सोमवार, 31 अगस्त 2026

मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027

हल्द्वानी के मंच से उठी सियासी चिंगारी दिल्ली तक पहुंची कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और संविधान का बताया है अपमान भाजपा का कांग्रेस पर धार्मिक भावनाओं के दोहन का आरोप देहरादून। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम स्थल के कथित शुद्धीकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब प्रदेश की सियासत से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन गया है। गंगाजल छिड़कने और हवन के जरिए मंच के शुद्धीकरण की घटना पर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के खिलाफ बताया है, वहीं भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीति पर पलटवार के तौर पर पेश कर रही है। मामला बढ़ने के बाद कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की है। राहुल गांधी ने शुद्धीकरण की घटना को लेकर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग करते हुए इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जोड़ दिया। कांग्रेस का आरोप है कि राजनीतिक विरोध के नाम पर विपक्ष के राष्ट्रीय अध्यक्ष के मंच का शुद्धीकरण करना सामाजिक विभाजन और राजनीतिक असहिष्णुता की मानसिकता को दर्शाता है। हल्द्वानी की घटना ने उत्तराखंड के राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। विधानसभा चुनाव से पहले जहां भाजपा और कांग्रेस संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं यह विवाद दोनों दलों को एक-दूसरे पर वैचारिक हमला करने का नया अवसर दे रहा है। कांग्रेस इस पूरे मामले को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम से जुड़ा विवाद नहीं मान रही। पार्टी इसे सामाजिक समरसता, संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं से जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस स्वयं धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही है और अब विरोध होने पर लोकतंत्र की दुहाई दे रही है। यही वजह है कि हल्द्वानी का स्थानीय विवाद अब भाजपा बनाम कांग्रेस की व्यापक वैचारिक लड़ाई का चेहरा बनता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के सीधे हमले ने उत्तराखंड कांग्रेस को भी आक्रामक तेवर अपनाने का मौका दिया है। प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने भाजपा से सवाल किया है कि क्या राजनीतिक मतभेद के कारण किसी दूसरे दल के राष्ट्रीय नेता के कार्यक्रम स्थल को अपवित्र माना जा सकता है? कांग्रेस का कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध की अनुमति है, लेकिन विरोध की सीमा संवैधानिक और सामाजिक मर्यादाओं से बाहर नहीं जानी चाहिए। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही हैकृमुद्दे को केवल हल्द्वानी तक सीमित न रखकर इसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र बनाम कथित धार्मिक राजनीति के विमर्श में बदलना। भाजपा कांग्रेस के आरोपों को स्वीकार करने के बजाय पलटवार की रणनीति पर चल रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को धार्मिक भावनाओं और हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने से पहले अपने राजनीतिक व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। भाजपा का प्रयास इस विवाद को कांग्रेस की कथित तुष्टिकरण की राजनीति और सनातन से जुड़े उसके बयानों से जोड़ने का है। पार्टी का संदेश है कि कांग्रेस यदि धार्मिक भावनाओं से जुड़े प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करेगी तो भाजपा भी उसी राजनीतिक मैदान में जवाब देने से पीछे नहीं हटेगी। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को अभी समय है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। ऐसे में हल्द्वानी का शुद्धीकरण विवाद महज एक घटना नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी विमर्श की झलक भी माना जा रहा है। पहाड़ की राजनीति में बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और महंगाई जैसे मुद्दे लगातार मौजूद हैं। मगर राजनीतिक दलों के लिए भावनात्मक और धार्मिक मुद्दे चुनावी ध्रुवीकरण का आसान माध्यम भी बनते रहे हैं। हल्द्वानी की घटना ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है कि 2027 का चुनाव विकास के सवालों पर लड़ा जाएगा या फिर धार्मिक-सामाजिक पहचान के मुद्दे चुनावी एजेंडे पर हावी होंगे। इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या किसी राजनीतिक मंच का धार्मिक तरीके से शुद्धीकरण महज आस्था का विषय है या इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी छिपा है। भाजपा इसे आस्था और राजनीतिक प्रतिक्रिया के नजरिए से देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे विपक्ष के प्रति असम्मान और सामाजिक विभाजन की राजनीति बता रही है। दोनों दलों की व्याख्या अलग है, लेकिन राजनीतिक असर एककृविवाद लगातार बड़ा होता जा रहा है। हल्द्वानी से उठी यह चिंगारी अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है। राहुल गांधी के मैदान में उतरने के बाद भाजपा के लिए इसे स्थानीय विवाद तक सीमित रखना मुश्किल होगा। कांग्रेस इसे संविधान और लोकतंत्र का सवाल बनाएगी तो भाजपा इसे सनातन, आस्था और तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ अपने अभियान से जोड़ेगी। यानी चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही उत्तराखंड में एक नया राजनीतिक अखाड़ा तैयार हैकृमुद्दा मंच का है, लेकिन निशाना 2027 है।

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