बुधवार, 5 अगस्त 2026

‘ग्राउंड वर्सेज लीगल फाइट’

कांग्रेस कानूनी तैयारी में और भाजपा बूथों पर किलेबंदी में व्यस्त कांग्रेस पाटी की नजर बैलट से पहले वोटर लिस्ट के कागजात पर वकीलों की फौज तैयार, चुनावी जंग अब अदालत व आयोग तक देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की उलटी गिनती अभी शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारी तेज कर दी है। भाजपा बूथ मजबूत करने में लगी है, तो कांग्रेस अब एसआईआर को लेकर कानूनी मोर्चा खोलने की तैयारी कर रही है। खबर है कि कांग्रेस ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए वकीलों की एक टीम तैयार की है। पहली नजर में यह केवल संगठनात्मक तैयारी लग सकती है। लेकिन इसके पीछे लोकतंत्र का एक बड़ा सवाल छिपा हैकृक्या चुनाव अब केवल जनता के बीच लड़े जाएंगे, या अदालतों और निर्वाचन आयोग के दफ्तरों में भी? मतदाता सूची किसी भी चुनाव की रीढ़ होती है। अगर सूची पर विवाद खड़ा हो जाए, तो चुनाव परिणाम आने से पहले ही अविश्वास का माहौल बन सकता है। कांग्रेस का कहना है कि वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कोई पात्र मतदाता सूची से बाहर न हो और किसी प्रकार की अनियमितता न होने पाए। इसलिए उसने कानूनी विशेषज्ञों को मैदान में उतारने का फैसला किया है। भाजपा का पक्ष अलग होगा। वह कहेगी कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसकी प्रक्रिया पर बेवजह संदेह पैदा करना उचित नहीं। सत्ता पक्ष यह भी तर्क दे सकता है कि यदि किसी को आपत्ति है तो उसके लिए आयोग ने कानूनी प्रक्रिया पहले से तय कर रखी है। लेकिन राजनीति में सवाल वहीं खत्म नहीं होते जहाँ बयान खत्म होते हैं। उत्तराखंड का चुनाव हमेशा पहाड़ और मैदान, पलायन और रोजगार, सड़क और स्वास्थ्य, सैनिक और किसान जैसे मुद्दों के बीच लड़ा जाता रहा है। इस बार यदि मतदाता सूची भी बड़ा मुद्दा बनती है, तो चुनाव का स्वरूप बदल सकता है। कांग्रेस की रणनीति यह संकेत देती है कि वह चुनाव के दिन से पहले ही चुनावी प्रक्रिया पर पूरी निगरानी रखना चाहती है। हर विधानसभा क्षेत्र में यदि कानूनी टीम सक्रिय रहती है, तो बूथ स्तर पर उठने वाले विवादों को तुरंत आयोग के सामने रखा जा सकेगा। यह एक राजनीतिक रणनीति भी है और एहतियाती कदम भी। लेकिन एक सवाल कांग्रेस से भी पूछा जाना चाहिए। यदि मतदाता सूची इतनी महत्वपूर्ण है, तो क्या पार्टी ने पिछले वर्षों में भी बूथ स्तर पर उतनी ही गंभीरता से काम किया? क्या केवल चुनाव नजदीक आने पर कानूनी तैयारी पर्याप्त होगी, या जनता के बीच संगठन की मजबूती भी उतनी ही जरूरी है? दूसरी ओर, भाजपा के लिए भी यह समय आत्मविश्वास के साथ-साथ पारदर्शिता दिखाने का है। यदि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो हर आपत्ति का जवाब तथ्यों और नियमों के आधार पर दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में विश्वास केवल जीत से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की निष्पक्षता से बनता है। दरअसल, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता है। और मतदाता की सबसे बड़ी पहचान उसका नाम मतदाता सूची में होना है। यदि कोई पात्र नागरिक सूची से बाहर रह जाए, तो उसका मतदान का अधिकार प्रभावित होता है। इसलिए मतदाता सूची का शुद्ध और अद्यतन होना किसी एक दल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का विषय है। 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीति तय करनी शुरू कर दी है। भाजपा संगठन और सरकार के कामकाज के सहारे चुनावी मैदान तैयार कर रही है। कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया पर निगरानी और कानूनी तैयारी के जरिए अपनी सक्रियता दिखा रही है। आने वाले महीनों में यह मुकाबला केवल रैलियों और सभाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दस्तावेज़ों, नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं तक भी पहुंचेगा। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है, लेकिन यह उत्सव तभी सार्थक है जब हर पात्र मतदाता बिना किसी बाधा के अपने मताधिकार का उपयोग कर सके। यदि कांग्रेस की कानूनी टीम चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने में योगदान देती है, तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम हो सकता है और यदि यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बनती है, तो जनता इसे भी चुनावी रणनीति का हिस्सा मानेगी। आखिरकार, चुनाव केवल वोटों से नहीं जीते जातेकृविश्वास से भी जीते जाते हैं और विश्वास की शुरुआत मतदाता सूची से होती है।

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