सोमवार, 13 जुलाई 2026
‘सिस्टम’ भू-माफिया के आगे ‘बेबस’
उमेदपुर की सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा
हाईकोर्ट सख्त, डीएम और डीएफओ को व्यक्तिगत तलब
अतिक्रमण के आरोपों पर हाईकोर्ट ने मांगा संयुक्त शपथ पत्र
प्रशासन और वन विभाग की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
देहरादून जिले की विकासनगर तहसील के ग्राम सभा उमेदपुर में सरकारी भूमि पर कथित कब्जे का मामला अब न्यायपालिका की निगरानी में पहुंच गया है। इस प्रकरण में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए जिला मजिस्ट्रेट देहरादून और प्रभागीय वनाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से संयुक्त शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि दोनों अधिकारी यह बताएंगे कि सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए अब तक क्या-क्या कार्रवाई की गई है। हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद प्रशासनिक और वन विभाग में हलचल तेज हो गई है। मामला केवल अवैध कब्जे का नहीं, बल्कि सरकारी भूमि की सुरक्षा, विभागीय लापरवाही और भू-माफियाओं के कथित गठजोड़ का भी माना जा रहा है।
यह मामला तब चर्चा में आया जब तीर्थनगरी )षिकेश के समाजसेवी एवं वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता प्रभु दयाल शर्मा ने सरकारी भूमि पर कथित कब्जे और प्रशासनिक निष्क्रियता के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका के अनुसार ग्राम सभा उमेदपुर में एक निजी भूमि खरीदने के बाद उस तक पहुंचने के लिए सरकारी भूमि का कथित रूप से उपयोग किया गया। आरोप है कि आसपास के कुछ लोगों की मिलीभगत से राजस्व एवं वन विभाग के अधीन आने वाली भूमि को समतल कर रास्ते के रूप में इस्तेमाल किया गया और बाद में उस पर कब्जा कर लिया गया।
मामले की शिकायत मिलने पर तत्कालीन जिला प्रशासन ने जांच कराई थी। जांच में जिन खसरा नंबरों की भूमि का उल्लेख किया गया, वे राजस्व अभिलेखों में जंगल-झाड़ी श्रेणी की भूमि पाई गई, जिसका प्रबंधन वन विभाग के अधीन बताया गया। जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि जिस स्थान पर वर्षों से मौसमी नाला मौजूद था, उसे पिछले कुछ वर्षों में मलबा डालकर समतल कर दिया गया। इसके बाद उस भूमि पर अतिक्रमण होने की पुष्टि हुई। तहसील प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में वन विभाग को भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने, बाड़बंदी कराने और अतिक्रमण हटाने की सिफारिश भी की थी।
मामले में वन संरक्षक स्तर से भी प्रभागीय वनाधिकारी को कार्रवाई के निर्देश भेजे गए थे, लेकिन आरोप है कि जमीन पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यही पहलू हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान भी महत्वपूर्ण बना। याचिकाकर्ता का कहना है कि विभागीय निष्क्रियता के कारण सरकारी भूमि पर कब्जा कर उसे करोड़ों रुपये के मूल्य की संपत्ति में बदल दिया गया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत अभिलेखों में यह स्वीकार किया गया कि राजस्व अधिकारियों के निरीक्षण में अतिक्रमण से जुड़े तथ्य सामने आए थे। हालांकि, उपजिलाधिकारी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मौके पर कोई अवैध निर्माण अथवा व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। इसके बावजूद अतिक्रमण करने वालों के विरु( कार्रवाई की सिफारिश की गई। इसी विरोधाभास पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित विभाग प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।
हाईकोर्ट की सख्ती ने अब इस पूरे प्रकरण को केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले के रूप में खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में डीएम और डीएफओ के संयुक्त शपथ पत्र तथा अदालत में प्रस्तुत कार्रवाई रिपोर्ट पर इस पूरे मामले की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
डीएम और डीएफओ से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट और प्रभागीय वनाधिकारी को निर्देश दिया है कि वह संयुक्त शपथ पत्र दाखिल कर यह स्पष्ट करेंकृकि सरकारी भूमि की वर्तमान स्थिति क्या है। अतिक्रमण हटाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए। जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। भविष्य में सरकारी भूमि की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामले की व्यक्तिगत स्तर पर निगरानी जिला प्रशासन करेगा।
अब प्रशासन पर बढ़ी जिम्मेदारी
हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने मामले की दोबारा समीक्षा शुरू कर दी है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सभी संबंधित अभिलेखों और विभागीय कार्रवाई का परीक्षण किया जा रहा है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उमेदपुर का मामला केवल एक गांव की सरकारी जमीन तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि यदि जांच रिपोर्टों में अतिक्रमण की पुष्टि हो चुकी थी, संबंधित विभागों को कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजे जा चुके थे, तो फिर समय रहते सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त क्यों नहीं कराया गया?
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