रविवार, 16 अगस्त 2026
बेटी बचाओ का ‘पाखंड’
गंगोलीहाट में सिस्टम का जनाजा, टपकती छत के नीचे घुटती शिक्षा
नारों में देश प्रथम, गंगोलीहाट में टपकती छत के नीचे बेटियाँ लाचार
खंडहर में पढ़ने को मजबूर बेटियां, बारिश में कक्षाओं में टपकता पानी
देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देशभर में बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर सरकार की प्राथमिकता बताता है। लेकिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट में राजकीय बालिका इंटर कालेज की तस्वीर इस दावे के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। यहां स्कूल भवन की हालत इतनी खराब बताई जा रही है कि बारिश के दौरान पानी कक्षाओं के भीतर तक पहुंच रहा है और छात्राओं को खस्ताहाल भवन में पढ़ाई करनी पड़ रही है। पर्वतीय क्षेत्र में शिक्षा की यह तस्वीर सिर्फ एक भवन की बदहाली नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो सरकारी योजनाओं और बड़े नारों के बीच स्कूल की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में पीछे छूटती दिखाई देती है। गंगोलीहाट के बालिका विद्यालय में बारिश के दौरान छत से पानी टपकने की समस्या छात्राओं और शिक्षकों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। कक्षाओं में पानी आने से पढ़ाई प्रभावित होने के साथ ही विद्यालय भवन की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।
पर्वतीय इलाकों में लगातार बारिश और भूस्खलन के बीच पुराने भवनों की स्थिति पहले से ही चिंता का विषय रहती है। ऐसे में किसी बालिका विद्यालय का भवन जर्जर हालत में होना केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि छात्राओं की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। देश में बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से लगातार अभियान चलाए जाते हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इसी सोच का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि बेटी को पढ़ाने के लिए सबसे पहले उसे सुरक्षित और सम्मानजनक स्कूल का वातावरण कौन देगा? गंगोलीहाट की तस्वीर इसी बुनियादी सवाल को सामने लाती है। अगर स्कूल की छत बारिश में पानी रोकने में सक्षम नहीं है, भवन की हालत खराब है और छात्राओं को असुरक्षित माहौल में पढ़ना पड़ रहा है, तो योजनाओं के प्रचार और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है।
उत्तराखंड में भाजपा की डबल इंजन सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के दावे करती रही है। लेकिन गंगोलीहाट का यह विद्यालय उन दावों की जमीनी परीक्षा ले रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सवाल यह है कि पर्वतीय जिलों के सरकारी विद्यालयों की वास्तविक स्थिति की नियमित निगरानी क्यों नहीं हो रही? पुराने और जर्जर भवनों की मरम्मत तथा पुनर्निर्माण के लिए समयबद्ध व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही? शिक्षा व्यवस्था केवल स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड या नई योजनाओं से मजबूत नहीं होती। उसकी पहली शर्त एक सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक, पीने का पानी, शौचालय और ऐसा वातावरण है जिसमें बच्चे बिना डर के पढ़ सकें।
सरकारें अपने कामकाज को जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार और जनसंपर्क पर खर्च करती हैं। राजनीतिक दल भी उपलब्धियों को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन एक सरकारी स्कूल की छत अगर बारिश में टपक रही हो तो वहां पढ़ने वाली छात्रा के लिए सरकारी विज्ञापन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। गंगोलीहाट की छात्राओं को भाषण नहीं, सुरक्षित कक्षा चाहिए। उन्हें नारे नहीं, ऐसी छत चाहिए जो बारिश में टपके नहीं। उन्हें योजनाओं की सूची नहीं, ऐसा स्कूल चाहिए जिसमें वे अपने भविष्य की नींव रख सकें।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में शिक्षा और सरकारी स्कूलों की स्थिति भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकती है। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में जहां सरकारी स्कूलों पर ही बड़ी संख्या में परिवार निर्भर हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भाजपा सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों पर घेरने की कोशिश करेंगे। भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह अपने विकास के दावों को पहाड़ के गांवों और कस्बों में मौजूद सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति से साबित करे। गंगोलीहाट का बालिका विद्यालय इसलिए एक स्थानीय खबर भर नहीं है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक है कि क्या पहाड़ की बेटियों को उनके गांव-कस्बे में सुरक्षित और बेहतर शिक्षा का अधिकार मिल पा रहा है? बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा तभी सार्थक होगा, जब बेटी को पढ़ने के लिए एक ऐसी छत मिले जो उसके सिर पर भरोसे से टिकी हो। गंगोलीहाट में टपकती छत उस भरोसे पर ही सवाल खड़ा कर रही है।
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