रविवार, 30 अगस्त 2026

यूकेडी के सियासी तेवर ‘तल्ख’

उत्तराखंडियत के मुद्दे पर भाजपा व कांग्रेस को घेरने की तैयारी संगठन विस्तार से लेकर बूथ तक सक्रियता बढ़ाने पर दिया जोर देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ उत्तराखंड क्रांति दल ने भी अपने सियासी तेवर तल्ख करने शुरू कर दिए हैं। राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत का दावा करने वाला दल अब भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। पार्टी का फोकस एक बार फिर उत्तराखंडियत, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन और पहाड़ के अधिकारों जैसे मुद्दों पर है। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राज्य गठन के आंदोलन से निकली उसकी राजनीतिक ताकत को चुनावी वोट में कैसे बदला जाए। पिछले चुनावों में संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार के कारण दल उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाया। लेकिन 2027 को लेकर पार्टी अब पहले से ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है। यूकेडी का मानना है कि उत्तराखंड बनने के बाद भी पहाड़ के मूल सवाल जस के तस हैं। रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन, जमीनों की खरीद-फरोख्त, गांवों का खाली होना और पहाड़ में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर दल भाजपा और कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा करने की तैयारी में है। पार्टी की रणनीति साफ हैकृउत्तराखंड के सवाल पर किसी राष्ट्रीय दल को राजनीतिक स्पेस नहीं दिया जाए। मूल निवास और सशक्त भू-कानून यूकेडी के प्रमुख मुद्दों में हैं। पार्टी इन सवालों को केवल विधानसभा के भीतर उठाने के बजाय गांव-गांव तक ले जाने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही बेरोजगार युवाओं, पूर्व सैनिकों, महिलाओं और राज्य आंदोलनकारियों से जुड़े मुद्दों को भी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाने पर जोर है। उत्तराखंड की राजनीति में यूकेडी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा और कांग्रेस के बीच बने मजबूत द्विध्रुवीय मुकाबले को तोड़ना है। क्षेत्रीय दल होने के बावजूद यूकेडी अभी तक ऐसा व्यापक जनाधार नहीं बना सका है जो उसे सत्ता के निर्णायक विकल्प के रूप में स्थापित कर सके। यही वजह है कि पार्टी अब केवल मुद्दों की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और संभावित प्रत्याशियों को समय रहते सक्रिय करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। यूकेडी की कोशिश है कि चुनाव आने तक पार्टी का चेहरा केवल राज्य आंदोलन की पार्टी तक सीमित न रहे, बल्कि जनता के सामने सत्ता का वैकल्पिक माडल भी पेश करे। यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर पहाड़ के साथ न्याय न करने का आरोप लगाता रहा है। ऐसे में चुनावी मैदान में पार्टी का सबसे बड़ा हथियार यही नैरेटिव हो सकता है कि राष्ट्रीय दलों की सरकारों ने राज्य गठन की मूल अवधारणाओं को कमजोर किया। भू-कानून और मूल निवास के सवाल पर युवाओं में बढ़ती चर्चा को देखते हुए यूकेडी इन्हें चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी की कोशिश होगी कि इन मुद्दों को भावनात्मक नारों से आगे ले जाकर रोजगार, जमीन और स्थानीय अधिकारों से जोड़ा जाए। हालांकि यूकेडी के लिए केवल आक्रामक बयानबाजी पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह भी साबित करना होगा कि वह चुनावी संगठन, प्रत्याशी चयन, संसाधन और बूथ प्रबंधन के मोर्चे पर भाजपा-कांग्रेस का मुकाबला करने की स्थिति में है। पार्टी के सामने बिखरे हुए क्षेत्रीय मतों को एकजुट करने और छोटे क्षेत्रीय समूहों को साथ लाने की चुनौती भी है। यदि यूकेडी इस दिशा में सफल होता है तो 2027 के चुनाव में वह कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है। आने वाला विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और प्रासंगिकता की भी परीक्षा है। पार्टी जितनी आक्रामकता से भाजपा-कांग्रेस को घेरने की कोशिश करेगी, उतना ही जनता उसके सामने यह सवाल रखेगी कि राज्य के लिए उसके पास सिर्फ मुद्दे हैं या सरकार चलाने का ठोस रोडमैप भी। फिलहाल यूकेडी ने संकेत दे दिया है कि 2027 के रण में वह दर्शक बनकर नहीं बैठने वाला। उत्तराखंडियत की जमीन पर अपना झंडा फिर बुलंद करने के लिए यूकेडी ने कमर कस ली है। अब असली परीक्षा यह है कि आक्रामक तेवर वोट में कितने बदलते हैं।

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