रविवार, 30 अगस्त 2026
राष्ट्रीय फलक पर गूंजा ‘शुद्धिकरण’ विवाद
मुद्दाविहीन कांग्रेस कर रही तुष्टिकरण की राजनीति,कांग्रेस बोली-भाजपा असली मुद्दों से ध्यान भटका रही
भाजपा का हमलाकृजनता के सवालों से बचने के लिए कांग्रेस धार्मिक और जातीय मुद्दों का सहारा
संसद से लेकर प्रदेश के गलियारों तक गरमाई राजनीति, 2027 की लड़ाई के साफ हुए शुरुआती संकेत
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव भी लगातार धार पकड़ रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर मुद्दाविहीन राजनीति और तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए हमला तेज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं है, इसलिए वह धार्मिक, जातीय और भावनात्मक मुद्दों को हवा देकर राजनीतिक जमीन तलाश रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और पर्यटन जैसे सवालों पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए। इसके बजाय पार्टी ऐसे मुद्दों को तूल दे रही है, जिनसे समाज में राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा हो सकता है। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद को लेकर कांग्रेस की आक्रामकता को भी भाजपा इसी रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि स्थानीय घटना को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक हमला यही है कि कांग्रेस के पास प्रदेश की जनता को देने के लिए कोई स्पष्ट विजन नहीं है। पार्टी नेताओं के अनुसार चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस जाति, धर्म और कथित सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को आगे कर रही है, जबकि प्रदेश के विकास से जुड़े सवालों पर उसका एजेंडा स्पष्ट नहीं है। भाजपा इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड की जनता विकास, रोजगार और बेहतर सुविधाएं चाहती है, लेकिन कांग्रेस का राजनीतिक विमर्श लगातार ऐसे मुद्दों की ओर जा रहा है जो भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। भाजपा की रणनीति भी साफ दिखाई दे रही है। वह कांग्रेस को विकास के सवाल पर घेरने के साथ-साथ उसके राजनीतिक मुद्दों को वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
कांग्रेस भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार कर रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सामाजिक सम्मान, संविधान, बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को तुष्टिकरण कहना भाजपा की राजनीतिक रणनीति है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के बजाय विपक्ष पर आरोप लगाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रही है। पार्टी का दावा है कि प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और आपदा जैसे सवाल आज भी जनता के सामने हैं और वह इन्हीं मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में जाएगी। यानी दोनों दलों ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है।
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई भी बनने जा रहा है। भाजपा जहां कांग्रेस को तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस भाजपा को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और जनसमस्याओं पर जवाबदेह बनाने की तैयारी में है। इस राजनीतिक जंग में दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे जनता के सामने अपना एजेंडा कितनी मजबूती से रख पाते हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है कि उसे भाजपा के मजबूत संगठन और सत्ता विरोधी भावनाओं के बीच अपनी चुनावी जमीन तैयार करनी है। वहीं भाजपा के सामने सत्ता में वापसी की हैट्रिक का लक्ष्य है, जिसके लिए उसे सरकार के कामकाज को लेकर जनता के सवालों का जवाब भी देना होगा।
आने वाले महीनों में हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद, धार्मिक पहचान, सामाजिक सम्मान और तुष्टिकरण जैसे मुद्दे उत्तराखंड की राजनीति में और उछल सकते हैं। चुनावी माहौल बनने के साथ राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों को अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। लेकिन जनता के सामने सवाल इससे बड़ा है। क्या चुनाव की राजनीति बेरोजगार युवा को रोजगार देगी? क्या पहाड़ से पलायन रोकने का रोडमैप सामने आएगा? क्या आपदा प्रभावित गांवों को सुरक्षित बनाने की ठोस योजना बनेगी? क्या स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाल व्यवस्थाओं पर कोई दल स्पष्ट जवाब देगा? यही वह सवाल हैं जिनसे कोई भी राजनीतिक दल लंबे समय तक बच नहीं सकता।
भाजपा कांग्रेस को मुद्दाविहीन बताकर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगा रही है। कांग्रेस पलटकर भाजपा पर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की सियासी तलवारें खिंच चुकी हैं। लेकिन 2027 के चुनाव में अंतिम फैसला नेताओं के बयानों से नहीं, मतदाता के सवालों से होगा। उत्तराखंड का मतदाता यह देखेगा कि कौन दल भावनाओं की राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, जमीन और आपदा जैसे सवालों पर ठोस जवाब देता है। क्योंकि चुनाव में मुद्दा वही नहीं होता जो राजनीतिक दल तय करेंकृमुद्दा वह भी होता है जिसे जनता अपने जीवन में रोज झेलती है।
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