सोमवार, 3 अगस्त 2026

कुदरत को ‘माल’ समझने वालों आंखें खोलो

दुनिया को बचाने का रास्ता गुजरता है हिमालय की देव संस्कृति से होकर गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति है सदियों से यहां की आस्था हजारों वर्षों से यहां पर्यावरण संरक्षण व सामाजिक संतुलन का जीवंत दर्शन देहरादून। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं का नाम नहीं है। यह उन सभ्यताओं का घर है, जिन्होंने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि देवत्व का स्वरूप माना। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के पर्वतीय समाज की पहचान केवल उनकी लोकभाषाओं, लोकगीतों और रीति-रिवाजों से नहीं होती, बल्कि उस देव संस्कृति से होती है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब हिमालयी समाज की यह परंपरा आधुनिक पर्यावरणीय सोच के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ बनकर उभरती है। यहां जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, नदी केवल पानी का साधन नहीं और पर्वत केवल खनिज संपदा का भंडार नहीं माने गए। इन्हें जीवनदाता और पूजनीय माना गया। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के अधिकांश गांवों में आज भी ग्राम देवता या स्थानीय देवी-देवताओं की परंपरा जीवित है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग देव परंपरा, अपने मेले, अपने अनुष्ठान और अपने लोकाचार हैं। इन देवस्थलों के आसपास के जंगलों, जलस्रोतों और चरागाहों को लंबे समय तक सामुदायिक संरक्षण मिलता रहा। अनेक स्थानों पर इन क्षेत्रों से पेड़ काटना, जलस्रोतों को प्रदूषित करना या वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाना धार्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से अनुचित माना जाता था। इस प्रकार आस्था ने संरक्षण की ऐसी व्यवस्था विकसित की, जिसे आज की भाषा में ष्सामुदायिक पर्यावरण प्रबंधनष् कहा जा सकता है। हिमालयी देव संस्कृति की जड़ें स्थानीय लोकविश्वासों और व्यापक सनातन परंपरा, दोनों से जुड़ी दिखाई देती हैं। पर्वतों को शिव का निवास, नदियों को मातृस्वरूप, वृक्षों को जीवनदायी और धरती को माता मानने की परंपरा ने प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया। हिमालयी क्षेत्रों में होने वाले अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाशकृइन पंचमहाभूतों का विशेष महत्व है। यह दृष्टिकोण केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि दैनिक जीवन, कृषि, पशुपालन और सामुदायिक व्यवहार में भी दिखाई देता है। स्थानीय देव परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने गांवों के सामाजिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई क्षेत्रों में विवादों के समाधान, सामुदायिक निर्णय, मेलों के आयोजन, जलस्रोतों की देखरेख और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़े नियमों में देवस्थानों और स्थानीय परंपराओं का प्रभाव देखा जाता रहा है। इससे सामाजिक अनुशासन और सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती थी। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के लोकपर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर भी हैं। हरेला, फूलदेई, इगास,घी संक्रांति, बग्वाल, नंदा देवी महोत्सव, जागर जैसी परंपराएं ऋतुओं, खेती, जंगलों, जल और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हैं। इन पर्वों के माध्यम से नई पीढ़ी तक यह संदेश पहुंचता है कि प्रकृति का सम्मान केवल पूजा से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण से भी होता है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, सड़क निर्माण, अनियोजित पर्यटन, जलवायु परिवर्तन और पलायन ने हिमालयी समाज की पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित किया है। कई गांव खाली हो रहे हैं। अनेक पारंपरिक मेले और अनुष्ठान सीमित होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी का अपनी लोकभाषाओं, लोककथाओं और देव परंपराओं से जुड़ाव भी पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही जंगलों, जलस्रोतों और पारंपरिक सामुदायिक संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विकास और परंपरा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है? आज पर्यावरण विशेषज्ञ सस्टेनेबल डेवलपमेंट और नेचर-बेस्ड साल्यूशंस की बात करते हैं। लेकिन हिमालयी समाज सदियों से अपने जीवन में इन सिद्धांतों का पालन करता आया है। प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग, सामुदायिक वन संरक्षण, जलस्रोतों की देखभाल, जैव विविधता का सम्मान और प्रकृति के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोणकृये सभी ऐसे तत्व हैं, जिनसे आधुनिक पर्यावरण नीति भी सीख ले सकती है। देव संस्कृति केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि हिमालय की सांस्कृतिक पहचान का आधार है। यदि यह परंपरा कमजोर होती है, तो उसके साथ लोकभाषाएं, लोककथाएं, लोकसंगीत, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली भी प्रभावित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हिमालय की इस विरासत को जीवित रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है। यदि युवा अपनी लोकसंस्कृति, देव परंपराओं और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को समझेंगे, तो यह विरासत भविष्य तक सुरक्षित रह सकेगी। इसके लिए विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की साझी भूमिका महत्वपूर्ण है। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति हमें यह सिखाती है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, उसके साथ संतुलित सह-अस्तित्व ही सभ्यता की वास्तविक पहचान है। यह परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी एक प्रासंगिक संदेश है। जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब हिमालय की यह लोकपरंपरा याद दिलाती है कि विकास का सबसे टिकाऊ माडल वही है, जिसमें जंगल केवल संसाधन नहीं, देवता हों, नदियां केवल जलधारा नहीं, जीवन हों और पर्वत केवल चट्टानें नहीं, हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रहरी हों।

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