शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
कांग्रेस की ‘वीआईपी परेड’ या संगठन बचाने की कवायद
भाजपा का कांग्रेस पर तंजकृजहां संगठन कमजोर, वहां बढ़ते हैं वीआईपी दौरे
दिल्ली के नेताओं की आवाजाही विकास के लिए नहीं, गुटबाजी संभालने के लिए
कांग्रेस नेताओं ने दिया भाजपा को जवाबकृयह चुनावी तैयारी है, गुटबाजी नहीं
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के लगातार प्रस्तावित दौरों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस में इन दिनों चल रही वीआईपी परेड का मकसद जनता के मुद्दों पर संघर्ष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व विवाद को संभालना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तराखंड की जनता की समस्याओं से अधिक अपने संगठन की अंदरूनी चुनौतियों की चिंता है। उनके अनुसार, प्रदेश में राष्ट्रीय नेताओं की लगातार मौजूदगी इस बात का संकेत है कि पार्टी अभी भी संगठनात्मक असंतोष और आपसी खींचतान से पूरी तरह उबर नहीं पाई है।
भाजपा का दावा है कि जिस दल का संगठन मजबूत होता है, उसे बार-बार दिल्ली से नेताओं को भेजकर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस अभी चुनाव लड़ने से पहले अपने ही नेताओं को एक मंच पर लाने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा यह भी आरोप लगा रही है कि कांग्रेस के भीतर टिकट की संभावित दावेदारी, क्षेत्रीय गुटों की सक्रियता और नेतृत्व को लेकर अलग-अलग खेमों की खींचतान को शांत करने के लिए केंद्रीय नेताओं के दौरे बढ़ाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय नेताओं के दौरे संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाने और विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा हैं। कांग्रेस का दावा है कि भाजपा संगठनात्मक बैठकों को भी गुटबाजी का रंग देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक दलों में समीक्षा बैठकें, रणनीति निर्माण और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद सामान्य प्रक्रिया है और इसे आंतरिक संकट बताना भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी वर्ष नजदीक आते ही लगभग सभी बड़े दल अपने संगठन को सक्रिय करने के लिए वरिष्ठ नेताओं के दौरे बढ़ाते हैं। हालांकि, यदि किसी दल में पहले से मतभेदों की चर्चा हो, तो ऐसे दौरों को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जाता है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने एक ओर भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी है, तो दूसरी ओर उसे अपने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय और एकजुट बनाए रखने की चुनौती भी है। भाजपा इसी पहलू को मुद्दा बनाकर कांग्रेस पर निशाना साध रही है। स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा विकास, संगठन और सरकार के कामकाज को अपनी ताकत बताने में जुटी है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी मुद्दों को धार देने के साथ संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के दौरे आने वाले दिनों में और बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही भाजपा भी इन्हें राजनीतिक हथियार बनाकर यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस पहले अपने घर को संभाले, फिर सरकार पर सवाल उठाए। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में मुद्दों के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई भी तेज हो चुकी हैकृएक पक्ष इसे संगठन की मजबूती बता रहा है, तो दूसरा इसे गुटबाजी की मरम्मत। अंतिम फैसला, हमेशा की तरह, जनता करेगी।
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