शनिवार, 8 अगस्त 2026
हारी सीटों पर भाजपा की ‘किलेबंदी’
कोर कमेटी को विधानसभावार संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी
कमजोर बूथों से लेकर नाराज कार्यकर्ताओं तक की होगी पड़ताल
विस चुनाव 2027 से पहले हार वाली सीटों पर भाजपा का फोकस
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को और धार देना शुरू कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ पार्टी अब उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष नजर रख रही है, जहां पिछले चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों को जीत में बदलने के लिए पार्टी संगठन ने जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने की रणनीति बनाई है। इसी कड़ी में भाजपा कोर कमेटी के सदस्यों को विधानसभावार संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी दिए जाने की तैयारी है। संबंधित वरिष्ठ नेता अपने-अपने निर्धारित विधानसभा क्षेत्रों में जाकर संगठन की वास्तविक स्थिति का आकलन करेंगे। बूथ स्तर की सक्रियता, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, स्थानीय मुद्दों और चुनावी माहौल की जानकारी जुटाने के साथ ही पिछले चुनाव में हार के कारणों की भी पड़ताल की जाएगी। भाजपा के लिए यह कवायद इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है। पार्टी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं।
चुनाव में किसी सीट पर हार सिर्फ उम्मीदवार की हार नहीं होती। उसके पीछे संगठन की कमजोरी, स्थानीय नाराजगी, बूथ प्रबंधन, टिकट को लेकर असंतोष और चुनावी रणनीति की कमी जैसे कई कारण हो सकते हैं। भाजपा अब इन्हीं पहलुओं की समीक्षा करना चाहती है। कोर कमेटी के सदस्य जब विधानसभा क्षेत्रों में प्रवास करेंगे तो वहां पार्टी पदाधिकारियों, मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से संवाद किया जाएगा। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से यह समझने की कोशिश होगी कि आखिर पिछले चुनाव में पार्टी कहां कमजोर रही। क्या प्रत्याशी को लेकर नाराजगी थी?क्या स्थानीय संगठन सक्रिय नहीं था?क्या बूथ प्रबंधन में कमी रह गई? क्या पार्टी के पक्ष में माहौल होने के बावजूद वोटों का सही प्रबंधन नहीं हो पाया? या फिर स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा मुद्दा था, जिसने चुनावी समीकरण बदल दिया? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश होगी।
भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में हारी हुई विधानसभा सीटों पर पार्टी की रणनीति का केंद्र बूथ ही रहने वाला है। कहां पार्टी के बूथ कमजोर हैं, किन बूथों पर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हैं, किन क्षेत्रों में मतदाताओं के साथ संपर्क कमजोर है और किन इलाकों में विपक्ष को बढ़त मिली थीकृइन बिंदुओं पर फोकस किया जाएगा। पार्टी की कोशिश होगी कि चुनाव से काफी पहले बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत कर दिया जाए, ताकि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय कार्यकर्ता लगातार मतदाताओं के संपर्क में रहें। किसी भी चुनाव में संगठन की सबसे बड़ी ताकत कार्यकर्ता होता है। लेकिन चुनाव हारने के बाद कई बार कार्यकर्ताओं में निराशा और स्थानीय नेतृत्व को लेकर नाराजगी भी सामने आती है। भाजपा की संगठनात्मक प्रवास योजना में ऐसे कार्यकर्ताओं से संवाद को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पार्टी यह जानना चाहेगी कि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की क्या शिकायतें हैं। विधायक, पूर्व प्रत्याशी और संगठन के बीच तालमेल कैसा है। स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद तो नहीं हैं और कार्यकर्ताओं को चुनावी अभियान में किस तरह अधिक प्रभावी भूमिका दी जा सकती है। क्योंकि चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीता जाता। चुनाव बूथ पर खड़ा कार्यकर्ता जिताता है। उत्तराखंड की राजनीति में स्थानीय मुद्दों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। सड़क, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि, पेयजल और क्षेत्रीय विकास जैसे मुद्दे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का प्रवास इसलिए भी अहम होगा कि पार्टी को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की अलग राजनीतिक तस्वीर मिल सके। एक सीट पर जो मुद्दा महत्वपूर्ण है, जरूरी नहीं कि दूसरी सीट पर भी वही मुद्दा चुनावी प्रभाव रखता हो। इसलिए विधानसभा स्तर पर अलग रणनीति बनाने की दिशा में भी पार्टी आगे बढ़ सकती है।
संगठनात्मक प्रवास का उद्देश्य केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं माना जा रहा। पार्टी की कोशिश समस्याओं की पहचान के साथ उनके समाधान की दिशा में भी काम करने की होगी जहां संगठन कमजोर है, वहां नए सिरे से जिम्मेदारी तय की जा सकती है, जहां कार्यकर्ताओं में नाराजगी है, वहां संवाद बढ़ाया जा सकता है, जहां बूथ कमजोर हैं, वहां बूथ समितियों को सक्रिय किया जा सकता है और जहां स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर असंतोष है, वहां वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से स्थिति संभालने की कोशिश होगी। उत्तराखंड में भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनावों में सरकार बनाने में सफल रही है। अब पार्टी के सामने 2027 में सत्ता की हैट्रिक लगाने की चुनौती है। लेकिन तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए पार्टी को केवल अपनी मजबूत सीटों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। उसे उन सीटों पर भी प्रदर्शन सुधारना होगा, जहां पिछले चुनाव में उसे झटका लगा था। यही वजह है कि हारी हुई विधानसभा सीटें अब भाजपा की चुनावी रणनीति के केंद्र में आती दिख रही हैं। पार्टी की कोशिश साफ हैकृजहां पिछली बार कमी रह गई, वहां इस बार कोई गुंजाइश न छोड़ी जाए।
भाजपा की यह कवायद विपक्ष के लिए भी एक राजनीतिक संकेत है। जब सत्तारूढ़ दल चुनाव से महीनों पहले हारी हुई सीटों पर संगठनात्मक प्रवास शुरू कर रहा है, तो इसका अर्थ है कि पार्टी चुनाव को लेकर पूरी तरह सक्रिय मोड में आ चुकी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए भी यह चुनौती होगी कि वह इन विधानसभा क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करें और भाजपा की रणनीति का मुकाबला करने के लिए बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करें। 2027 का चुनाव अभी सामने नहीं आया है, लेकिन उसकी तैयारी जमीन पर शुरू हो चुकी है। भाजपा का संदेश साफ हैकृकि पिछली हार को भूलना नहीं है, उससे सीखना है। हारी हुई सीटों पर संगठन को भेजना है। कमजोर बूथों को मजबूत करना है। नाराज कार्यकर्ताओं को साथ लाना है। स्थानीय मुद्दों को समझना है और फिर उस पूरी तैयारी को चुनावी जीत में बदलना है। अब देखना होगा कि भाजपा की यह संगठनात्मक कवायद 2027 में कितनी सीटों का राजनीतिक गणित बदल पाती है।
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