शनिवार, 15 अगस्त 2026
गले में ‘डिग्रियां’ और आंखों में ‘आक्रोश’
उत्तराखंड में युवा वोट की नई कहानी, बेरोजगारों ने की राहुल गांधी से मुलाकात
धांधली और पेपर लीक से टूटे सब्र के बांध ने युवाओं को दिल्ली तक दौड़ाया
2027 के चुनाव में बैकफुट पर खड़ी कांग्रेस को संजीवनी देंगे राज्य के युवा
आखिर क्यों स्थानीय नेताओं के बजाय राहुल गांधी से गुहार लगाने पहुंचे बेरोजगार
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी साल का कैलेंडर अभी पूरी तरह चुनावी नहीं हुआ है, लेकिन बेरोजगार युवाओं की बेचौनी ने सियासत का मौसम जरूर बदल दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से उत्तराखंड के बेरोजगार युवाओं की मुलाकात को इसी बदलते माहौल की एक तस्वीर के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि कुछ बेरोजगार युवा राहुल गांधी से मिले। सवाल यह है कि वह अपनी बात लेकर राहुल गांधी तक क्यों पहुंचे? और उससे भी बड़ा सवालकृक्या रोजगार, भर्ती, परीक्षा और युवाओं के भविष्य का मुद्दा कांग्रेस को उस वोटर के करीब ले जा रहा है, जिससे पिछले चुनावों में वह पर्याप्त दूरी पर दिखाई दी थी? देहरादून में राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम का केंद्र भी यही मुद्दे रहे थे। शिक्षा, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता और पेपर लीक जैसे सवालों पर युवाओं ने अपनी बात रखी। कार्यक्रम में एक बेरोजगार युवक का डिग्रियों की माला पहनकर पहुंचना भी चर्चा का विषय बना था। यानी राहुल गांधी के सामने युवाओं की नाराजगी कोई अचानक पैदा हुई राजनीतिक कहानी नहीं है। कांग्रेस ने इसे सुनने और राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश पहले से शुरू कर रखी है।
यहां एक सावधानी जरूरी है। युवाओं की कांग्रेस से नजदीकी दिखाई देना और युवाओं का कांग्रेस के साथ आ जानाकृदो अलग बातें हैं। बेरोजगार युवा पहले नौकरी चाहता है, फिर राजनीति करता है। उसके लिए भाजपा या कांग्रेस से ज्यादा महत्वपूर्ण भर्ती की तारीख है। परीक्षा होगी या नहीं, परिणाम आएगा या नहीं, नियुक्ति मिलेगी या नहींकृउसकी राजनीति इन सवालों के आसपास घूमती है। इसलिए राहुल गांधी से मुलाकात को सीधे कांग्रेस के पक्ष में वोट का संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। लेकिन भाजपा के लिए इसमें खतरे का संकेत जरूर है। क्योंकि जब किसी सरकार के खिलाफ असंतोष बनता है तो विपक्ष को हमेशा अपना वोट बैंक बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। कभी-कभी सत्ता के खिलाफ जमा हो रहा सवाल ही विपक्ष के लिए राजनीतिक जगह बना देता है।
उत्तराखंड में भाजपा लगातार सत्ता में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार 2027 के चुनाव की तैयारी में है। कांग्रेस भी संगठन और चुनावी रणनीति को सक्रिय कर चुकी है। ऐसे में बेरोजगारी कांग्रेस के लिए केवल एक मुद्दा नहीं, बल्कि भाजपा को घेरने का संभावित राजनीतिक रास्ता बन सकती है। लेकिन भाजपा की परेशानी सिर्फ विपक्ष के सवालों से नहीं होगी। असली परेशानी तब होगी जब यही सवाल युवा मतदाता की निजी अनुभूति बन जाए, जिस युवा ने वर्षों प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की है, जिसने फीस भरी है, फार्म भरा है, परीक्षा की तैयारी की है और फिर भर्ती प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते देखे हैंकृउसके लिए बेरोजगारी अखबार की खबर नहीं है। वह उसकी जिंदगी है। राजनीति में यही फर्क बहुत बड़ा होता है।
उत्तराखंड में रोजगार का सवाल पलायन से भी जुड़ा है। पहाड़ का युवा नौकरी के लिए देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और दूसरे शहरों की ओर जाता है। गांव खाली होते हैं और चुनाव के समय यही गांव राजनीतिक भाषणों में विकास की कहानी बन जाते हैं। लेकिन युवा पूछ सकता हैकृअगर विकास हुआ है तो रोजगार मेरे गांव में क्यों नहीं है? यही सवाल कांग्रेस को राजनीतिक अवसर देता है और यही सवाल भाजपा के लिए चुनौती भी बन सकता है। राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में छात्रों और युवाओं के सवालों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की है। उत्तराखंड में छात्रों की गूंज कार्यक्रम भी इसी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन राजनीति में संवाद और वोट के बीच लंबी दूरी होती है।
युवा राहुल गांधी को सुन सकता है, बेरोजगारी पर कांग्रेस से सहमत हो सकता है, सरकार से नाराज भी हो सकता हैकृलेकिन मतदान के समय वह दूसरे मुद्दों पर फैसला कर सकता है। उत्तराखंड में राष्ट्रवाद, सैनिक पृष्ठभूमि, धार्मिक पर्यटन, स्थानीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और क्षेत्रीय समीकरण भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए कांग्रेस के लिए सबसे कठिन काम होगाकृयुवाओं की नाराजगी को स्थायी राजनीतिक भरोसे में बदलना। राहुल गांधी से बेरोजगारों की मुलाकात को भाजपा के लिए खतरे की घंटी कहा जा सकता है, लेकिन चुनाव का परिणाम नहीं। खतरा तब बनेगा जब बेरोजगारी का सवाल जाति, क्षेत्र और स्थानीय समीकरणों से ऊपर उठकर व्यापक युवा मुद्दा बन जाए। खतरा तब बनेगा जब युवा यह तय कर ले कि उसकी सबसे बड़ी समस्या सरकार की नीति है और उसका राजनीतिक विकल्प कांग्रेस है। अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि उत्तराखंड का युवा अब सिर्फ भाषण सुनने वाला युवा नहीं है। वह सवाल पूछ रहा है और लोकतंत्र में सत्ता के लिए सबसे कठिन समय वही होता है, जब सवाल पूछने वाला मतदाता सवाल के साथ मतदान केंद्र तक पहुंचता है।
कांग्रेस के लिए यह अवसर है। भाजपा के लिए चेतावनी और बेरोजगार युवाओं के लिए शायद यह सिर्फ एक राजनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि अपनी आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने की कोशिश है। आखिर चुनाव में नेता बहुत कुछ कहते हैं। लेकिन फैसला उस युवा को करना है, जिसने डिग्री हाथ में लेकर वर्षों इंतजार किया हैकृनौकरी का, न्याय का और अपने भविष्य का।
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