मंगलवार, 11 अगस्त 2026

‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’

पहाड़ की हसुली गले में सजी धरोहर, पीढ़ियों की कहानी चांदी की चमक से कहीं ज्यादा गहरी है हसुली की पहचान पहाड़ की महिलाओं के गले से उतरकर अब संदूक में सिमटी देहरादून। पहाड़ की पगडंडियों पर चलते हुए अगर किसी बुजुर्ग महिला और बच्चों के गले पर नजर ठहर जाए तो वहां सिर्फ चांदी की चमक दिखाई नहीं देती। उस चमक में एक पूरा पहाड़ दिखाई देता हैकृमाटी की खुशबू, खेतों की मेहनत, लोकगीतों की मिठास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की कहानी। गले में सजी वह चांदी की हसुली इसी कहानी का एक हिस्सा है। कभी उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में हसुली बच्चों और महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों का अहम हिस्सा हुआ करती थी। विवाह, त्योहार, पारिवारिक समारोह या किसी खास अवसर पर पहाड़ की महिलाएं जब पारंपरिक परिधान पहनती थीं तो गले में सजी हसुली उनकी सुंदरता को अलग पहचान देती थी। लेकिन हसुली को केवल श्रृंगार कहना इसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रही है। हसुली आमतौर पर चांदी से बनाई जाती है और इसका आकार अर्धचंद्राकार या मोटे घुमावदार रूप में दिखाई देता है। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में इसके आकार, वजन और डिजाइन में अंतर मिलता है। कहीं यह साधारण होती है तो कहीं उस पर महीन नक्काशी दिखाई देती है। कहीं इसमें छोटे-छोटे घुंघरू या सजावटी तत्व जुड़े होते हैं। पहाड़ के सुनारों के लिए भी हसुली बनाना केवल धातु को आकार देना नहीं था। यह पीढ़ियों से चली आ रही एक कारीगरी थी। पुराने समय में जब बाजार दूर थे और तैयार आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, गांव के सुनार ही परिवार की पसंद और सामर्थ्य के हिसाब से आभूषण तैयार करते थे। हसुली भी उसी लोककारीगरी का हिस्सा थी। पहाड़ के समाज में बेटी की शादी सिर्फ दो व्यक्तियों का संबंध नहीं थी। इसके साथ कई परंपराएं और भावनाएं जुड़ी होती थीं। मायके से विदा होती बेटी को कपड़ों और अन्य सामान के साथ आभूषण भी दिए जाते थे। इनमें हसुली का अपना विशेष स्थान था। कई परिवारों में यह आभूषण मां से बेटी और फिर बेटी से उसकी अगली पीढ़ी तक पहुंचता रहा। इसलिए किसी पुराने संदूक में रखी हसुली केवल चांदी का गहना नहीं होती। वह मां के हाथों की याद होती है। वह नानी की कहानी होती है। वह उस घर की आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन की भी एक छोटी-सी निशानी होती है। एक हसुली के साथ परिवार की कई पीढ़ियां जुड़ी हो सकती हैं। हसुली की कहानी उस पहाड़ी महिला से भी जुड़ी है जिसने अपना जीवन खेत, जंगल और घर के बीच गुजारा। सुबह पानी लेने निकलना हो, घास काटने जंगल जाना हो, खेत में काम करना हो या घर के दूसरे कामकृपहाड़ की महिला का जीवन श्रम से भरा रहा है। ऐसे जीवन में गहने केवल सजने का साधन नहीं थे। वह उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा भी थे। त्योहार के दिन जब वही महिला अपनी पारंपरिक पोशाक पहनती, बालों में सजावट करती और गले में हसुली पहनती तो उसका रूप पहाड़ की लोकसंस्कृति का जीवंत चित्र बन जाता। हसुली की चमक में उस महिला का आत्मसम्मान भी दिखाई देता था। समय बदला तो पहाड़ का पहनावा भी बदलने लगा। गांवों से पलायन हुआ। नई पीढ़ी शहरों में पहुंची। कपड़े बदले, जीवनशैली बदली और आभूषणों की पसंद भी बदल गई। भारी पारंपरिक आभूषणों की जगह हल्के और आधुनिक डिजाइन के गहनों ने ले ली। नतीजा यह हुआ कि कभी रोजमर्रा और त्योहारों में दिखाई देने वाली हसुली अब कई घरों में संदूक के भीतर सुरक्षित रखी मिलती है। बुजुर्ग महिलाओं के गले में इसकी चमक अभी भी दिखाई देती है, लेकिन नई पीढ़ी में यह दृश्य लगातार कम हो रहा है। यह बदलाव सिर्फ फैशन का बदलाव नहीं है। यह उस लोकसंस्कृति के धीरे-धीरे बदलने की कहानी भी है जो कभी पहाड़ के दैनिक जीवन का हिस्सा थी। आज जब उत्तराखंड अपनी लोकसंस्कृति और पारंपरिक पहचान को पर्यटन से जोड़ने की बात कर रहा है, तब हसुली जैसे आभूषणों को सिर्फ संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन मिले। पारंपरिक डिजाइन को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ा जाए। युवा पीढ़ी को इन आभूषणों की कहानी बताई जाए और स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार मिले। क्योंकि संस्कृति सिर्फ किताबों में नहीं बचती। वह तब बचती है जब कोई बेटी अपनी मां की हसुली पहनकर आईने में खुद को देखती है और पूछती हैकृमां, यह तुम्हें किसने दी थी? और मां मुस्कुराकर कहती हैकृमेरी मां ने। यहीं से परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। हसुली की असली कीमत उसके चांदी के वजन में नहीं है। उसकी कीमत उस कहानी में है जो उसके साथ चलती है। यह पहाड़ की उन बेटियों की कहानी है जिन्होंने खेतों में पसीना बहाया, जंगलों से घास ढोई, परिवार संभाला और फिर भी त्योहार के दिन गले में हसुली सजाकर अपने पहाड़ की पहचान को जीवित रखा। आज हसुली भले ही कम दिखाई देती हो, लेकिन जब तक किसी पहाड़ी संदूक में वह सुरक्षित है, तब तक पहाड़ की एक कहानी भी सुरक्षित है। हसुली को बचाना यानी सिर्फ एक आभूषण को बचाना नहींकृपहाड़ की स्मृति को बचाना है।

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