शुक्रवार, 14 अगस्त 2026
विकास का ‘खौफनाक’ रूप
विष्णुगढ़-पीपलकोटी परियोजना में हादसा
9 मजदूरों की मौत से फिर उठे जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा पर सवाल
बारिश के बाद अचानक भूस्खलन, टनल में तेजी से भरा पानी और मलबा
कई मजदूरों को सुरक्षित निकाला गया, घायलों का अस्पताल में इलाज जारी
पहाड़ में बड़ी निर्माण परियोजनाओं के मानकों पर फिर शुरू हो गई है बहस
देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले में पीपलकोटी के पास निर्माणाधीन टनल में पानी और मलबा घुसने से हुए हादसे ने एक बार फिर पहाड़ में चल रही बड़ी निर्माण परियोजनाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में नौ मजदूरों की मौत की पुष्टि हुई है। कई मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है, जबकि राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। हादसा गुरुवार को पीपलकोटी क्षेत्र में निर्माणाधीन विष्णुगढ़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की टनल में हुआ। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार भूस्खलन के बाद अचानक पानी और मलबा टनल के भीतर पहुंच गया। देखते ही देखते सुरंग का एक हिस्सा प्रभावित हो गया और वहां काम कर रहे मजदूरों के सामने मुश्किल स्थिति पैदा हो गई। बताया जा रहा है कि भारी बारिश के बीच टनल के भीतर अचानक पानी और मलबे का प्रवाह बढ़ गया। इसके चलते कई मजदूर अंदर फंस गए। सूचना मिलते ही जिला प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ समेत अन्य बचाव दल मौके पर पहुंचे। बचाव दलों ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच टनल के अंदर पहुंचकर मजदूरों को बाहर निकालने का अभियान शुरू किया। अब तक कई मजदूरों को सुरक्षित निकाला जा चुका है और घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया है।
हादसे के बाद जिला प्रशासन ने स्थिति की निगरानी तेज कर दी है। अधिकारियों के अनुसार मृतकों की संख्या बढ़कर नौ हो गई है। राहत और बचाव कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है और टनल के भीतर संभावित रूप से फंसे लोगों की तलाश जारी है। अलग-अलग समय पर सामने आई रिपोर्टों में अंदर फंसे या लापता मजदूरों की संख्या अलग बताई गई है, इसलिए अंतिम स्थिति रेस्क्यू अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगी। पीपलकोटी की घटना केवल एक दुर्घटना भर नहीं है। यह उत्तराखंड में पहाड़ों के भीतर चल रही बड़ी परियोजनाओं और उनमें काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। उत्तराखंड में सुरंगों, जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क निर्माण का काम लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पहाड़ का भूगोल बेहद संवेदनशील है। ऐसे में किसी भी निर्माण परियोजना में मौसम, भूगर्भीय परिस्थितियों और अचानक पानी के दबाव जैसे जोखिमों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। सिलक्यारा हादसे के बाद भी टनल सुरक्षा को लेकर देशभर में बहस हुई थी। अब पीपलकोटी की घटना ने उस बहस को फिर सामने ला दिया है।
हर बड़ी आपदा के बाद राहत और बचाव दलों की सक्रियता सराहनीय होती है, लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निर्माण से पहले और निर्माण के दौरान कितनी सावधानी बरती जाती है। टनल के भीतर काम करने वाले श्रमिकों के लिए आपातकालीन निकासी व्यवस्था, लगातार निगरानी, मौसम और भूगर्भीय परिस्थितियों की जानकारी तथा जोखिम की स्थिति में तत्काल काम रोकने जैसी व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा जरूरी है। किसी भी परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि वह कितनी जल्दी पूरी हुई, बल्कि इससे भी कि उसे पूरा करने में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित हुई।
टनल में काम करने वाले मजदूरों के लिए यह रोजगार था, लेकिन उनके परिवारों के लिए यही रोजी-रोटी का आधार था। हादसे में जान गंवाने वाले मजदूरों के परिवारों पर अचानक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। प्रशासन के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी हैकृएक ओर टनल के भीतर बचाव अभियान को सुरक्षित और तेज करना, दूसरी ओर मृतकों और घायलों के परिवारों को तत्काल हर संभव सहायता उपलब्ध कराना। पीपलकोटी हादसा उत्तराखंड को फिर वही सवाल पूछने पर मजबूर करता हैकृक्या हम पहाड़ के भीतर विकास की सुरंग तो बना रहे हैं, लेकिन उसमें काम करने वालों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त रास्ते बना पाए हैं? फिलहाल प्राथमिकता एक ही होनी चाहिएकृरेस्क्यू आपरेशन को सुरक्षित तरीके से पूरा करना और यदि कोई व्यक्ति अभी भी अंदर फंसा है तो उसे जल्द से जल्द बाहर निकालना। इसके बाद हादसे के कारणों की निष्पक्ष जांच और सुरक्षा मानकों की समीक्षा भी उतनी ही जरूरी होगी, ताकि पीपलकोटी की यह त्रासदी केवल एक और आंकड़ा बनकर न रह जाए।
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