रविवार, 2 अगस्त 2026

पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’

महिला मंगल दल गांव की पहरेदार महिला मंगल दल का वादों का सहारा बिना पद संभाली जल-जंगल और जमीन पर लड़ा युद्ध गांव की सरकार आज भी है समाज की संस्कारशाला देहरादून। पहाड़ों में यदि किसी संस्था ने बिना किसी बड़े प्रचार, राजनीतिक मंच या सरकारी पद के समाज को सबसे अधिक जोड़ा है, तो वह है महिला मंगल दल। गांव की चौपाल से लेकर जंगलों की रक्षा, जल स्रोतों के संरक्षण, सामाजिक जागरूकता, नशामुक्ति अभियान, स्वच्छता, लोक संस्कृति और आपदा के समय राहत कार्य तककृमहिला मंगल दल दशकों से पहाड़ की सामाजिक धड़कन बने हुए हैं। आज जब पलायन, जल संकट, जंगलों में आग, बदलते सामाजिक ताने-बाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब महिला मंगल दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन महिलाओं ने गांवों को जीवंत बनाए रखा, वह स्वयं अक्सर सरकारी योजनाओं और नीति-निर्माण के केंद्र से दूर दिखाई देती हैं। पहाड़ के इतिहास में महिलाओं ने केवल परिवार नहीं संभाला, बल्कि जंगल, जल और जमीन की रक्षा के लिए भी संघर्ष किया। चिपको आंदोलन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि पहाड़ की महिलाएं पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी प्रहरी हैं। उसी सामाजिक चेतना की निरंतरता आज भी महिला मंगल दलों में दिखाई देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दल केवल औपचारिक संगठन नहीं हैं, बल्कि सामुदायिक नेतृत्व का जीवंत उदाहरण हैं। गांव में कोई धार्मिक आयोजन हो, स्कूल का कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, जल स्रोत की सफाई, पौधारोपण या किसी जरूरतमंद परिवार की सहायताकृसबसे पहले महिला मंगल दल ही सक्रिय दिखाई देता है। पहाड़ की महिलाएं खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, स्वयं सहायता समूह, स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प से जुड़ी हुई हैं। महिला मंगल दल इन गतिविधियों को संगठित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि सरकार इन दलों को स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, विपणन, प्रशिक्षण और डिजिटल प्लेटफार्म से जोड़ दे, तो पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, लाल चावल, जड़ी-बूटियां और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे उत्पाद राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकते हैं। आज पहाड़ के हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं, जबकि गांवों की जिम्मेदारी महिलाओं पर बढ़ती जा रही है। ऐसे में महिला मंगल दल केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि गांवों को जीवित रखने वाली ताकत बन चुके हैं। कई गांवों में यह संगठन खाली पड़े खेतों को सामूहिक खेती से जोड़ने, वर्षा जल संरक्षण, जैविक खेती और सामुदायिक श्रमदान जैसे कार्यों में भी योगदान दे रहे हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही महिला मतदाताओं की भूमिका पर सभी राजनीतिक दलों की नजर रहती है। महिला मंगल दल सीधे तौर पर गैर-राजनीतिक संगठन माने जाते हैं, लेकिन उनके माध्यम से गांवों की वास्तविक समस्याएं सामने आती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, राशन, गैस, वन अधिकार और आजीविका जैसे मुद्दों पर सबसे स्पष्ट आवाज इन्हीं समूहों से निकलती है। यही कारण है कि चुनावी मौसम में जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल महिला समूहों से संवाद बढ़ाने का प्रयास करते हैं। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि महिला मंगल दलों को केवल चुनावी मंच का हिस्सा न बनाया जाए, बल्कि उनके सुझावों को ग्राम विकास योजनाओं और स्थानीय नीति निर्माण में भी महत्व मिले। एक चिंता यह भी है कि आधुनिक जीवनशैली, पलायन और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण नई पीढ़ी की महिलाओं का महिला मंगल दलों से जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा। यदि समय रहते इन संगठनों को डिजिटल प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास और स्वरोजगार से नहीं जोड़ा गया, तो उनकी सामाजिक ऊर्जा कमजोर पड़ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि महिला मंगल दलों को पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, पर्यटन, जैविक खेती, वन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए, तो वह ग्रामीण विकास के सबसे प्रभावी मॉडल बन सकते हैं। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, चारधाम और प्राकृतिक सौंदर्य नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके गांव और उन गांवों की महिलाएं हैं। महिला मंगल दलों ने वर्षों से बिना किसी बड़े संसाधन के सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की मशाल जलाए रखी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें उन्हें केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित न रखें, बल्कि ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, जल संरक्षण, जैविक कृषि, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आपदा प्रबंधन की नीतियों में साझेदार बनाएं। यदि उत्तराखंड के गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है, तो महिला मंगल दलों को केवल सम्मान नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भी सशक्त स्थान देना होगा। क्योंकि पहाड़ की असली रीढ़ सड़कें नहीं, बल्कि यह महिलाएं हैं जो हर कठिन परिस्थिति में गांव को जीवित रखे हुए हैं।

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