मंगलवार, 18 अगस्त 2026
‘शुद्धिकरण’ पर बढ़ा घमासान
कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सचिवालय और पुलिस मुख्यालय का घेराव कर सरकार को घेरा
21वीं सदी में भी इंसान की मौजूदगी से मंच को पवित्र और अशुद्ध मानने वाली सोच पर सवाल
अनुसूचित जाति विभाग के आह्वान के बाद विरोध-प्रदर्शन तेज, घटनाक्रम ने राजनीति का पारा चढ़ाया
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक मंच ने ऐसा क्या कर दिया कि उसके शुद्धिकरण की जरूरत पड़ गई? सवाल मंच का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जो किसी व्यक्ति के वहां खड़े होने के बाद मंच को ‘शुद्ध’ करने की जरूरत महसूस करती है। हल्द्वानी की घटना अब देहरादून पहुंच चुकी है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के आह्वान पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सचिवालय और पुलिस मुख्यालय का घेराव किया। नारे लगे। विरोध हुआ। सरकार से जवाब मांगा गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल शायद यह है कि हम 2026 में खड़े हैं या उस मानसिकता में, जहां इंसान की मौजूदगी से जगह अशुद्ध और किसी दूसरे की मौजूदगी से पवित्र हो जाती है?
कांग्रेस ने इस घटना को सामाजिक भेदभाव और दलित सम्मान से जोड़ते हुए प्रदेशभर में विरोध का फैसला किया है। जाहिर है, चुनावी राजनीति में हर मुद्दे का अपना गणित होता है। लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें केवल चुनावी गणित से नहीं देखा जा सकता। किसी सार्वजनिक मंच का शुद्धिकरण अगर किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान से जुड़ा है, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं रह जाती। यह समाज के सामने आईना रख देती है।
राजनीति में मंच इसलिए बनाया जाता है कि वहां से जनता की बात की जाए। भाषण दिए जाएं। सवाल उठाए जाएं। सरकार की योजनाएं बताई जाएं। विपक्ष अपनी बात रखे। लेकिन अगर उसी मंच पर खड़े होने वाले व्यक्ति की जाति मंच को अशुद्ध बना देती है, तो फिर सवाल मंच पर नहीं, उस सोच पर होना चाहिए और अगर कांग्रेस इस सवाल को उठाती है तो भाजपा को भी इसका जवाब देना चाहिए। जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, साफ शब्दों में। क्या ऐसी किसी घटना का समर्थन किया जाता है? क्या ऐसी सोच स्वीकार्य है? क्या संविधान के सामने जाति के आधार पर पवित्र और अपवित्र की कोई श्रेणी बची है? इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सचिवालय और पुलिस मुख्यालय तक पहुंचना बताता है कि पार्टी इस मुद्दे को सिर्फ सोशल मीडिया की बहस बनाकर छोड़ना नहीं चाहती। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और संविधान के सवाल के रूप में पेश कर रही है। लेकिन यहां कांग्रेस के सामने भी सवाल है। क्या यह लड़ाई केवल प्रदर्शन और नारों तक सीमित रहेगी? क्या पार्टी गांवों में जाकर बताएगी कि सामाजिक बराबरी का मतलब क्या है? क्या पार्टी अपने भीतर भी जातिगत भेदभाव के सवालों पर उतनी ही गंभीर होगी? क्योंकि सामाजिक न्याय सिर्फ सत्ता के खिलाफ भाषण देने से नहीं आता। उसके लिए समाज के भीतर भी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
उत्तराखंड खुद को देवभूमि कहता है। यहां मंदिर हैं, तीर्थ हैं, परंपराएं हैं। लेकिन इसी समाज में अगर किसी इंसान की मौजूदगी के बाद किसी मंच को शुद्ध करने की जरूरत पड़ती है तो यह सवाल देवभूमि से ज्यादा समाज की मानसिकता पर खड़ा होता है। धर्म और आस्था निजी विषय हो सकते हैं। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में जाति के आधार पर सम्मान और अपमान तय होने लगे तो लोकतंत्र बीच में आ जाता है और लोकतंत्र का संविधान कहता हैकृनागरिक बराबर हैं।न मंच किसी जाति का है, न सड़क किसी जाति की है, न सचिवालय किसी जाति का है और न पुलिस मुख्यालय। फिर शुद्धिकरण किसका? मंच का या मानसिकता का?
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। ऐसे में सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श का हिस्सा बनेंगे। मंच शुद्धिकरण का यह विवाद भी राजनीतिक रंग ले चुका है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई बताएगी। भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति बता सकती है। लेकिन जनता के सामने सवाल इससे बड़ा है। क्या राजनीति जाति के नाम पर मंच धोती रहेगी या समाज से जाति का मैल धोने की कोशिश भी करेगी? सच तो यह है कि पानी से मंच साफ हो सकता है, लेकिन सदियों की सोच पानी से नहीं धुलती। उसके लिए संविधान पढ़ना पड़ता है। बराबरी को स्वीकार करना पड़ता है। और सबसे जरूरीकृइंसान को इंसान समझना पड़ता है।
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