शनिवार, 1 अगस्त 2026
जनगणना में भी पहाड़ ‘अदृश्य’
अपनी गणना, अपना गांव, संसद में महेंद्र भट्ट ने उठाई पर्वतीय जनगणना की मांग
बड़ा सवाल,कृक्या मैदानी पैमानों में सिमट कर रह गई है पहाड़ की आबादी
पलायन वखाली होते गांवों की सच्चाई, आंकड़ों में लौटेंगे खाली होते गांव
देहरादून। उत्तराखंड को अक्सर देवभूमि कहा जाता है। चुनाव आते हैं तो वीरभूमि भी कहा जाता है। पर्यटन की बात होती है तो स्वर्ग कहा जाता है। लेकिन जब सरकारी फाइलों में गिनती होती है, तब यही उत्तराखंड अक्सर सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाता है। संसद में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने उत्तराखंड के लिए विशेष पर्वतीय जनगणना माडल की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि अपनी गणना, अपना गांव की तर्ज पर ऐसी जनगणना होनी चाहिए, जो पहाड़ की वास्तविक आबादी, पलायन और गांवों की सच्चाई को दर्ज करे। सवाल यह नहीं है कि यह मांग किसने उठाई। सवाल यह है कि क्या भारत की मौजूदा जनगणना व्यवस्था वास्तव में पहाड़ को देख भी रही है?
उत्तराखंड में हजारों गांव ऐसे हैं जहां मकान खड़े हैं, लेकिन लोग नहीं। दरवाजों पर ताले हैं, खेतों में झाड़ियां हैं और स्कूलों में बच्चों की संख्या हर साल घट रही है। लेकिन जब जनगणना होती है तो वह पूछती हैकृआप अभी कहां रहते हैं? वह यह नहीं पूछती कि आपका गांव कौन-सा है? वह यह नहीं पूछती कि आप हर त्योहार पर किस गांव लौटते हैं? वह यह भी नहीं पूछती कि यदि गांव में रोजगार मिल जाए तो क्या आप वापस लौटेंगे?यही वह खाली जगह है, जिसकी ओर संसद में इशारा किया गया।
उत्तराखंड का पलायन कोई नई खबर नहीं है। इस पर आयोग बने, रिपोर्टें आईं, समितियां बनीं और घोषणाएं हुईं। लेकिन गांव आज भी खाली हैं। सरकारें कहती हैं कि सड़क बना दी। लोग पूछते हैंकृरोजगार कहां है? सरकार कहती है इंटरनेट पहुंच गया। लोग पूछते हैंकृयुवा वापस क्यों नहीं लौटे? सरकार कहती है पर्यटन बढ़ा। लोग पूछते हैंकृस्थायी आजीविका कितनों को मिली? यही वजह है कि आज जनगणना केवल जनसंख्या गिनने का विषय नहीं रह गया है। यह विकास माडल की परीक्षा बन गया है। यह बात भी स्वीकार करनी होगी कि यह मांग ऐसे समय आई है जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं। भाजपा जानती है कि पलायन, सीमांत गांव, खाली होते घर और पहाड़ की उपेक्षा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हर सरकार से सवाल पूछे जाते रहे हैं। इसलिए यदि भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष संसद में यह कहता है कि उत्तराखंड के लिए अलग पर्वतीय जनगणना माडल होना चाहिए, तो यह केवल प्रशासनिक सुझाव नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश भी है कि पार्टी पहाड़ की पहचान और उसकी विशेष परिस्थितियों को राष्ट्रीय बहस में लाना चाहती है। लेकिन राजनीति का दूसरा पक्ष भी है।
महेंद्र भट्ट जिस दल के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उसी दल की सरकार राज्य में भी है और केंद्र में भी। इसलिए विपक्ष पूछेगा यदि आज की जनगणना व्यवस्था पहाड़ के साथ न्याय नहीं कर रही थी तो पिछले वर्षों में इसे बदलने की पहल क्यों नहीं हुई? यदि पलायन सबसे बड़ी चुनौती है तो खाली गांवों को आबाद करने की नीतियों का परिणाम क्या निकला? यदि सीमांत गांव रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तो वहां स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की स्थिति अब भी कमजोर क्यों है? लोकतंत्र में यही स्वाभाविक है। जो सवाल विपक्ष से पूछे जाते हैं, वही सवाल सत्ता से भी पूछे जाएंगे।
यह बात शायद कम लोग जानते हैं कि जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं करती। उसी के आधार पर योजनाएं बनती हैं, संसाधनों का वितरण होता है, स्कूल, अस्पताल, सड़कें और कई सरकारी सुविधाओं की प्राथमिकताएं तय होती हैं। यदि किसी गांव की आबादी कागज पर कम दिखाई देती है तो वहां विकास योजनाएं भी सीमित हो सकती हैं। यदि बाहर रहने वाले लोग पूरी तरह शहरों की आबादी में दर्ज हो जाते हैं, तो पहाड़ की वास्तविक सामाजिक संरचना सरकारी नजर से ओझल हो सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से पर्वतीय राज्यों के लिए अलग दृष्टिकोण की बात करते रहे हैं।
यदि इस अवधारणा पर गंभीरता से काम होता है और प्रत्येक नागरिक का अपने मूल गांव से संबंध भी दर्ज किया जाता है, तो सरकार के पास पहली बार यह स्पष्ट तस्वीर होगी किकृकितने लोग अस्थायी रूप से बाहर हैं। कितने गांव पूरी तरह खाली होने की कगार पर हैं। किन क्षेत्रों में रोजगार देकर आबादी लौटाई जा सकती है। किन सीमांत गांवों को विशेष सहायता की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए केवल नारा नहीं, मजबूत कानूनी ढांचा, स्पष्ट प्रक्रिया और विश्वसनीय डेटा संग्रह की व्यवस्था भी चाहिए।
संसद में मुद्दा उठ जाना अच्छी बात है। बहस भी हो जाएगी। समाचार भी बन जाएगा। लेकिन पहाड़ के लोग शायद एक और सवाल पूछेंगे। क्या अगली जनगणना के बाद हमारे गांवों में लोग भी लौटेंगे? क्योंकि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि गांवों की गिनती कम हो रही है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि गांवों में जिंदगी कम होती जा रही है। यदि जनगणना उस जिंदगी को वापस लाने की दिशा में पहला कदम बनती है, तो यह केवल आंकड़ों का सुधार नहीं होगा, बल्कि पहाड़ के भविष्य का दस्तावेज होगा और यदि यह केवल संसद की बहस बनकर रह गई, तो अगली जनगणना में शायद कुछ और गांव नक्शे पर तो मिलेंगे, लेकिन उनमें रहने वाले लोग नहीं। यही उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना है।
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