शनिवार, 15 अगस्त 2026

‘गंगाजल, गौमूत्र और सियासी जहर’

मंच के शुद्धिकरण पर सियासत तेज,सवाल मंच का नहीं, राजनीति की सोच का भाषणों व नारों से आगे बढ़ी जंग, विरोधियों को अपवित्र ठहराने का नया पैंतरा जनमंच भी किसी एक की बपौती बना, जनता की आवाज की पवित्रता का क्या सत्ता और विपक्ष की इस गंदी लड़ाई में जनहित के असली मुद्दे चढ़ रहे हैं बलि देहरादून। उत्तराखंड में अब राजनीति सिर्फ भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रह गई है। मंच भी राजनीतिक संदेश देने लगे हैं और मंच के शुद्धिकरण की तस्वीरें राजनीति का नया हथियार बनती दिखाई दे रही हैं। किसी सार्वजनिक मंच पर कौन खड़ा हुआ, किसने क्या कहा और उसके बाद मंच को शुद्ध करने की जरूरत क्यों महसूस हुईकृइन सवालों ने सियासत को फिर गरमा दिया है। मुद्दा केवल इतना नहीं है कि मंच का शुद्धिकरण किसने कराया। असली सवाल यह है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की मौजूदगी को इतना अशुद्ध कैसे मान लिया गया कि उसके जाने के बाद मंच को पवित्र करने की जरूरत पड़ गई? राजनीति में मतभेद होते हैं। विचार अलग होते हैं। चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार भी होता है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध धीरे-धीरे सामाजिक और वैचारिक दूरी का प्रतीक बनने लगे, तब सवाल केवल राजनीति का नहीं रह जाता। सार्वजनिक मंच किसी एक पार्टी की निजी संपत्ति नहीं होता। वह जनता का मंच होता है। वहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसान हो या छात्र, कर्मचारी हो या सामाजिक कार्यकर्ताकृहर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। किसी के मंच पर आने से मंच अपवित्र और किसी दूसरे के आने से श्पवित्रश् हो जाता है तो फिर लोकतंत्र की पवित्रता का क्या होगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। मंच धोया जा सकता है, पानी से साफ किया जा सकता है, धार्मिक अनुष्ठान कराया जा सकता है, लेकिन समाज के भीतर पैदा की जा रही दूरी को किस पानी से धोया जाएगा? राजनीतिक विरोध लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन विरोध को नफरत में बदल देना लोकतंत्र की कमजोरी है। उत्तराखंड की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य की सामाजिक संरचना रिश्तों और साझा जीवन पर टिकी रही है। पहाड़ के गांव में राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन शादी-ब्याह, दुख-सुख और सामाजिक जीवन में लोग एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं। चुनाव खत्म होने के बाद भी गांव को उसी गांव में रहना होता है। फिर राजनीति ऐसी भाषा क्यों पैदा करे जिसमें सामने वाला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अशुद्ध दिखाई देने लगे? यही वह जगह है जहां सवाल भाजपा बनाम कांग्रेस से आगे निकल जाता है। सवाल किसी एक दल के चरित्र का नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक संस्कृति का है। आज यदि किसी नेता के भाषण से असहमति है तो जवाब भाषण से दिया जाना चाहिए। किसी नीति से विरोध है तो उसके खिलाफ आंदोलन होना चाहिए। किसी बयान पर आपत्ति है तो लोकतांत्रिक तरीके से विरोध होना चाहिए। लेकिन मंच को शुद्ध करके हम आखिर किसे संदेश दे रहे हैं? क्या जनता को यह बताया जा रहा है कि राजनीति में विरोधी के साथ बैठना भी अपवित्रता है? अगर ऐसा है तो फिर लोकतंत्र में संवाद कहां बचेगा? आज राजनीतिक दल संविधान की बात करते हैं, लोकतंत्र की बात करते हैं, जनता की बात करते हैं। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावी मंच पर नहीं, विरोधी के सम्मान में होती है, जिस दिन हम अपने विरोधी को बोलने का अधिकार देना बंद कर देंगे, उस दिन लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर हो जाएगा। मंच का शुद्धिकरण शायद कुछ लोगों के लिए धार्मिक या राजनीतिक कर्मकांड हो सकता है। लेकिन जनता के लिए यह एक बड़ा सवाल छोड़ जाता हैकृक्या राजनीति अब विचारों की लड़ाई से निकलकर छुआछूत जैसी मानसिकता की तरफ बढ़ रही है? इस सवाल का जवाब राजनीतिक दलों को देना होगा। क्योंकि मंच चाहे जितनी बार धोया जाए, इतिहास तस्वीरों को नहीं धोता। तस्वीर में अगर कोई राजनीतिक विरोधी खड़ा था तो उसे मिटाया नहीं जा सकता और अगर उस तस्वीर के बाद मंच को शुद्ध करने की जरूरत पड़ी, तो आने वाली पीढ़ियां मंच से ज्यादा उस मानसिकता के बारे में सवाल करेंगी जिसने शुद्ध-अशुद्ध का यह पैमाना बनाया। लोकतंत्र में मंच की पवित्रता किसी व्यक्ति से तय नहीं होती। उसकी पवित्रता इस बात से तय होती है कि वहां हर नागरिक की आवाज के लिए जगह है या नहीं। मंच धोने से मंच साफ हो सकता है। लेकिन राजनीति में बढ़ती नफरत साफ नहीं होती। उसके लिए सोच बदलनी पड़ती है।

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