बुधवार, 12 अगस्त 2026
विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’
बिना किसी आडंबर के स्त्री के सौंदर्य में निखार घोलती है एक छोटी-सी फूली
अलमारियों और नए कपड़ों के बीच पीछे छूटी, लेकिन पहचान अब भी कायम
आज आभूषण भले नए आ गए हों, मगर फूली का स्थान सिर्फ और सिर्फ दिल में
देहरादून। पहाड़ की सुबह में जब धूप धीरे-धीरे घरों की छतों पर उतरती थी, तब पहाड़ी आंगन में काम करती महिलाओं के चेहरे पर सादगी के साथ एक खास चमक भी दिखाई देती थी। माथे पर बिंदी, बालों में सादगी और नाक में चमकती छोटी-सी फूली। फूली बहुत बड़ा गहना नहीं थी। न वह भारी थी, न उसे पहनने के लिए किसी बड़े समारोह की जरूरत होती थी। लेकिन पहाड़ की स्त्री के श्रृंगार में उसकी अपनी जगह थी। कभी यह रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा रही, कभी त्योहारों और मेलों में सजी, तो कभी शादी-ब्याह के अवसर पर दुल्हन के चेहरे की शोभा बनी। आज समय बदल गया है। पहाड़ की पगडंडियों की जगह सड़कें आ गईं। संदूकची की जगह अलमारियों ने ले ली। पारंपरिक पहनावे की जगह आधुनिक फैशन ने ले ली। लेकिन कई पुराने घरों में फूली आज भी सुरक्षित है। वह गहना कम और याद ज्यादा है।
पहाड़ में गहनों को लेकर एक अलग भाव रहा है। गहना केवल सोने-चांदी का टुकड़ा नहीं रहा। वह परिवार की स्मृति भी रहा। मां के पास रखी फूली बेटी के लिए केवल आभूषण नहीं थी। उसमें मां के जीवन की यादें जुड़ी होती थीं। वही फूली किसी दिन बेटी की नाक में सजती तो उसके साथ मायके की स्मृतियां भी चली आतीं। दादी की संदूकची में रखी फूली की कहानी शायद किसी किताब में दर्ज न हो, लेकिन घर की बुजुर्ग महिलाओं को उसकी पूरी कहानी मालूम होती थी। कब बनवाई गई थी? किस सुनार ने बनाई थी? किस अवसर पर पहली बार पहनी गई? किस बेटी की शादी में इसे निकाला गया था? इन सवालों के जवाब परिवार की मौखिक परंपरा में सुरक्षित रहते थे।
पहाड़ी समाज में पारंपरिक आभूषणों ने महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान को भी आकार दिया है। फूली उन्हीं आभूषणों की श्रृंखला का हिस्सा रही है। इसकी खासियत उसका सादा सौंदर्य है। जहां बड़े आभूषण अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हैं, वहीं फूली चेहरे पर चुपचाप अपनी जगह बनाती है। नाक पर चमकता छोटा-सा सोने का बिंदु जैसे पहाड़ की किसी ऊंची चोटी पर पहली धूप। शायद इसलिए भी फूली को पहाड़ी श्रृंगार में इतना अपनापन मिला। फूली के पीछे पहाड़ के पारंपरिक सुनारों की मेहनत भी छिपी है। पुराने समय में आभूषण बनाना केवल कारोबार नहीं था। सुनार परिवारों की कारीगरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। स्थानीय डिजाइन, बारीक काम और ग्राहक के परिवार की पसंद को ध्यान में रखते हुए गहने तैयार किए जाते थे।
फूली छोटी जरूर थी, लेकिन उसे बनाने में कारीगर की उंगलियों की बारीकी दिखाई देती थी। सोने की पतली परत को आकार देना, उसकी गोलाई बनाना और उसे इस तरह तैयार करना कि वह चेहरे पर सहज लगेकृयह सब अनुभव की मांग करता था। आज मशीन से बने आधुनिक गहनों के दौर में हाथ की वह कारीगरी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पहाड़ में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज का उत्सव रहा है। दुल्हन के पारंपरिक श्रृंगार में कपड़ों के साथ आभूषणों की भी अपनी भूमिका रही। नाक के गहने चेहरे की सुंदरता को अलग पहचान देते थे। फूली इस श्रृंगार का हल्का लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
दुल्हन के चेहरे पर सादगी और पारंपरिक आभूषणों का मेल पहाड़ी संस्कृति की उस सुंदरता को सामने लाता था जिसमें दिखावे से ज्यादा अपनापन था। शादी के बाद भी फूली कई महिलाओं के रोजमर्रा के श्रृंगार का हिस्सा बनी रहती थी। फूली की कहानी केवल गहने की कहानी नहीं है। यह बदलते पहाड़ की कहानी भी है। पहाड़ से पलायन हुआ तो परिवार शहरों में पहुंचे। पहनावा बदला। नई पीढ़ी ने नए फैशन अपनाए। भारी पारंपरिक आभूषणों को संभालना मुश्किल हुआ। कई पुराने गहने बैंक के लॉकर में चले गए। कई संदूकचियों में बंद हो गए और कुछ बाजार में बेच दिए गए। फूली भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही। फिर भी उसकी खासियत यह है कि वह पूरी तरह गायब नहीं हुई। त्योहारों, पारंपरिक समारोहों और विवाहों में आज भी इसकी झलक दिखाई देती है।
नई पीढ़ी की कुछ युवतियां पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक पहनावे के साथ जोड़कर उन्हें नया रूप दे रही हैं। यानी फूली खत्म नहीं हो रही, बल्कि अपना नया रास्ता खोज रही है। किसी बुजुर्ग पहाड़ी महिला से अगर उसकी पुरानी फूली के बारे में पूछा जाए तो शायद वह उसके वजन या कीमत से पहले उसकी कहानी बताए। यह मेरी मां की थी। यह एक वाक्य ही उस गहने की पूरी कीमत बता देता है। सोने का बाजार भाव बदल सकता है। गहने का वजन कम या ज्यादा हो सकता है। डिजाइन पुराना पड़ सकता है। लेकिन मां की निशानी का कोई बाजार भाव नहीं होता। यही वजह है कि पुराने आभूषणों को परिवार संभालकर रखते रहे हैं।
आज फूली जैसी पारंपरिक धरोहर को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने जमाने में वापस भेज दिया जाए। जरूरत यह है कि परंपरा को आधुनिकता के साथ जोड़ा जाए। फूली के पारंपरिक डिजाइन को आधुनिक और हल्के आभूषणों में ढाला जा सकता है। स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। उत्तराखंड की पारंपरिक ज्वेलरी के डिजाइन का दस्तावेजीकरण किया जा सकता है। क्योंकि जब कोई पारंपरिक गहना बाजार से गायब होता है तो उसके साथ केवल एक डिजाइन नहीं जाताकृएक कारीगरी, एक स्मृति और संस्कृति का एक छोटा हिस्सा भी चला जाता है।
पहाड़ की फूली आकार में छोटी है, लेकिन उसकी कहानी बड़ी है। उसमें पहाड़ की बेटी का श्रृंगार है। मां की संदूकची है। दादी की स्मृति है। सुनार की कारीगरी है। विवाह के गीत हैं। त्योहारों की रौनक है और उस पहाड़ की पहचान है, जहां कम साधनों में भी जीवन को सुंदर बनाने की कला रही है। आज जरूरत है कि फूली को केवल पुराना गहना समझकर संदूक में बंद न कर दिया जाए। उसे कहानी की तरह अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। क्योंकि पहाड़ की फूली नाक पर जितनी छोटी दिखाई देती है, अपनी विरासत में उतनी ही बड़ी है।
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