गुरुवार, 6 अगस्त 2026

उत्तराखंड बीजेपी का ‘आपरेशन आल ओके’

आल इज वैल के दावों के बीच विधायकों की नाराजगी दूर करने का बना मास्टर प्लान बैठक में विकास यात्रा के साथ-साथ विधायकों के खिलाफ स्थानीय गुस्से पर मंथन चुनाव अभी दूर है, लेकिन भाजपा को जनता की नाराजगी की आहट सुनाई देने लगी उत्तराखंड में बूथ जीतो अभियान के बहाने सत्ता बचाने की सबसे बड़ी कवायद शुरू देहरादून। चुनाव की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने अभी बिगुल नहीं बजाया है। लेकिन भाजपा ने उत्तराखंड में चुनावी रणभेरी बजा दी है। दिल्ली में संगठन की उत्तराखंड कोर ग्रुप की बैठक केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं थी, बल्कि यह उस चिंता का संकेत भी थी जिसे सत्ता पक्ष सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार नहीं करता। तीन घंटे चली बैठक में कई बातें हुई बूथ जीतो अभियान, विकास यात्रा, लखपति दीदी सम्मेलन, सांसदों और विधायकों का क्षेत्रवार प्रवास और सबसे अहम... विधायकों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को कैसे कम किया जाए? यहीं से असली कहानी शुरू होती है। अगर सब कुछ ठीक चल रहा है, अगर सरकार के काम से जनता पूरी तरह संतुष्ट है, अगर विकास हर गांव तक पहुंच चुका है, तो फिर स्थानीय नाराजगी दूर करने के लिए अलग रणनीति बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? राजनीति में बैठकों की भाषा और जनता की भाषा अलग होती है। प्रेस विज्ञप्ति कहती हैकृ संगठन मजबूत होगा। लेकिन बंद कमरे की चर्चा अक्सर यह होती है कि कौन-सा विधायक जनता के बीच कमजोर पड़ रहा है, किस सीट पर खतरा बढ़ रहा है और किस इलाके में नाराजगी चुनावी नुकसान में बदल सकती है। यही वजह है कि भाजपा ने चुनाव से काफी पहले बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने का फैसला किया है। उत्तराखंड में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी माहौल है। लगातार सरकार में रहने के कारण जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाब मांग रही है। युवाओं के सवाल हैंकृरोजगार कहां है? पहाड़ पूछ रहा हैकृपलायन कब रुकेगा? किसान पूछ रहा हैकृआय कैसे बढ़ेगी? महिलाएं पूछ रही हैंकृमहंगाई से राहत कब मिलेगी? और कई क्षेत्रों में लोग अपने विधायक से पूछ रहे हैंकृपांच साल में आप हमारे गांव कितनी बार आए? शायद यही कारण है कि बैठक में विधायकों के क्षेत्रीय प्रवास पर विशेष जोर दिया गया। चुनाव से पहले जनता तक पहुंचने की कवायद तेज होगी। गांवों में बैठकें होंगी, चौपाल लगेंगी, विकास यात्रा निकलेगी और लाभार्थियों से संवाद बढ़ाया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी अच्छी तरह जानती है कि चुनाव टीवी स्टूडियो में नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं। एक-एक बूथ, एक-एक मतदाता और एक-एक कार्यकर्ता... यही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रही है। इसलिए संगठन पहले बूथ को मजबूत करेगा और फिर चुनावी मैदान में उतरेगा। भाजपा की चुनावी मशीनरी उम्मीदवार घोषित होने का इंतजार नहीं करती। वह उससे बहुत पहले बूथ स्तर पर गणित बैठाना शुरू कर देती है। बैठक में लखपति दीदी सम्मेलन आयोजित करने की योजना भी बनी। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का अभियान बताएगी और इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन राजनीति में समय बहुत कुछ कह देता है। जब चुनाव नजदीक आते हैं तो हर सामाजिक कार्यक्रम का राजनीतिक अर्थ भी निकलने लगता है। महिलाओं का वोट बैंक उत्तराखंड की राजनीति में निर्णायक माना जाता है और भाजपा इस वर्ग के साथ अपने संपर्क को और मजबूत करना चाहती है। भाजपा की यह सक्रियता कांग्रेस के लिए भी एक संदेश है। यदि विपक्ष अभी भी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहा और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत नहीं कर पाया, तो सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद चुनावी लाभ उठाना आसान नहीं होगा। चुनाव केवल नाराजगी से नहीं जीते जाते, संगठन और रणनीति से भी जीते जाते हैं। इन बैठकों में विकास यात्रा की बात होती है। लेकिन क्या विकास की यात्रा गांव तक पहुंची? इन बैठकों में नाराजगी दूर करने की बात होती है। लेकिन क्या नाराज़गी का कारण समझने की कोशिश भी होगी? क्या जनता को सिर्फ चुनाव से पहले याद किया जाएगा? या फिर चुनाव के बाद भी गांवों की वही सड़कें, वही अस्पताल, वही स्कूल और वही पलायन चर्चा का विषय बने रहेंगे? उत्तराखंड की राजनीति अब चुनावी मोड़ पर पहुंच चुकी है। भाजपा जीत की हैट्रिक लगाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। संगठन सक्रिय है, रणनीति तैयार है और बूथ स्तर तक पहुंचने की योजना बन चुकी है। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम रणनीति किसी पार्टी के दफ्तर में नहीं बनती। वह बनती है उस मतदाता के मन में, जो हर चुनाव से पहले नेताओं की बातें सुनता है, वादे याद रखता है और मतदान वाले दिन चुपचाप अपनी उंगली से तय करता है कि हैट्रिक होगी या इतिहास बदलेगा।

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