शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
‘वोट’ से पहले जनता ‘प्रोटेस्ट’ मोड में
सड़क, पानी और पलायन पर विधायकों को भागने की जगह नहीं
ग्राउंड पर गुस्सा आन पीक
भाजपा के लिए खतरे की घंटी, अपनों की ही परफारमेंस पर उठने लग गए हैं सवाल
प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की घोषणा से पहले विधायकों की बढ़ी चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान अभी से बढ़ने लगा है। सत्तारूढ़ भाजपा के कई विधायकों को अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में जनता के विरोध, सवालों और घेराव का सामना करना पड़ रहा है। कहीं सड़क, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली पर लोग नाराज हैं, तो कहीं बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय समस्याओं को लेकर जनता खुलकर अपनी नाराजगी जता रही है। ऐसे में भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की राह आसान नहीं दिख रही है।
पिछले कुछ महीनों में कई विधानसभा क्षेत्रों में विधायकों के कार्यक्रमों के दौरान जनता ने तीखे सवाल पूछे हैं। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने विकास कार्यों में देरी, पेयजल संकट, खराब सड़कों और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर विरोध जताया। पंचायत स्तर से लेकर जिला मुख्यालयों तक जनता का असंतोष सामने आने लगा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 में भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश के बाद लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ गई थीं। अब जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो जनता अपने जनप्रतिनिधियों से पांच साल का हिसाब मांग रही है।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि राज्य गठन के बाद सत्ता परिवर्तन का क्रम लगातार चलता रहा है। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए दोबारा सरकार बनाई, लेकिन तीसरी बार सत्ता में वापसी के लिए उसे एंटी-इंकम्बेंसी की चुनौती से जूझना पड़ रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सत्ता विरोधी लहर अभी व्यापक नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर विधायकों के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। कई सीटों पर भाजपा संगठन ने भी फीडबैक लेना शुरू कर दिया है और कमजोर सीटों पर विशेष रणनीति बनाई जा रही है। कांग्रेस इस बढ़ती नाराजगी को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और स्थानीय विकास कार्यों को लेकर सरकार को लगातार घेर रही है। कांग्रेस का दावा है कि जनता अब बदलाव चाहती है और विधायकों के घेराव इसी जनभावना का संकेत हैं।
वहीं, उत्तराखंड क्रांति दल भी मूल निवास, भू-कानून और स्थायी राजधानी जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। विधायकों के खिलाफ बढ़ता असंतोष भाजपा नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। पार्टी संगठन ने बूथ स्तर तक समीक्षा शुरू कर दी है। सूत्रों की मानें तो कई सीटों पर विधायकों की कार्यशैली और जनसंपर्क को लेकर रिपोर्ट तैयार की जा रही है। पार्टी उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहां जनता की नाराजगी अधिक दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि चुनाव से पहले भाजपा कुछ सीटों पर नए चेहरों को मौका देने की रणनीति पर विचार कर सकती है, ताकि स्थानीय असंतोष को कम किया जा सके।
ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का कहना है कि विकास के बड़े दावे किए गए, लेकिन कई बुनियादी समस्याएं अभी भी जस की तस हैं। युवाओं में रोजगार को लेकर चिंता है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी बड़े मुद्दे बने हुए हैं। हालांकि, दूसरी ओर भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियोंकृसड़क, धार्मिक पर्यटन, समान नागरिक संहिता, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकासकृको लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व और संगठन की मजबूती के दम पर वह तीसरी बार सत्ता में लौट सकती है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विधायकों का बढ़ता घेराव केवल स्थानीय नाराजगी नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव की शुरुआती चेतावनी भी है। यदि भाजपा समय रहते जनता की शिकायतों का समाधान नहीं करती, तो कई सीटों पर उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की सियासत में 2027 का चुनाव केवल विकास बनाम आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह जनता की अपेक्षाओं, स्थानीय मुद्दों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की भी परीक्षा बनेगा। जनता अब केवल वादे नहीं, बल्कि पांच वर्षों का रिपोर्ट कार्ड मांग रही है, और यही रिपोर्ट कार्ड आने वाले चुनाव में कई राजनीतिक समीकरण बदल सकता है।
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