गुरुवार, 17 सितंबर 2026
उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान
राजधानी से बाहर निकली बीजेपी, जिलों में नए कमान संभालेंगे सेनापति
प्रदेश में विधायकों और सांसदों को भी मिल गया है बूथ स्तर का टास्क
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा आ गई ‘इलेक्शन मोड’ में
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों ने चुनावी तापमान बढ़ा दिया है। इस मुकाबले में भाजपा की सबसे स्पष्ट ताकत उसका संगठनात्मक ढांचा, सत्ता की मशीनरी से जुड़ा जनसंपर्क और बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की कोशिश है। हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि पार्टी ने चुनावी तैयारी को केवल राजधानी की बैठकों तक सीमित रखने के बजाय विधानसभा और मंडल स्तर तक फैलाना शुरू कर दिया है।
भाजपा ने 19 संगठनात्मक जिलों के प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त किए हैं। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी प्रदेश को चुनावी दृष्टि से अलग-अलग संगठनात्मक इकाइयों में सक्रिय कर रही है। इससे पहले प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ संगठन पदाधिकारियों की अगुवाई में कोर कमेटियां बनाने की योजना भी सामने आई थी। इन समितियों को चुनाव तक संगठनात्मक गतिविधियों, जनसंपर्क अभियानों और पार्टी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने हल्द्वानी की प्रदेश कार्यसमिति में कहा कि पार्टी की बूथ स्तर तक की रणनीति तैयार है। उन्होंने निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए 2027 में पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की बात कही। यानी भाजपा की चुनावी रणनीति का पहला आधार संगठन की निरंतर सक्रियता है। पार्टी चुनाव से कुछ महीने पहले कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के बजाय काफी पहले से नेटवर्क को चुनावी भूमिका में लगाने का प्रयास कर रही है।
भाजपा की दूसरी बड़ी ताकत सत्ता में होना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को चुनावी संवाद का हिस्सा बना रही है। हल्द्वानी में धामी ने चारधाम, आलवेदर रोड, पर्यटन और रोजगार को सरकार के प्रमुख कामों के रूप में सामने रखा तथा योजनाओं को घर-घर पहुंचाने पर जोर दिया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 का चुनाव मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इससे भाजपा के सामने नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक स्तर पर एक स्पष्ट राजनीतिक रेखा दिखाई देती हैकृसंगठन की कमान भट्ट के हाथों में और सरकार का चेहरा धामी। भाजपा अपने संगठनात्मक दावे को हाल के निकाय चुनावों के प्रदर्शन से जोड़ रही है। पार्टी नेतृत्व ने हल्द्वानी कार्यसमिति में 11 नगर निगमों और छह सहकारिता जिलों में जीत का उल्लेख किया। इसके अलावा अगस्त में श्रीनगर की निर्दलीय महापौर आरती भंडारी समेत 10 पार्षद भाजपा में शामिल हुए थे। इससे राज्य के सभी 11 नगर निगमों के महापौर भाजपा के साथ होने की स्थिति बनी।
यह आंकड़ा भाजपा को शहरी निकायों में अपने संगठन और राजनीतिक विस्तार को रेखांकित करने का आधार देता है। हालांकि विधानसभा चुनाव का सामाजिक और भौगोलिक समीकरण निकाय चुनावों से अलग होता है, इसलिए इन परिणामों को सीधे विधानसभा परिणाम का संकेत मानना उचित नहीं होगा। भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली की एक विशेषता यह है कि संगठन चुनाव के बीच निष्क्रिय रहने के बजाय लगातार कार्यक्रमों और अभियानों के जरिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की कोशिश करता है। प्रदेश कार्यसमिति, जिला प्रभारियों की नियुक्ति और विधानसभा स्तर की कोर कमेटियां इसी ढांचे का हिस्सा हैं। 2025 में पार्टी ने 42 प्रदेश पदाधिकारियों की टीम भी घोषित की थी, जिसे 2027 की तैयारी से जोड़ा गया था। यही निरंतरता भाजपा को चुनावी मुकाबले में अपनी राजनीतिक बात बूथ तक ले जाने का ढांचा देती है।
भाजपा के सामने सत्ता में होने की अपनी चुनौतियां भी हैं। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद, भू-कानून, मूल निवास, आपदा और विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दे विपक्ष के राजनीतिक विमर्श में बने हुए हैं। हाल के दिनों में हरिद्वार-देहरादून समेत प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर तीखी बयानबाजी भी हुई है। ऐसे में भाजपा के लिए केवल संगठन का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। उसे संगठन की ताकत को सरकार के कामकाज के जनअनुभव से जोड़ना होगा। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे के मुकाबले अपना संदेश कितनी प्रभावी ढंग से बूथ तक पहुंचा पाती है।
इस समय भाजपा की रणनीति को तीन शब्दों में समझा जा सकता हैकृ कि संगठन, सरकार और जनसंपर्क। संगठन बूथ तक, सरकार की उपलब्धियां घर-घर तक और राजनीतिक संदेश प्रदेश के हर क्षेत्र तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है। हल्द्वानी में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी वाली प्रदेश कार्यसमिति और उसके बाद सामने आई चुनावी तैयारियां इसी दिशा की कड़ी हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में संगठन की ताकत अंततः जनता के मुद्दों से ही परखी जाती है। 2027 की लड़ाई में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही रहेगा कि वह अपनी संगठनात्मक बढ़त को जनता के रोजमर्रा के सवालोंकृरोजगार, महंगाई, पलायन, विकास, कानून-व्यवस्था और पहाड़ की बुनियादी जरूरतोंकृसे किस तरह जोड़ती है। यही वह मोर्चा होगा जहां संगठन की ताकत और जनमत आमने-सामने होंगे।
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