शनिवार, 8 अगस्त 2026
‘घर लौटने’ की राह में खड़ी ‘दीवार’
सरकार के दावों की हकीकत
ऋषभ पंत की आधी रात की गुहार और उत्तराखंड के दावों का कड़वा सच
उत्तराखंड राज्य के बड़े आयकरदाता को लगानी पड़ी गुहार तो आमजन कहा
सवालकृजब एक स्टार क्रिकेटर को घर लौटने में दिक्कत तो आम पहाड़ी कहां
देहरादून। रात के 12 बजकर 46 मिनट। देश के सबसे चर्चित क्रिकेटरों में शामिल ऋषभ पंत श्रीलंका दौरे पर हैं। टीम इंडिया के साथ क्रिकेट के मैदान पर मौजूद हैं। लेकिन इसी बीच उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट उत्तराखंड की व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा कर देता है। पंत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की अपील की। यह सिर्फ एक क्रिकेटर की व्यक्तिगत परेशानी की कहानी नहीं है। यह उस उत्तराखंड की कहानी भी है, जो लगातार प्रवासियों से कहता हैकृलौट आइए, अपने पहाड़ आइए, अपने गांव आइए। लेकिन जब कोई लौटना चाहता है तो उसके रास्ते में कौन-कौन सी दीवारें खड़ी हो जाती हैं?और इस सवाल को और गंभीर बना देता है ऋषभ पंत का कद।
ऋषभ पंत कोई सामान्य नाम नहीं हैं। वह उत्तराखंड से निकलकर भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारे बने। उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया, दुनिया के बड़े क्रिकेट मैदानों पर अपनी पहचान बनाई और उत्तराखंड के नाम को भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के नक्शे पर पहुंचाया। आयकर के लिहाज से भी पंत को उत्तराखंड के प्रमुख करदाताओं में गिना जाता रहा है। ऐसे में अगर राज्य का इतना बड़ा नाम अपने ही राज्य में लौटने से जुड़ी किसी परेशानी के लिए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से मदद मांग रहा है, तो सवाल सिर्फ पंत का नहीं रह जाता। सवाल व्यवस्था का हो जाता है। सोचिए सरकार कहती है कि उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन होगा। सरकार कहती है कि पहाड़ खाली नहीं होने दिए जाएंगे। सरकार कहती है कि प्रवासी उत्तराखंडियों को वापस लाया जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ अगर देश का एक बड़ा क्रिकेट स्टार अपने राज्य में दोबारा बसने की कोशिश में किसी अड़चन का सामना कर रहा है और उसे मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर पुकारना पड़ रहा है, तो हमें एक मिनट रुककर पूछना चाहिएकृकि क्या उत्तराखंड में वापस आना सचमुच इतना आसान है? ऋषभ पंत के पास अपनी बात सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की ताकत है। उनके पोस्ट को कुछ ही मिनटों में हजारों लोग देख सकते हैं। मीडिया उसे खबर बना देता है, सरकार संज्ञान ले सकती है और प्रशासन सक्रिय हो सकता है। लेकिन उस पहाड़ी नौजवान का क्या, जो दिल्ली, मुंबई या देहरादून से अपने गांव लौटना चाहता है? उसके पास कितने फालोअर हैं? वह मुख्यमंत्री को टैग करके कितनी आसानी से अपनी समस्या बता सकता है? शायद यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
उत्तराखंड का पलायन सिर्फ रोजगार की कहानी नहीं है। यह व्यवस्था की कहानी भी है। लोग पहाड़ छोड़कर शहरों में गए, किसी ने नौकरी की, किसी ने कारोबार किया,
किसी ने बच्चों को पढ़ाया, किसी ने मकान बनाया और अब कई लोग वापस लौटना चाहते हैं। लेकिन लौटने के साथ जमीन के कागज सामने आते हैं। राजस्व विभाग सामने आता है। स्थानीय अनुमति सामने आती है। सड़क और बिजली की समस्या सामने आती है। स्कूल और अस्पताल का सवाल सामने आता है और सबसे ऊपर आती है सरकारी प्रक्रिया। अगर किसी बड़े क्रिकेटर को भी इन प्रक्रियाओं में मदद की जरूरत पड़ रही है, तो आम आदमी की मुश्किल का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां ऋषभ पंत को लेकर सहानुभूति जताना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी परेशानी को एक केस स्टडी की तरह देखना चाहिए। क्योंकि अगर उत्तराखंड सच में चाहता है कि उसके बाहर गए लोग वापस आएं, तो उसे सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलेगा किकृ पना पहाड़ आपको बुला रहा है। पहाड़ बुला रहा है तो रास्ता भी आसान करना होगा।
यह सवाल थोड़ा असहज है, लेकिन पूछा जाना चाहिए कि जिस राज्य का नागरिक बाहर रहकर कमाता है, निवेश करता है, टैक्स देता है और फिर अपने घर लौटना चाहता हैकृक्या राज्य की मशीनरी उसके लिए इतनी सरल नहीं हो सकती कि उसे मुख्यमंत्री के दरवाजे तक अपनी बात लेकर न जाना पड़े? ऋषभ पंत की लोकप्रियता के कारण यह मामला सामने आ गया। लेकिन उत्तराखंड में ऐसे कितने लोग हैं जिनकी परेशानियां कभी सोशल मीडिया तक पहुंचती ही नहीं? कितने पूर्व प्रवासी अपने गांव लौटकर जमीन और प्रशासनिक उलझनों में फंस जाते हैं? कितने लोग वापस आने का विचार इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां काम करवाना मुश्किल है? इन सवालों का जवाब किसी वायरल पोस्ट से नहीं मिलेगा। इसके लिए सरकार को अपनी व्यवस्था देखनी होगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह सिर्फ एक व्यक्ति की मदद करने का मामला नहीं होना चाहिए। यह अवसर है। अगर ऋषभ पंत उत्तराखंड में वापस आना चाहते हैं तो सरकार उनकी समस्या का समाधान करे। लेकिन उसके साथ-साथ ऐसी व्यवस्था भी बनाए जिसमें अगला व्यक्ति मुख्यमंत्री को टैग करने के बजाय एक सरल पोर्टल, एक हेल्पडेस्क या एकल खिड़की के जरिए अपना काम करा सके। क्योंकि रिवर्स माइग्रेशन पोस्टर से नहीं, सिस्टम से आएगा। उत्तराखंड को ऐसे पहाड़ की जरूरत है जहां किसी ऋषभ पंत को भी अपने घर लौटने के लिए आधी रात को गुहार न लगानी पड़े और अगर पंत जैसे बड़े नाम को आवाज उठानी पड़ रही है, तो उन हजारों सामान्य उत्तराखंडियों के बारे में सोचना जरूरी है जिनकी आवाज मुख्यमंत्री तक कभी पहुंचती ही नहीं। रात के 12 बजकर 46 मिनट पर ऋषभ पंत की पोस्ट वायरल हुई। अब देखना यह है कि सरकार इसे सिर्फ एक क्रिकेटर की समस्या समझती है या उत्तराखंड में घर वापसी की पूरी व्यवस्था पर उठे सवाल के रूप में देखती है।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है किकृऋषभ पंत को मदद मिलेगी या नहीं? असली सवाल यह हैकृ जब उत्तराखंड का सबसे बड़ा नाम भी अपने घर लौटने के लिए गुहार लगाए, तो उस आम पहाड़ी की क्या स्थिति होगी जिसके पास न करोड़ों की कमाई है, न सोशल मीडिया की ताकत और न मुख्यमंत्री तक सीधे पहुंच? यही सवाल ऋषभ पंत की आधी रात की पोस्ट को एक क्रिकेट खबर से कहीं बड़ी खबर बना देता है।
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