गुरुवार, 6 अगस्त 2026

पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम

पहाड़ में यह सिर्फ बर्तन नहीं, घर की शान और समृद्धि की थी कभी पहचान मिट्टी, लकड़ी व धातु के पात्र में पकता शुद्ध घी और महकती पहाड़ी विरासत आधुनिकता की दौड़ में ओझल हुआ पहाड़ के सम्मान व स्वाभिमान का प्रतीक पहाड़ के गांवों में कभी कमोली में रखा घी बनता था रिश्तों व समृद्धि का प्रतीक देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है। यहां रसोई में बनने वाली हर चीज अपने भीतर एक इतिहास, एक परंपरा और जीवन-दर्शन समेटे हुए है। इन्हीं परंपराओं में एक नाम है घी की कमोली। आज की नई पीढ़ी के लिए यह शायद एक अपरिचित शब्द हो, लेकिन कभी पहाड़ के गांवों में कमोली केवल घी रखने का बर्तन नहीं, बल्कि समृद्धि, आत्मनिर्भरता और पारिवारिक सम्मान का प्रतीक मानी जाती थी। पहाड़ के पुराने घरों में जब गाय या भैंस का दूध मथा जाता था, तो उससे निकले मक्खन को धीमी आंच पर पकाकर शुद्ध घी बनाया जाता था। यह घी किसी प्लास्टिक के डिब्बे या स्टील के कंटेनर में नहीं, बल्कि विशेष प्रकार के पारंपरिक पात्रकृकमोलीकृमें सुरक्षित रखा जाता था। मिट्टी, लकड़ी या धातु से बनी यह कमोली लंबे समय तक घी को सुरक्षित रखने में सहायक होती थी और घर की रसोई की शान मानी जाती थी। कहावत थीकृजिस घर की कमोली भरी, उस घर की रसोई कभी खाली नहीं। यह केवल कहावत नहीं थी, बल्कि पहाड़ की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिंब थी। उस समय नकदी कम होती थी, लेकिन घर में अनाज, दाल, घी और मंडुवे का आटा ही असली संपत्ति माने जाते थे। पहाड़ के हरेला, घी संक्रांति, इगास, भिटौली और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर कमोली का घी विशेष रूप से निकाला जाता था। इसी घी से पूरी, अरसा, रोट, सिंगल, झंगोरे की खीर और कई पारंपरिक व्यंजन बनते थे। मेहमानों का स्वागत भी इसी घी से बने भोजन से किया जाता था। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक था। पहाड़ की एक खूबसूरत परंपरा यह भी रही कि विवाह के समय बेटी को दहेज के दिखावे की बजाय घर का बना शुद्ध घी दिया जाता था। कई परिवार कमोली भरकर घी अपनी बेटी को विदा करते थे। यह संदेश होता था कि बेटी अपने नए घर में भी मायके के स्नेह और संस्कारों की मिठास साथ लेकर जाए। समय बदला, संयुक्त परिवार टूटे, पशुपालन कम हुआ और बाजार का पैकेटबंद घी घरों तक पहुंच गया। इसके साथ ही कमोली भी धीरे-धीरे रसोई से गायब होने लगी। अब अधिकांश परिवार दूध और घी बाजार से खरीदते हैं। नई पीढ़ी के बहुत से बच्चों ने कमोली का नाम तक नहीं सुना। यह बदलाव केवल एक बर्तन का गायब होना नहीं है। यह उस आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का संकेत भी है, जहां हर घर अपनी जरूरत का दूध, दही, मक्खन और घी स्वयं तैयार करता था। कमोली हमें सिखाती है कि समृद्धि केवल बैंक बैलेंस से नहीं मापी जाती। आत्मनिर्भरता, श्रम, प्रकृति से जुड़ाव और संसाधनों का सम्मान भी किसी समाज की असली पूंजी होते हैं। आज जब आर्गेनिक उत्पादों और पारंपरिक खान-पान की मांग बढ़ रही है, तब पहाड़ की यह विरासत फिर से प्रासंगिक हो गई है। यदि गांवों में पशुपालन को बढ़ावा मिले, स्थानीय दुग्ध उत्पादों को बाजार मिले और पारंपरिक बर्तनों व हस्तशिल्प को संरक्षण दिया जाए, तो कमोली केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं रहेगी, बल्कि फिर से पहाड़ की रसोई में अपनी जगह बना सकती है। घी की कमोली केवल एक पात्र नहीं थी, बल्कि पहाड़ के जीवन की खुशबू थी। उसमें रखा घी मेहनत का स्वाद, मां के हाथों का स्नेह और गांव की आत्मनिर्भरता की कहानी सुनाता था। आधुनिकता की दौड़ में यदि हम ऐसी परंपराओं को भूल गए, तो हम केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी खो देंगे। शायद अब समय आ गया है कि पहाड़ अपनी कमोली को फिर से याद करेकृक्योंकि विरासत वही नहीं होती जो किताबों में लिखी हो, विरासत वह भी होती है जो कभी हमारी रसोई में महकती थी।

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