रविवार, 9 अगस्त 2026
भाजपा की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
धामी ने कसा बूथ का पेच, सुस्त विपक्ष के लिए खतरे की घंटी
भाजपा की बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने किया चुनावी शंखनाद
मिशन 2027 के लिए संगठन को मैदान में उतरने का दिया संदेश
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती भले अभी शुरू न हुई हो, लेकिन सियासी मैदान में तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा की अहम बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हुंकार ने साफ कर दिया कि पार्टी अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने से लेकर संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय करने तक की रणनीति पर जोर के बीच धामी का संदेश साफ थाकृअब रुकना नहीं है, चुनावी मैदान में उतरना है। धामी की इस हुंकार को सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाला भाषण मानना राजनीतिक भूल होगी। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव का पूरा खाका दिखाई देता है। भाजपा सत्ता में है और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य उसके सामने है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जमीन तलाश रही है। ऐसे में भाजपा की यह बैठक विपक्ष के लिए भी संदेश है कि सत्तारूढ़ दल चुनावी लड़ाई को लेकर गंभीर है और संगठन को अभी से सक्रिय करने की तैयारी में जुट गया है।
मुख्यमंत्री धामी की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के लिए उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण चुनावी चेहरा बनकर उभरी है। 2022 में पार्टी के सत्ता में लौटने के बाद धामी के नेतृत्व में सरकार ने कई ऐसे फैसलों को राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया, जिन्हें भाजपा अब जनता के बीच लेकर जाने की तैयारी में है। अब चुनौती यह है कि सरकारी फैसले फाइलों से निकलकर मतदाता तक पहुंचें। यही वजह है कि भाजपा की रणनीति में संगठन को सबसे आगे रखा जा रहा है। धामी का संदेश कार्यकर्ताओं के लिए जितना स्पष्ट था, उतना ही विपक्ष के लिए भीकृभाजपा चुनाव का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि चुनाव से पहले ही चुनावी जमीन तैयार करेगी। कांग्रेस लंबे समय से सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे उठा रही है। विपक्ष की कोशिश है कि इन मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जाए।
भाजपा अब विपक्ष के इसी नैरेटिव का जवाब अपने विकास और जनकल्याणकारी फैसलों के जरिए देने की तैयारी में है। लेकिन भाजपा के सामने चुनौती भी कम नहीं है। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक राजनीतिक जोखिम है। कई सीटों पर विधायकों के कामकाज को लेकर कार्यकर्ताओं और जनता की राय पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगी। यानी धामी की हुंकार के बाद अब संगठन को केवल विपक्ष से नहीं, अपने भीतर की चुनौतियों से भी मुकाबला करना होगा।
भाजपा का चुनावी गणित हमेशा बूथ से शुरू होता है। बड़े नेताओं की रैलियां माहौल बना सकती हैं, लेकिन वोट बूथ पर पड़ता है। इसीलिए पार्टी कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं से लगातार संपर्क पर जोर दे रही है। भाजपा का लक्ष्य साफ हैकृचुनाव की घोषणा से पहले संगठन इतना मजबूत हो जाए कि आखिरी समय में उसे हड़बड़ी में व्यवस्था खड़ी न करनी पड़े। यह रणनीति कांग्रेस के लिए चुनौती है। कांग्रेस अगर चुनाव से कुछ महीने पहले संगठन को सक्रिय करने की कोशिश करती है और भाजपा पहले से बूथ पर पहुंच चुकी होती है, तो चुनावी मुकाबले का अंतर यहीं से बन सकता है।
भाजपा की चुनावी रणनीति चाहे जितनी मजबूत हो, अंतिम फैसला जनता को करना है। उत्तराखंड के गांवों में आज भी रोजगार और पलायन बड़ा सवाल है। पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, शिक्षा, सड़क और पेयजल जैसे मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बने रहेंगे। युवा रोजगार चाहता है। महिला सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन चाहती है। किसान अपनी उपज की कीमत चाहता है। गांव बुनियादी सुविधाएं चाहता है और पहाड़ चाहता है कि विकास केवल घोषणाओं में नहीं, जमीन पर भी दिखाई दे। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल यह बताने की नहीं होगी कि उसने क्या किया। चुनौती यह साबित करने की भी होगी कि सरकार के काम का असर आम आदमी की जिंदगी पर कितना पड़ा।
2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा की परीक्षा नहीं होगा। यह मुख्यमंत्री धामी के राजनीतिक नेतृत्व की भी बड़ी परीक्षा होगी। अगर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटती है तो धामी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। लेकिन अगर पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व और रणनीति पर सवाल उठेंगे। इसलिए बैठक में धामी की हुंकार के पीछे राजनीतिक दांव भी बड़ा है। यह केवल कार्यकर्ताओं से जोश मांगने का वक्त नहीं है। यह अपने नेतृत्व, संगठन और सरकार के रिपोर्ट कार्ड को जनता की अदालत में ले जाने की तैयारी है।
धामी की हुंकार को कांग्रेस शायद इसी वजह से हल्के में नहीं लेना चाहेगी। विपक्ष के सामने अब सवाल है कि वह भाजपा के मजबूत संगठन का मुकाबला किस रणनीति से करेगा? क्या कांग्रेस बूथ स्तर पर भाजपा की बराबरी कर पाएगी? क्या वह स्थानीय असंतोष को वोट में बदल पाएगी? क्या वह सरकार के खिलाफ मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदल सकेगी? या फिर भाजपा सरकार की योजनाओं और संगठन की ताकत के सामने विपक्ष का हमला बिखर जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे।
भाजपा की बैठक से एक बात साफ हैकृउत्तराखंड की राजनीति अब धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगी है। मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है। संगठन ने तैयारी शुरू कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह हुंकार कितनी जल्दी गांव, शहर, बूथ और मतदाता तक पहुंचती है। क्योंकि चुनाव भाषणों से शुरू जरूर होते हैं, लेकिन जीत मतदाता के दरवाजे पर तय होती है। धामी ने हुंकार भर दी है। अब भाजपा के सामने चुनौती है कि इस हुंकार को हर बूथ की आवाज बनाया जाए और विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इस आवाज का जवाब कैसे देता है। उत्तराखंड का 2027 चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसकी सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
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