बुधवार, 23 सितंबर 2026

सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’

एक मीडिया सर्वे में भाजपा आगे, जमीन पर सवाल बरकरार 2027 से पहले आंकड़ों ने बढ़ाया भाजपा का आत्मविश्वास लेकिन रोजगार, पलायन और भर्ती जैसे सवाल अब भी सामने देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक सर्वेक्षणों की बाढ़ आ गई है। अधिकांश चर्चित सर्वे भाजपा को बढ़त दिखा रहे हैं। कहीं भाजपा को स्पष्ट बहुमत के करीब बताया जा रहा है तो कहीं उसे 50 से अधिक सीटों का अनुमान दिया जा रहा है। भाजपा भी इन आंकड़ों को अपने पक्ष में माहौल का प्रमाण बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सर्वे की यह चमक उत्तराखंड की जमीन पर भी उतनी ही दिखाई दे रही है? एक सर्वे में भाजपा को 54 और कांग्रेस को 14 सीटों का अनुमान लगाया गया है। वहीं दूसरे सर्वे में दोनों दलों के बीच मत-समर्थन का अंतर काफी कम बताया गया। आंकड़ों का यह अंतर खुद बता रहा है कि चुनाव से कई महीने पहले किए गए सर्वे को अंतिम राजनीतिक सच्चाई मानना जोखिम भरा है। सवाल सरकार से भी है और सर्वे करने वालों से भी। यदि भाजपा के पक्ष में इतना मजबूत जनमत है तो पहाड़ के गांवों से लेकर शहरों तक रोजगार, सरकारी भर्तियों, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में क्यों हैं? यदि सरकार की नीतियों को लेकर व्यापक संतोष है तो विपक्ष को लगातार इन मुद्दों पर सरकार को घेरने का अवसर क्यों मिल रहा है? यहां सरकार के सामने एक दूसरा पक्ष भी है। सत्ता में रहने का अर्थ केवल योजनाओं और उपलब्धियों की सूची पेश करना नहीं, बल्कि जनता के रोजमर्रा के सवालों का जवाब देना भी है। उत्तराखंड का मतदाता सड़क, रोजगार, स्कूल और अस्पताल को आंकड़ों से नहीं, अपने अनुभव से मापता है। भाजपा संगठन और चुनावी तैयारी में काफी आगे दिखाई देती है। बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने की कोशिश, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और लगातार राजनीतिक कार्यक्रम पार्टी को चुनावी मशीनरी के स्तर पर बढ़त दे सकते हैं। लेकिन संगठन की ताकत और मतदाता की संतुष्टि एक ही चीज नहीं हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास के सरकारी दावों का लाभ आम मतदाता को उतना महसूस हो रहा है, जितना सरकारी प्रचार में दिखाई देता है? भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के रोजगार से जुड़े विवाद, पहाड़ों में पलायन, बंद होते स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आपदा के बाद पुनर्निर्माण जैसे सवाल किसी सर्वे की एक पंक्ति से खत्म नहीं होते। इनका जवाब जमीन पर चाहिए। भाजपा के लिए सर्वे निश्चित रूप से राजनीतिक राहत का संदेश हैं। लेकिन यही आंकड़े पार्टी के सामने एक चुनौती भी रखते हैं। यदि चुनाव तक यही बढ़त कायम रहती है तो उसे वास्तविक मतों में बदलना होगा। टिकट वितरण, स्थानीय उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी, क्षेत्रीय समीकरण और सरकार के प्रति स्थानीय असंतोष कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस के लिए भी तस्वीर आसान नहीं है। केवल सरकार विरोधी मुद्दे गिनाने से चुनावी मुकाबला नहीं बनता। उसे संगठन, प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दों को मतदाताओं के भरोसे में बदलना होगा। राजनीतिक दल सर्वे के आंकड़ों को अपने-अपने पक्ष में पढ़ सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम कसौटी सर्वे नहीं, मतदाता है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह सर्वे की बढ़त के भरोसे सवालों को हल्का न समझे। क्योंकि सत्ता के गलियारों में लोकप्रियता का दावा और गांव की चौपाल पर जनता का अनुभवकृदोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। 2027 की लड़ाई अभी बाकी है। फिलहाल सर्वे भाजपा को आगे दिखा रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड के सामने सवालों की लंबी सूची भी खड़ी है। इन सवालों का जवाब आंकड़ों से नहीं, सरकार के काम और जनता के अनुभव से तय होगा। सर्वे चाहे जिस दिशा में इशारा करें, अंतिम सवाल यही रहेगाकृक्या सरकार के दावे मतदाता के अनुभव से भी मेल खाते हैं?

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