गुरुवार, 13 अगस्त 2026
पहाड़ में संकट मोचन है ‘उचणा’
यह परंपरा है पहाड़ के इंसान को मानसिक ढाढस देने वाली लोक-आस्था
सदियों पुरानी मान्यता है बीमारी और विपदा में बनती है देव-शरण सहारा
आधुनिकता के दौर में भी पहाड़ के जीवन में देव-कोप का अटूट विश्वास
पहाड़ में बीमारी का इलाज सिर्फ दवा नहीं, होता है देवता पर भरोसा से भी
देहरादून। उचणा...पहाड़ की बोली का यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक पूरा लोकविश्वास समेटे हुए है। ऐसा विश्वास, जिसे समझने के लिए पहाड़ के किसी पुराने गांव की चौखट पर बैठना पड़ेगा। किसी बुजुर्ग से पूछना पड़ेगा कि जब घर में अचानक कोई बीमार पड़ जाए, परेशानी खत्म होने का नाम न ले या एक के बाद एक संकट सामने आने लगें तो आखिर गांव के लोग क्या कहते थे? जवाब शायद बहुत सहज होगाकृदेवता नाराज हो गए होंगे और फिर उसी बातचीत में कोई बुजुर्ग मुस्कुराते हुए कह सकता हैकृकि हम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा। बस, यही है पहाड़ का उचणा। यह कोई चिकित्सकीय शब्द नहीं। न इसका कोई वैज्ञानिक पैमाना है। यह पहाड़ की लोकमान्यता हैकृपीढ़ियों से चली आ रही वह आस्था, जिसमें बीमारी या बड़ी परेशानी को कभी-कभी देवता की नाराजगी से जोड़कर देखा जाता है और देवता की शरण में जाकर संकट से मुक्ति की कामना की जाती है।
आज किसी को बुखार हो तो डाक्टर है, जांच है, दवा है। बीमारी का कारण जानने के लिए चिकित्सा विज्ञान है। लेकिन पहाड़ के पुराने गांवों में तस्वीर कुछ अलग थी। अस्पताल दूर थे। सड़क नहीं थी। रात में तबीयत बिगड़ जाए तो गांव से बाहर निकलना भी चुनौती था। ऐसे में बीमारी परिवार के लिए केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरा संकट बन जाती थी और जब बीमारी लंबी खिंचती, घर में दूसरी परेशानी आ जाती या तमाम कोशिशों के बाद भी राहत नहीं मिलती तो बुजुर्गों की नजर एक बार देवता की ओर जरूर जाती। कहीं देवता नाराज तो नहीं? यह सवाल उस दौर के पहाड़ी समाज में असामान्य नहीं था। फिर देवस्थान की ओर कदम बढ़ते थे। पहाड़ में देवता घर से बाहर नहीं थे। वह गांव के बीच थे, खेतों के पास थे, जंगल और पानी के स्रोतों से जुड़े थे और लोगों की सामूहिक स्मृति में बसे थे। किसी परिवार पर संकट आया तो देवस्थान में जाना, पूजा-अर्चना करना, मन्नत मांगना या स्थानीय परंपरा के अनुसार देवता से जुड़ी प्रक्रिया अपनाना उसी सामाजिक जीवन का हिस्सा था। मकसद थाकृदेवता की नाराजगी दूर हो और घर पर फिर से सुख-शांति लौटे। इसलिए उचणा रखने के बाद डर खत्म हो जाता था। क्योंकि इसमें एक उम्मीद भी है। अगर देवता नाराज हुए हैं तो उन्हें मनाया भी जा सकता है। अगर संकट देवता की नाराजगी का संकेत है तो देवता की कृपा से रास्ता भी निकल सकता है। शायद इसी भरोसे से पहाड़ का बुजुर्ग कहता थाकृहम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा।
इस एक वाक्य को गौर से सुनिए। हम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा। इसमें पहाड़ की वह मानसिकता छिपी है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद को बचाए रखा। यहां ठीक होना सिर्फ बीमारी से बाहर निकलना नहीं है। यह संकट के बाद जीवन के फिर पटरी पर लौटने का भरोसा है। देवता नाराज हो सकते हैं, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। संकट आ सकता है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगा। यही विश्वास पहाड़ के लोगों को कठिन समय में मानसिक सहारा देता रहा। आज पहाड़ बदल चुका है। गांवों तक सड़कें पहुंची हैं। अस्पताल हैं। मोबाइल है। इंटरनेट है। नई पीढ़ी बीमारी के कारणों को विज्ञान की नजर से देखती है। लेकिन आस्था अपनी जगह अब भी कायम है। किसी घर में बीमार व्यक्ति का इलाज अस्पताल में चल रहा है और उसी परिवार का कोई सदस्य देवस्थान में जाकर दिया जला रहा हैकृयह दृश्य पहाड़ में आज भी असामान्य नहीं है। यानी पहाड़ ने हमेशा जरूरी नहीं समझा कि उसे दवा या देवता में से किसी एक को चुनना है। वह दोनों को अपने जीवन में जगह देता रहा। दवा शरीर के लिए है। देवता मन के भरोसे के लिए और संकट के समय दोनों की जरूरत महसूस हो सकती है।
कई जगह इस लोकमान्यता का संबंध केवल बीमारी से नहीं, बल्कि परिवार पर आने वाली किसी बड़ी परेशानी या लगातार घट रही अनहोनी जैसी घटनाओं से भी जोड़ा जाता रहा है। घर में बार-बार परेशानी हो रही है। काम बिगड़ रहे हैं। परिवार में संकट खत्म नहीं हो रहा। तब कोई बुजुर्ग कह सकता हैकृकि कुछ तो उचणा है और फिर सवाल बीमारी से हटकर देवता तक पहुंच जाता है। यही वह जगह है जहां उचणा एक शब्द से बढ़कर लोकविश्वास का संकेत बन जाता है। पहाड़ से लोग निकले तो सिर्फ घर नहीं छूटे। बोलियां छूटीं। कहानियां छूटीं। लोकगीत छूटे। देवस्थल से जुड़ी कई परंपराएं छूटीं और ऐसे ही कई शब्द भी पीछे रह गए, जिन्हें अगली पीढ़ी शायद समझ भी न पाए। उचणा उन्हीं शब्दों में से एक है। आज शहर में पली-बढ़ी पहाड़ की नई पीढ़ी से पूछा जाए कि उचणा क्या होता है, तो शायद कई चेहरों पर सवाल दिखाई देगा। लेकिन गांव में किसी बुजुर्ग से पूछिए। वह बिना शब्दकोश खोले बता देगा। फिर शायद कोई अपनी जिंदगी का किस्सा भी सुनाएगाकृ फलां साल घर में बड़ी परेशानी आई थी... सबने कहा देवता उचणा गए हैं... फिर देवस्थान गए... सब ठीक हो गया। वह घटना वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। लेकिन उसके लिए वह जीवन का अनुभव है। यही लोकविश्वास की ताकत है।
उचणा को बचाने का मतलब किसी मान्यता को सही या गलत साबित करना नहीं है। जरूरत इस बात की है कि पहाड़ के ऐसे शब्दों और उनसे जुड़ी लोकस्मृतियों को दर्ज किया जाए। क्योंकि किसी समाज की पहचान केवल उसके पहाड़, नदियों और मंदिरों से नहीं होती। उसकी पहचान उसकी बोली में छिपी स्मृतियों से भी होती है। उचणा ऐसी ही एक स्मृति है। एक ऐसा शब्द जिसमें बीमारी का डर है, देवता की नाराजगी का विश्वास है, संकट से निकलने की उम्मीद है और सबसे बढ़करकृमुश्किल समय में टूटने से इनकार करता पहाड़ का मन है। इसलिए जब अगली बार किसी पुराने पहाड़ी गांव में कोई बुजुर्ग कहेकृ हम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा... तो इसे सिर्फ एक वाक्य समझकर आगे मत बढ़ जाइएगा। उस एक वाक्य में पहाड़ की कई पीढ़ियों की आस्था, अनुभव और उम्मीद बोल रही होगी। शायद यही किसी लोकशब्द की सबसे बड़ी ताकत हैकृवह छोटा होता है, लेकिन उसके भीतर पूरा पहाड़ समाया होता है।
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