गुरुवार, 13 अगस्त 2026
बयानों में ‘चर्चा’ और सवालों पर ‘ताला’
सरकार का दावाकृहर सवाल पर बहस को तैयार, विपक्ष की जिद
नीति-निर्माण के बजाय आरोपों और तमाशों का केंद्र बनी संसद
भाग कौन रहा जवाब देने से बचती सरकार या हंगामा करता विपक्ष
नई दिल्ली। संसद चलाने की जिम्मेदारी किसकी है? सरकार की, विपक्ष की या दोनों की? यह सवाल हर मानसून सत्र में लौटकर आता है और हर बार जवाब की जगह आरोपों की नई फाइल खुल जाती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि मोदी सरकार संसद में हर प्रकार की चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि वह संसद में किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं, लेकिन विपक्ष चर्चा ही नहीं होने देना चाहता। भाजपा और मोदी सरकार की ओर से लगातार यही कहा जा रहा है कि विपक्ष संसद चलने दे, सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। बयान सुनने में सीधा है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल बयान से आगे शुरू होता है। अगर सरकार हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार है तो विपक्ष को चर्चा से भागने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? और अगर विपक्ष चर्चा चाहता है तो फिर संसद को बाधित करना ही उसका रास्ता क्यों बन जाता है?
संसद कोई टीवी स्टूडियो नहीं है, जहां दो लोग एक-दूसरे की आवाज दबाकर घर चले जाएं। संसद वह जगह है जहां जनता के सवालों का रिकॉर्ड बनना चाहिए। वहां सवाल पूछे जाएं, सरकार जवाब दे, विपक्ष जवाब पर सवाल उठाए और देश देखे कि किसके पास तथ्य हैं और किसके पास सिर्फ नारे। लेकिन आज संसद के भीतर भी राजनीति का एक अजीब दृश्य दिखाई देता है। सरकार कहती हैकृहम चर्चा के लिए तैयार हैं। विपक्ष कहता है पहले हमारी मांग मानिए। सरकार कहती हैकृसदन चलने दीजिए। विपक्ष कहता हैकृपहले हमारे मुद्दे पर चर्चा कराइए और इस रस्साकशी के बीच वह नागरिक खड़ा है, जिसके वोट से संसद बनी है। वह पूछता हैकृमेरे सवाल पर चर्चा कब होगी?
अमित शाह का बयान अपने आप में विपक्ष के लिए राजनीतिक चुनौती है। यदि सरकार सचमुच हर विषय पर चर्चा के लिए तैयार है तो विपक्ष के सामने अब दो रास्ते हैंकृसंसद में जाकर सवाल पूछे या फिर सदन के बाहर खड़े होकर सवाल पूछता रहे। लोकतंत्र में माइक बंद होने से सवाल खत्म नहीं होते। लेकिन दूसरी तरफ सरकार के लिए भी यह कहना पर्याप्त नहीं कि वह चर्चा के लिए तैयार है। लोकतंत्र में तैयारी का प्रमाण सार्थक बहस होती है। किसी मुद्दे पर चर्चा कितने घंटे हुई? कितने सांसदों को बोलने का अवसर मिला? सरकार ने विपक्ष के सवालों का क्या जवाब दिया? कौन से सुझाव स्वीकार किए गए? कौन से सवाल अनुत्तरित रह गए? यही असली परीक्षा है। क्योंकि संसद में सिर्फ यह कहना कि हम चर्चा के लिए तैयार हैं उतना ही आसान है, जितना विपक्ष का यह कहना कि सरकार चर्चा से भाग रही है। मुश्किल है दोनों पक्षों का सदन में बैठकर जनता के सामने जवाब देना।
जब सदन नहीं चलता तो नुकसान सिर्फ सांसदों का नहीं होता। उस किसान का सवाल भी रुकता है जो अपनी फसल की कीमत जानना चाहता है। उस छात्र का सवाल भी रुकता है जो परीक्षा व्यवस्था पर जवाब चाहता है। उस युवा का सवाल भी रुकता है जो नौकरी के आंकड़े पूछना चाहता है। उस परिवार का सवाल भी रुकता है जो महंगाई के बीच अपना घरेलू बजट संभाल रहा है और उस नागरिक का सवाल भी रुकता है जो जानना चाहता है कि उसके टैक्स का पैसा कहां खर्च हो रहा है। इसलिए संसद का हर मिनट केवल राजनीतिक समय नहीं है। वह जनता का समय है। जनता ने सांसदों को संसद भेजा है ताकि वह बहस करें। नारे लगाने के लिए नहीं। सरकार को जवाब देने के लिए भेजा है। सिर्फ सरकारी उपलब्धियां गिनाने के लिए नहीं। विपक्ष को सवाल पूछने के लिए भेजा है। सिर्फ हंगामा करने के लिए नहीं।
सरकार के खिलाफ सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। सरकार का जवाब देना उसका दायित्व है। विपक्ष का विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। लेकिन विरोध अगर बहस का रास्ता बंद कर दे तो सवाल उठेगा कि फिर लोकतंत्र में संवाद कहां होगा? और सरकार अगर बहस को सिर्फ औपचारिकता बना दे तो सवाल विपक्ष से आगे बढ़कर सरकार से भी पूछा जाएगा। संसद में असहमति होनी चाहिए। बहस तीखी होनी चाहिए। सरकार से असहज सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन अंत में सदन चलना चाहिए। क्योंकि संसद का मतलब ही हैकृबात करना, जिस देश में संसद में बात नहीं होगी, वहां सवाल सड़क पर आएंगे और जब सवाल सड़क पर आते हैं तो राजनीति ज्यादा शोर करती है, लेकिन लोकतंत्र कम सुनता है।
अमित शाह ने विपक्ष से सदन चलने देने की अपील की है। यह अपील केवल विपक्ष के लिए नहीं, सत्ता पक्ष के लिए भी एक अवसर है। सदन चलाइए। विपक्ष को पर्याप्त समय दीजिए। कठिन सवालों के जवाब दीजिए। आंकड़े रखिए। दस्तावेज रखिए, जहां सरकार सही है, वह बताए कि क्यों सही है। जहां गलती हुई है, वहां यह भी बताए कि उसे कैसे सुधारा जाएगा और विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी निभाए। वह सिर्फ हंगामा न करे। सवालों की सूची लेकर सदन में आए। तथ्य लेकर आए। सरकार को घेरना है तो तर्क से घेरे। जनता को यह देखने दीजिए कि सत्ता के पास जवाब कितने हैं और विपक्ष के पास सवाल कितने मजबूत। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खराब स्थिति वह नहीं है जब सरकार से सवाल पूछे जाते हैं। सबसे खराब स्थिति वह है जब सवाल और जवाब दोनों संसद से बाहर निकल जाते हैं। अमित शाह कह रहे हैंकृसरकार जवाब देने को तैयार है। विपक्ष कह रहा हैकृसरकार जवाब नहीं देना चाहती। अब फैसला किसका? संसद का। लेकिन उससे भी बड़ा फैसला जनता का है। वह सब देख रही हैकृकौन चर्चा चाहता है, कौन चर्चा की शर्तें तय करना चाहता है और कौन चर्चा के नाम पर सिर्फ राजनीति करना चाहता है। संसद को चलना चाहिए। बहस होनी चाहिए। सवाल पूछे जाने चाहिए। जवाब दिए जाने चाहिए और अगर जवाब संतोषजनक न हों तो अगला सवाल और ज्यादा तीखा होना चाहिए।यही लोकतंत्र है। क्योंकि संसद में शोर की जीत नहीं होनी चाहिए।सवाल की जीत होनी चाहिए।
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