दिन का, जब प्रशासन मौके पर पहुंचकर राहत-बचाव की तस्वीरें जारी करे?हादसा होने के बाद कार्रवाई करना प्रशासनिक सफलता नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी। जब भवन की स्थिति को लेकर स्कूल और अभिभावक पहले से चेतावनी दे रहे हैं तो फिर समय रहते मरम्मत क्यों नहीं हुई? बारिश शुरू होने के बाद भी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
स्कूल में 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन सोमवार को स्कूल पहुंचने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ 25 रह गई। बाकी बच्चे कहां हैं? जवाब किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि अभिभावकों के डर में छिपा है, जिस स्कूल की इमारत देखकर माता-पिता अपने बच्चों को घर पर रोकने को मजबूर हो जाएं, वहां शिक्षा व्यवस्था की सफलता के दावे कितने खोखले हैं, यह समझना मुश्किल नहीं। स्कूल बच्चों के लिए ज्ञान का मंदिर होना चाहिए, लेकिन लोधिया में वही भवन बच्चों और अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बन गया है।
लोधिया कोई ऐसा दूरदराज का इलाका नहीं है जहां प्रशासन की नजर पहुंचना मुश्किल हो। यह अल्मोड़ा नगर से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है और राजनीतिक सवाल इससे भी बड़ा है। यह क्षेत्र केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा से जुड़ा हुआ है। हाल में राज्य मंत्री बने कुंदन लटवाल का घर भी इसी क्षेत्र में बताया जाता है। तो फिर सवाल स्वाभाविक हैकृकि जब सत्ता के इतने करीब होने के बावजूद एक सरकारी स्कूल की इमारत वर्षों से बदहाल है, तब पहाड़ के दूरस्थ गांवों के सरकारी स्कूलों की हालत कौन पूछेगा? क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में बच्चों की सुरक्षा शामिल है? अगर शामिल है तो लोधिया कालेज अब तक क्यों नहीं सुधरा?
उत्तराखंड में सरकारी भवनों की बदहाली कोई नई कहानी नहीं है। हर बरसात में स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन और दूसरी सरकारी इमारतें अपनी जर्जर हालत का सच सामने लाती हैं। लोधिया कालेज भी उसी व्यवस्था की तस्वीर बन गया है, जहां शिकायत पहले होती है और कार्रवाई हादसे के बाद। यह सवाल सिर्फ शिक्षा विभाग से नहीं है। प्रशासन, शिक्षा महकमा और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधिकृसभी को जवाब देना होगा कि जब भवन को लेकर लगातार मांग उठ रही थी तो अब तक क्या किया गया? क्या भवन का तकनीकी निरीक्षण हुआ? क्या इसे सुरक्षित घोषित किया गया है? अगर सुरक्षित है तो अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से क्यों डर रहे हैं? अगर असुरक्षित है तो स्कूल में कक्षाएं क्यों चल रही हैं? और सबसे बड़ा सवालकृकि अगर बारिश के बीच भवन गिर गया तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
सरकारें अक्सर बजट, प्रस्ताव, स्वीकृति और टेंडर की लंबी प्रक्रिया का हवाला देती हैं। लेकिन बच्चों की सुरक्षा किसी फाइल की गति की मोहताज नहीं हो सकती। एक जर्जर स्कूल भवन को ठीक कराने के लिए अगर महीनों-वर्षों लगते हैं, तो सवाल भवन की उम्र का नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है। लोधिया के अभिभावक अपने बच्चों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ने जाएं, उसकी छत उनके सिर पर सुरक्षित रहे।
बारिश के बीच 200 से ज्यादा बच्चों वाले स्कूल में सिर्फ 25 बच्चों का पहुंचना प्रशासन के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए। अब जरूरत निरीक्षण की औपचारिकता की नहीं, तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की है। जब तक भवन सुरक्षित नहीं होता, बच्चों के लिए वैकल्पिक कक्षाओं की व्यवस्था हो। भवन की तकनीकी जांच कराई जाए। यदि पुनर्निर्माण आवश्यक है तो प्रक्रिया तत्काल शुरू हो। क्योंकिकृबच्चों की जिंदगी किसी सरकारी फाइल से छोटी नहीं है और लोधिया के अभिभावक अब यह सवाल पूछ रहे हैं।
अपमान पर पर्दा, सवाल उठाने पर केस
कांग्रेस द्वारा इसे महज उत्तराखंड का मामला न मानकर राष्ट्रीय स्तर पर उठा रही
खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण और सामाजिक बराबरी के मुद्दे पर
विवाद को राष्ट्रीय पहचान देने और कांग्रेस के आगामी रणनीतिक का है बड़ा प्लान
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाले नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर दर्ज एफआईआर ने उत्तराखंड की सियासत को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस ने अब इस पूरे विवाद को महज उत्तराखंड का स्थानीय मामला मानने से इनकार करते हुए इसे दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और संविधान की लड़ाई से जोड़ दिया है। राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने के बाद कांग्रेस का आक्रोश और बढ़ गया है। पार्टी का आरोप है कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर कार्रवाई करने के बजाय राहुल गांधी की आवाज को एफआईआर के जरिए दबाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए आंदोलन को देशव्यापी स्वर देने का फैसला किया है।
कांग्रेस की रणनीति अब साफ दिखाई दे रही है। पार्टी इस विवाद को केवल मंच शुद्धिकरण तक सीमित नहीं रखना चाहती। उसका निशाना अब सीधे भाजपा की राजनीतिक और वैचारिक राजनीति पर है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित शुद्धिकरण में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर की मांग की थी। कांग्रेस का कहना है कि जब इस मांग के बाद राहुल गांधी पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया, तो इससे सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या विपक्ष के नेता को सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने का भी अधिकार नहीं है? कांग्रेस नेताओं ने इसी सवाल को लेकर विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में प्रदर्शन हुआ तो झारखंड के धनबाद तक इसका असर दिखाई दिया। कई राज्यों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एफआईआर और कथित शुद्धिकरण के खिलाफ आवाज उठाई।
राजनीतिक तौर पर देखें तो कांग्रेस को एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसके जरिए वह भाजपा को सीधे सामाजिक न्याय और संविधान के सवाल पर घेरना चाहती है। खड़गे स्वयं दलित समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय नेता हैं। ऐसे में कांग्रेस का तर्क है कि उनके कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण की घटना को सामान्य राजनीतिक विवाद मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। पार्टी इसे सामाजिक भेदभाव के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। राहुल गांधी ने भी इसे इसी बड़े विमर्श से जोड़ा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर समेत कई नेताओं ने घटना की आलोचना की है। अब पार्टी की कोशिश इस सवाल को गांव, शहर और प्रदेश स्तर तक ले जाने की है। अगर संविधान समानता की गारंटी देता है तो जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के सम्मान को लेकर अलग व्यवहार क्यों?
इस विवाद का सबसे सीधा असर उत्तराखंड की राजनीति पर पड़ना तय है। कांग्रेस पहले ही हल्द्वानी की घटना को लेकर आक्रामक है और देहरादून में सचिवालय घेराव का ऐलान कर चुकी है। कांग्रेस के लिए यह आंदोलन केवल भाजपा विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक नैरेटिव को धार देने का अवसर भी बन गया है। भाजपा जहां कांग्रेस पर मामले को जातिगत राजनीति के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की कथित सामाजिक सोच का आईना बता रही है। यानी आने वाले दिनों में यह विवाद कानूनी लड़ाई से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई बन सकता है।
कांग्रेस का हमला अब दो सवालों पर केंद्रित हैकृपहला, खड़गे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर क्या कार्रवाई हुई? दूसरा, राहुल गांधी के बयान पर एफआईआर क्यों? भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह इस विवाद को केवल राहुल गांधी के बयान तक सीमित रखकर कांग्रेस के राजनीतिक हमले को रोक पाएगी या नहीं। क्योंकि कांग्रेस अब इसे राहुल बनाम भाजपा का विवाद नहीं रहने देना चाहती। वह इसे सामाजिक सम्मान बनाम भेदभाव के सवाल में बदलने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है। पार्टी ने देशभर में प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और एफआईआर को ही आंदोलन का राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी है। कांग्रेस का कहना है कि उसके नेताओं पर कार्रवाई हो सकती है तो कथित शुद्धिकरण के लिए जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। यानी हल्द्वानी का विवाद अब उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर निकल चुका है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक अवसरवादिता बता रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस इसे संविधान और सामाजिक सम्मान की लड़ाई बना रही है। आने वाले दिनों में असली मुकाबला अदालत या थाने से ज्यादा जनता की अदालत में नैरेटिव तय करने का होगा और यही इस पूरे विवाद को 2027 की उत्तराखंड विधानसभा चुनावी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण बना देता है।
एफआईआर बन गई नया ‘रणक्षेत्र’
भाजपा बोलीकृसियासत के लिए समाज को मत बांटो, कानून से ऊपर कौन
राहुल की एफआईआर पर कांग्रेस के हंगामे को बताया राजनीतिक नौटंकी
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद ने उत्तराखंड की सियासत को सड़क से लेकर राजधानी तक गर्म कर दिया है। कांग्रेस ने जहां इसे सामाजिक अपमान, दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई का नाम देकर भाजपा को घेरना शुरू किया है, वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के इस अभियान को राजनीतिक मुद्दे को जातीय रंग देने की कोशिश करार दिया है। भाजपा का हमला सीधा हैकृकांग्रेस के पास जनता के बीच जाने के लिए मुद्दे नहीं बचे तो अब विवादों को चुनावी हथियार बनाया जा रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की शांत सामाजिक व्यवस्था को राजनीतिक फायदे के लिए जाति के चश्मे से देखना प्रदेश के हित में नहीं है। पार्टी ने कांग्रेस से सवाल किया है कि क्या हर राजनीतिक विवाद को जातिगत संघर्ष में बदल देना ही उसकी राजनीति का नया एजेंडा है? कांग्रेस जिस घटना को दलित सम्मान से जोड़कर राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटी है, भाजपा ने उसी नैरेटिव को पलटने की कोशिश शुरू कर दी है।
भाजपा का कहना है कि किसी व्यक्ति या संगठन की ओर से कानून का उल्लंघन हुआ है तो जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई भी। लेकिन इसके नाम पर पूरे राजनीतिक दल या समाज को कटघरे में खड़ा करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। पार्टी का तर्क है कि कानून अपना रास्ता तय करेगा, राजनीतिक मंच अदालत नहीं बन सकता। यही वह लाइन है जिसके जरिए भाजपा कांग्रेस के आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने विवाद को और बड़ा राजनीतिक आयाम दे दिया है। कांग्रेस इसे बदले की राजनीति बता रही है और कार्रवाई की मांग कर रही है। भाजपा का जवाब है कि लोकतंत्र में राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि कांग्रेस राहुल गांधी की एफआईआर को लेकर देशभर में आंदोलन की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा इस लड़ाई को कानून बनाम राजनीतिक दबाव के फ्रेम में रखने की कोशिश कर रही है। भाजपा का संदेश हैकृएफआईआर को लेकर सड़क पर दबाव बनाने से कानून की प्रक्रिया नहीं बदलेगी। भाजपा ने कांग्रेस के आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा भी तलाशनी शुरू कर दी है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस सामाजिक न्याय के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को यदि वास्तव में सामाजिक सद्भाव की चिंता है तो उसे ऐसे मुद्दों को हवा देने के बजाय प्रदेश में भाईचारे की राजनीति करनी चाहिए। भाजपा के हमले का सार यही हैकृसम्मान के सवाल पर राजनीति नहीं, कानून के आधार पर फैसला होना चाहिए।
इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ 2027 का विधानसभा चुनाव है। उत्तराखंड में चुनावी तैयारी शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करने में जुटे हैं। कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को सामाजिक न्याय के मोर्चे पर घेरने का अवसर है। भाजपा के लिए चुनौती है कि कांग्रेस इसे दलित बनाम भाजपा के सवाल में तब्दील न कर पाए। इसीलिए भाजपा अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक हो गई है। पार्टी कांग्रेस से पूछ रही है कि अगर हर विवाद को जाति से जोड़कर आंदोलन किया जाएगा तो क्या इससे समाज में दूरी नहीं बढ़ेगी?
भाजपा की कोशिश इस पूरे विवाद को विकास बनाम विवाद की बहस में बदलने की है। पार्टी का कहना है कि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और पर्यटन जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है, जबकि कांग्रेस राजनीतिक विवादों को हवा देकर चुनावी जमीन तैयार कर रही है। यानी भाजपा का निशाना केवल कांग्रेस नहीं, बल्कि उसका चुनावी नैरेटिव है। कांग्रेस जहां पूछ रही है कि कथित शुद्धिकरण करने वालों पर कार्रवाई कब होगी, वहीं भाजपा पलटकर पूछ रही है कि क्या राहुल गांधी कानून से ऊपर हैं? यही सवाल अब आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।
फिलहाल दोनों दल पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। कांग्रेस सड़क पर उतरने की तैयारी में है तो भाजपा भी जवाबी राजनीतिक अभियान की जमीन तैयार कर रही है। एक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैंकृसामाजिक सम्मान का, राजनीतिक मर्यादा का, कानून का और सबसे बढ़कर 2027 के चुनावी नैरेटिव का। हल्द्वानी का विवाद अब केवल शुद्धिकरण तक सीमित नहीं है। कांग्रेस इसे भाजपा की वैचारिक राजनीति का प्रतीक बता रही है, जबकि भाजपा इसे कांग्रेस की विवाद पैदा करो और राजनीतिक लाभ लो रणनीति के रूप में पेश कर रही है। उत्तराखंड की सियासत में अब असली मुकाबला सिर्फ बयानबाजी का नहीं, बल्कि इस बात का है कि जनता किस नैरेटिव को स्वीकार करती है। एक तरफ कांग्रेस का सवालकृखड़गे के कथित अपमान पर कार्रवाई कब? दूसरी तरफ भाजपा का पलटवारकृराजनीति के लिए समाज को कब तक बांटोगे? और इसी सवाल-जवाब के बीच 2027 का चुनावी रण धीरे-धीरे आकार लेता दिख रहा है।
पवित्र मैदान पर ‘गंदी सियासत’
रामलीला मैदान विवाद में बीजेपी ने बदला पैंतरा, कांग्रेस को घेरा
खड़गे विवाद पर बीजेपी की दो टूककृपरंपरा से खिलवाड़ मंजूर नहीं
रामलीला मैदान का धार्मिक महत्व जानते हुए भी हो रही है सियासत
भाजपा का सवालकृधार्मिक आस्था के स्थल को राजनीतिक अखाड़ा
देहरादून। हल्द्वानी का रामलीला मैदान इन दिनों राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण को लेकर कांग्रेस जहां भाजपा और हिंदू संगठनों पर हमलावर है, वहीं भाजपा ने अब इस विवाद को एक अलग कोण से उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा का कहना है कि जिस रामलीला मैदान का स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में महत्व रहा है, वहां हुई घटना को केवल जातिगत चश्मे से देखना उत्तराखंड की सनातन परंपरा और स्थानीय आस्था के साथ अन्याय है।
भाजपा का तर्क है कि विवाद में शामिल प्रत्येक पक्ष की भूमिका और उसके बयान की जांच होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए पूरे घटनाक्रम को दलित बनाम सवर्ण या दलित बनाम सनातन की बहस में बदलना समाज को बांटने की कोशिश है। हल्द्वानी का रामलीला मैदान लंबे समय से धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों का प्रमुख स्थल रहा है। रामलीला जैसे धार्मिक आयोजनों के कारण इस मैदान की पहचान स्थानीय जनजीवन में केवल एक सार्वजनिक मैदान के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े स्थान के तौर पर भी बनी है। यही वजह है कि भाजपा इस पहलू को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रही है।
भाजपा नेताओं का सवाल है कि यदि किसी धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल पर कोई विवाद पैदा होता है तो उसकी संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। उसे तत्काल जातीय संघर्ष की भाषा में बदल देना क्या उचित है? भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस इस विवाद को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर रही है।
पार्टी नेताओं के अनुसार कांग्रेस के पास भाजपा को घेरने के लिए सामाजिक न्याय और दलित सम्मान का मुद्दा है, लेकिन इस बहस में सनातन परंपराओं और स्थानीय धार्मिक भावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। भाजपा का कहना है कि दलित सम्मान और सनातन सम्मान को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना ही असली राजनीतिक साजिश है। पार्टी के मुताबिक उत्तराखंड की सामाजिक संरचना को इस तरह की विभाजनकारी राजनीति से बचाना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।
कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण क्यों किया गया और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। भाजपा इस सवाल पर सीधे बचाव करने के बजाय अब बहस का फोकस बदलने की कोशिश कर रही है। उसका कहना है कि किसी भी घटना पर कानून अपना काम करे, लेकिन धार्मिक स्थल और धार्मिक परंपराओं को लेकर संवेदनशीलता भी जरूरी है। यहीं से भाजपा का राजनीतिक पलटवार शुरू होता है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि क्या किसी धार्मिक परंपरा को लेकर उठे विवाद को सीधे जातिवाद का नाम देकर खत्म कर देना उचित होगा?
कांग्रेस के लिए भाजपा का यह नैरेटिव चुनौतीपूर्ण है। कांग्रेस इस पूरे प्रकरण को दलित सम्मान और सामाजिक बराबरी का सवाल बनाना चाहती है। भाजपा इसे सनातन परंपरा, धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव से जोड़ रही है। इस तरह दोनों दल एक ही घटना से दो बिल्कुल अलग राजनीतिक संदेश निकाल रहे हैं। कांग्रेस का संदेशकृसामाजिक बराबरी से समझौता नहीं। भाजपा का संदेशकृधार्मिक आस्था को राजनीतिक हथियार मत बनाइए। यानी विवाद अब केवल हल्द्वानी तक सीमित नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड में उस बड़े राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन रहा है जिसमें सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक अस्मिता के अलग-अलग नैरेटिव सामने आ रहे हैं।
भाजपा कांग्रेस से यह भी पूछ रही है कि क्या हर राजनीतिक विवाद में जाति को केंद्र में रखना जरूरी है? पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड का समाज लंबे समय से विभिन्न जातियों, समुदायों और परंपराओं के सह-अस्तित्व का उदाहरण रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को ऐसे मुद्दों पर और अधिक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। हालांकि कांग्रेस का तर्क है कि कथित शुद्धिकरण जैसी घटना को सामान्य धार्मिक परंपरा बताकर टाला नहीं जा सकता। उसका कहना है कि सामाजिक बराबरी और सम्मान के सवाल को दबाया नहीं जा सकता। यही टकराव अब पूरे विवाद को और तीखा बना रहा है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक तैयारियां तेज होने के साथ इस विवाद का चुनावी महत्व भी बढ़ गया है। भाजपा जहां अपने हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को मजबूती देने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान और बराबरी को अपने अभियान का प्रमुख आधार बना सकती है। हल्द्वानी का रामलीला मैदान इसलिए अब केवल विवाद का स्थल नहीं, बल्कि दो राजनीतिक विचारधाराओं की टकराहट का प्रतीक बनता जा रहा है।
भाजपा का सवाल है कि सनातन परंपरा और दलित सम्मान को आमने-सामने खड़ा करके आखिर किसका राजनीतिक फायदा होगा? कांग्रेस का सवाल है कि धार्मिक आस्था के नाम पर सामाजिक भेदभाव को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? यही दो सवाल आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का तापमान तय करेंगे। रामलीला मैदान की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान अपनी जगह है और सामाजिक समानता का संवैधानिक सिद्धांत अपनी जगह। राजनीतिक दलों के सामने चुनौती यही है कि आस्था और अधिकार की इस बहस को समाज को बांटने का हथियार बनने से कैसे रोका जाए।
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