सोमवार, 2 नवंबर 2015
रविवार, 1 नवंबर 2015
शनिवार, 31 अक्टूबर 2015
रविवार, 25 अक्टूबर 2015
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015
शुक्रवार, 11 सितंबर 2015
गुरुवार, 6 अगस्त 2015
शुक्रवार, 24 जुलाई 2015
शंकर की नगरी में शंकर की जिजीविषा बनी प्रेरणा
शंकर की नगरी में शंकर की जिजीविषा बनी प्रेरणा
रोहित डिमरी
रुद्रप्रयाग। आपदा प्रभावित क्षेत्रा केदारघाटी के शंकर लाल ने सात साल पहले अपने दोनों पैर एक दुर्घटना में गंवा दिए थे। तब से उनकी जिंदगी में दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। आर्थिक तंगी के कारण उसके परिवार की हालत बदतर हो गई। पेशे से लोहार शंकर के घर पर कई बार तो चूल्हा जलता ही नहीं था। आज यही शंकर भोले शंकर की भूमि केदारनाथ में पूरे जज्बे और जोश के साथ औजार बनाने का काम कर रहा है। केदारपुरी में काम कर रहे अन्य मजदूर और कर्मचारियों को भी इनसे प्रेरणा मिल रही है। यह सब कुछ हुआ है नेहरू पर्वतारोहण संस्थान ;निमद्ध के प्रिंसिपल कर्नल अजय कोठियाल की पहल पर। श्री कोठियाल को जब शंकर की पारिवारिक परिस्थिति और विकलांगता के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने पफौरन उसे निम में नौकरी दे दी। आज शंकर प्रतिमाह 18 हजार रुपए कमा रहा है और इस धनराशि से उसके परिवार की जरूरतें पूरी हो रही हैं। नारायणकोटी ;गुप्तकाशीद्ध निवासी शंकर लाल का औजार बनाने का पुस्तैनी काम है। औजार बनाने के साथ ही वह यात्रा सीजन में घोड़े-खच्चर संचालन और डंडी-कंडी का काम कर वह किसी तरह अपने परिवार का लालन-पालन कर रहा था। उसे कहां पता था कि असल में उसके जीवन की संघर्ष की गाथा अब शुरू होगी। सात वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में उसे अपने दोनों पैरों से हाथ धेना पड़ा। दोनों पैरो से विकलांग शंकर के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना था। इस बीच वर्ष 2012 में उसके पिता की मौत हो गई। अब पूरी जिम्मेदारी उसी के कंध्े थी। एक कमरे के घर पर बूढ़ी मां और बीवी और पांच छोटे-छोटे बच्चों का लालन-पालन करना आसान नहीं था। पैर गंवाने के बावजूद शंकर ने हार नहीं मारी और औजार बनाने का काम करता रहा। लेकिन इतनी कमाई नहीं हो रही थी कि परिवार का गुजारा हो सके। बच्चों के स्कूल का खर्चा तो दूर खाने के लाले पड़ने लगे।उसकी खराब स्थिति की जानकारी स्थानीय लोगों ने निम के प्रिंसिपल कर्नल अजय कोठियाल को दी। उन्होंने बिना देरी किए शंकर लाल को बतौर लोहार निम में नौकरी दे दी। आज शंकर केदारनाथ में औजार बनाने का काम कर रहा है। केदारनाथ में उनकी इस जिजीविषा को देखते हुए वहां रह रहे मजदूरों और कर्मचारियों में भी ऊर्जा और जोश का संचार हो रहा है। शंकर का कहना है कि वह केदारनाथ आकर खुद को ध्न्य महसूस कर रहा है। कर्नल अजय कोठियाल ने उनकी जिंदगी बदल दी है। अब उनका परिवार खुशहाल है और बच्चे स्कूल पढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कर्नल कोठियाल नेक दिल इंसान हैं। उनकी वजह से ही उन्हें जीवन में कुछ करने का मौका मिला है। शंकर लाल की पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं थी। उसे आर्थिक सहायता देने के बजाय आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता थी। इसलिए उसे नौकरी दी गई। निम में शंकर जैसे अन्य कई लोग हैं, जो भले ही शारीरिक रूप से विकलांग हो, लेकिन उनके हौंसले बुलंद हैं। उनके अंदर कुछ कर गुजरने की ललक है। शंकर को औजार बनाने का काम दिया गया है। वह अन्य लोगों को भी औजार बनाने का प्रशिक्षण देगा। इसके साथ ही केदारनाथ में भगवान शंकर के त्रिशूल भी बनाए जाएंगे।
सोमवार, 29 जून 2015
फिर खतरे में केदारनाथ ! | udaydinmaan.in
फिर खतरे में केदारनाथ ! | udaydinmaan.in

बारिश ने केदारपुरी की सुरक्षा को लेकर सोचने पर किया मजबूर
जियोलाॅजिस्टों ने दिया है नदियों के चैनलाईज का सुझाव
केदारपुरी के प्रोटेक्शन के लिए सरकार को दिखानी होगी गंभीरता
मोहित डिमरी
केदारनाथ। मानसून की पहली बारिश ने ही केदारपुरी सहित पूरी घाटी की सुरक्षा को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया है। केदारपुरी में लगातार 36 घंटे हुई बारिश के कारण मंदाकिनी नदी सहित उसकी सहायक नदियों ने रौद्र रूप धारण कर दिया। ऐसे में हालात बिगड़ गए और तीर्थयात्रियों को हेलीकाॅप्टर और पैदल मार्ग से रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थानों पर पहंुचाना पड़ा। इस घटना ने मानसून काल में होने वाली बारिश को लेकर चिंता में डाल दिया है। जियोलाॅजिस्ट केदारपुरी में भारी-भरकम निर्माण को लेकर लगातार चेता रहे हैं और नदियों के चैनलाईज कर उसके मुहानों को सुदृढ़ किए जाने का सुझाव भी दे रहे हैं। लेकिन सरकार इस पर अभी गंभीर नहीं दिखाई दे रही।
केदारनाथ में बीते 25-26 जून को हुई भारी बारिश ने दो वर्ष पूर्व आई त्रासदी की कड़वी यादों को ताजा कर दिया। यात्रियों और वहां रह रहे लोगों ने बरसात की पूरी रात भय के साए में काटी। दरअसल, केदारपुरी में सरस्वती, स्वर्गद्वारी, मधु गंगा, दूध गंगा और छीर गंगा मिलकर मंदाकिनी नदी का रूप धारण करती हैं। बारिश के कारण मंदाकिनी और सहायक नदियां उफान पर आ गई। ऐसे में केदारनाथ मंदिर के पिछले हिस्से के साथ ही दाएं और बाएं हिस्से में भूस्खलन होने लगा। केदारपुरी के आस-पास की पहाडि़यों से जलधाराएं फूटने लगी। बारिश के कारण अचानक नदियों के जलस्तर और पहाडि़यों से फूटे जलस्रोतों में वृद्धि होने से केदारपुरी पर खतरा मंडराने लगा। गनीमत यह रही कि 36 घंटे बाद सुबह के समय बारिश थम गई और इसके बाद नदियों का जलस्तर तेजी से गिरकर सामान्य स्थिति में आ गया।
इस घटना को किसी भी सूरत में नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इसे संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि आने वाले समय में मौसम विभाग ने भारी बारिश की चेतावनी दी है। चिंता की बात यह है कि केदारनाथ मंदिर के पीछे विशालकाय बोल्डर और मलबा बिखरा हुआ है। मंदाकिनी नदी के किनारे लगातार भूस्खलन की घटनाएं हो रही हैं। केदारपुरी की जमीन दलदली होने से बारिश होते हुए कटाव शुरू हो जाता है। हालांकि नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) मंदिर के पीछे मंदाकिनी नदी को मूल स्वरूप में लाने के काम मे जुटा है। इसके साथ ही तीन लेयर प्रोटेक्शन दीवाल का भी निर्माण मंदिर के पीछे होना है।
जीएसआई (जियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया) अस्सी के दशक से ही केदारपुरी के भूगर्भीय अध्ययन में जुटा था। जीएसआई ने तत्कालीन यूपी सरकार को रिपोर्ट दी थी कि केदारनाथ धाम के ऊपर पहाड़ पर स्थित चैराबाड़ी झील और ग्लेशियर भयानक तबाही की वजह बन सकते हैं। लेकिन इसे नजरअंदाज किया गया और इसका दुष्परिणाम वर्ष 2013 की त्रासदी में सामने आ चुका है। इसके साथ ही जीएसआई ने केदारनाथ त्रासदी के बाद एक रिपोर्ट में साफ कहा था कि केदारनाथ की आपदा प्राकृतिक नहीं थी, बल्कि यह मानव जनित थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में केदारपुरी को दक्षिण की ओर पुनर्वासित करने संबंधी सुझाव भी सरकार को दिए हैं। क्योंकि वर्तमान केदारपुरी भारी भरकम मलबे के कारण असुरक्षित हो गई है। रिपोर्ट में मंदाकिनी नदी के दोनों ओर तटबंध बनाने के साथ-साथ मंदाकिनी नदी के रूख को मोड़े जाने का भी प्रस्ताव सरकार को दिया गया है। मंदिर के पिछली हिस्से में पानी से बहकर आई शिला के साथ ही मंदिर को बचाने के लिए रिटेनिंग वाॅल बनाने का सुझाव सरकार को दिया गया है। रिपोर्ट में मंदाकिनी घाटी सहित केदारनाथ मंदिर और उसके आस-पास के क्षेत्रों की शीघ्र सुरक्षा करने के लिए कहा गया है।
केदारपुरी में मंदाकिनी सहित उसकी सहायक नदियों की धारा को चैनलाईज किया जाना बेहद जरूरी है। तभी केदारपुरी सुरक्षित रह सकती है। क्योंकि केदारपुरी से गौरीकुंड तक तीव्र पहाड़ी ढलान है। ऐसे में मंदाकिनी का पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। जिससे नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है। मंदाकिनी नदी का रूख भी बदलना जरूरी है। क्योंकि जून 2013 में आई आपदा के बाद से नदी की तलहटी जमीन से भी ऊंची हो गई है। इसके साथ ही केदारपुरी की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ही निर्माण कार्य होने चाहिए। भारी-भरकम निर्माण सामग्री का उपयोग नहीं होना चाहिए।
वाईएस सुंदरियाल, जियोलाॅजिस्ट
केदारपुरी को पुराने स्थान पर ही बसाया जाना चाहिए। बेस कैंप सुरक्षित नहीं है। एकमात्र सुरक्षित स्थान केदारपुरी ही है। यहां पर सालों पूर्व भवनों का निर्माण हुआ है। जिनमें से कई भवन आपदा के बावजूद सुरक्षित हैं। केदारपुरी के चारों ओर तेजी से प्रोटेक्शन के काम होने चाहिए।
उमेश पोस्ती, तीर्थ पुरोहित
फिर खतरे में केदारनाथ !
बारिश ने केदारपुरी की सुरक्षा को लेकर सोचने पर किया मजबूर
जियोलाॅजिस्टों ने दिया है नदियों के चैनलाईज का सुझाव
केदारपुरी के प्रोटेक्शन के लिए सरकार को दिखानी होगी गंभीरता
मोहित डिमरी
केदारनाथ। मानसून की पहली बारिश ने ही केदारपुरी सहित पूरी घाटी की सुरक्षा को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया है। केदारपुरी में लगातार 36 घंटे हुई बारिश के कारण मंदाकिनी नदी सहित उसकी सहायक नदियों ने रौद्र रूप धारण कर दिया। ऐसे में हालात बिगड़ गए और तीर्थयात्रियों को हेलीकाॅप्टर और पैदल मार्ग से रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थानों पर पहंुचाना पड़ा। इस घटना ने मानसून काल में होने वाली बारिश को लेकर चिंता में डाल दिया है। जियोलाॅजिस्ट केदारपुरी में भारी-भरकम निर्माण को लेकर लगातार चेता रहे हैं और नदियों के चैनलाईज कर उसके मुहानों को सुदृढ़ किए जाने का सुझाव भी दे रहे हैं। लेकिन सरकार इस पर अभी गंभीर नहीं दिखाई दे रही।
केदारनाथ में बीते 25-26 जून को हुई भारी बारिश ने दो वर्ष पूर्व आई त्रासदी की कड़वी यादों को ताजा कर दिया। यात्रियों और वहां रह रहे लोगों ने बरसात की पूरी रात भय के साए में काटी। दरअसल, केदारपुरी में सरस्वती, स्वर्गद्वारी, मधु गंगा, दूध गंगा और छीर गंगा मिलकर मंदाकिनी नदी का रूप धारण करती हैं। बारिश के कारण मंदाकिनी और सहायक नदियां उफान पर आ गई। ऐसे में केदारनाथ मंदिर के पिछले हिस्से के साथ ही दाएं और बाएं हिस्से में भूस्खलन होने लगा। केदारपुरी के आस-पास की पहाडि़यों से जलधाराएं फूटने लगी। बारिश के कारण अचानक नदियों के जलस्तर और पहाडि़यों से फूटे जलस्रोतों में वृद्धि होने से केदारपुरी पर खतरा मंडराने लगा। गनीमत यह रही कि 36 घंटे बाद सुबह के समय बारिश थम गई और इसके बाद नदियों का जलस्तर तेजी से गिरकर सामान्य स्थिति में आ गया।
इस घटना को किसी भी सूरत में नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इसे संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि आने वाले समय में मौसम विभाग ने भारी बारिश की चेतावनी दी है। चिंता की बात यह है कि केदारनाथ मंदिर के पीछे विशालकाय बोल्डर और मलबा बिखरा हुआ है। मंदाकिनी नदी के किनारे लगातार भूस्खलन की घटनाएं हो रही हैं। केदारपुरी की जमीन दलदली होने से बारिश होते हुए कटाव शुरू हो जाता है। हालांकि नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) मंदिर के पीछे मंदाकिनी नदी को मूल स्वरूप में लाने के काम मे जुटा है। इसके साथ ही तीन लेयर प्रोटेक्शन दीवाल का भी निर्माण मंदिर के पीछे होना है।
जीएसआई (जियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया) अस्सी के दशक से ही केदारपुरी के भूगर्भीय अध्ययन में जुटा था। जीएसआई ने तत्कालीन यूपी सरकार को रिपोर्ट दी थी कि केदारनाथ धाम के ऊपर पहाड़ पर स्थित चैराबाड़ी झील और ग्लेशियर भयानक तबाही की वजह बन सकते हैं। लेकिन इसे नजरअंदाज किया गया और इसका दुष्परिणाम वर्ष 2013 की त्रासदी में सामने आ चुका है। इसके साथ ही जीएसआई ने केदारनाथ त्रासदी के बाद एक रिपोर्ट में साफ कहा था कि केदारनाथ की आपदा प्राकृतिक नहीं थी, बल्कि यह मानव जनित थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में केदारपुरी को दक्षिण की ओर पुनर्वासित करने संबंधी सुझाव भी सरकार को दिए हैं। क्योंकि वर्तमान केदारपुरी भारी भरकम मलबे के कारण असुरक्षित हो गई है। रिपोर्ट में मंदाकिनी नदी के दोनों ओर तटबंध बनाने के साथ-साथ मंदाकिनी नदी के रूख को मोड़े जाने का भी प्रस्ताव सरकार को दिया गया है। मंदिर के पिछली हिस्से में पानी से बहकर आई शिला के साथ ही मंदिर को बचाने के लिए रिटेनिंग वाॅल बनाने का सुझाव सरकार को दिया गया है। रिपोर्ट में मंदाकिनी घाटी सहित केदारनाथ मंदिर और उसके आस-पास के क्षेत्रों की शीघ्र सुरक्षा करने के लिए कहा गया है।
केदारपुरी में मंदाकिनी सहित उसकी सहायक नदियों की धारा को चैनलाईज किया जाना बेहद जरूरी है। तभी केदारपुरी सुरक्षित रह सकती है। क्योंकि केदारपुरी से गौरीकुंड तक तीव्र पहाड़ी ढलान है। ऐसे में मंदाकिनी का पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। जिससे नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है। मंदाकिनी नदी का रूख भी बदलना जरूरी है। क्योंकि जून 2013 में आई आपदा के बाद से नदी की तलहटी जमीन से भी ऊंची हो गई है। इसके साथ ही केदारपुरी की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ही निर्माण कार्य होने चाहिए। भारी-भरकम निर्माण सामग्री का उपयोग नहीं होना चाहिए।
वाईएस सुंदरियाल, जियोलाॅजिस्ट
केदारपुरी को पुराने स्थान पर ही बसाया जाना चाहिए। बेस कैंप सुरक्षित नहीं है। एकमात्र सुरक्षित स्थान केदारपुरी ही है। यहां पर सालों पूर्व भवनों का निर्माण हुआ है। जिनमें से कई भवन आपदा के बावजूद सुरक्षित हैं। केदारपुरी के चारों ओर तेजी से प्रोटेक्शन के काम होने चाहिए।
उमेश पोस्ती, तीर्थ पुरोहित
शुक्रवार, 26 जून 2015
गुरुवार, 25 जून 2015
बुधवार, 24 जून 2015
मंगलवार, 23 जून 2015
रविवार, 21 जून 2015
गुरुवार, 18 जून 2015
बुधवार, 17 जून 2015
सोमवार, 8 जून 2015
रविवार, 7 जून 2015
शनिवार, 6 जून 2015
शुक्रवार, 5 जून 2015
आपदा के दौरान होटल व लाज का बिल 1.77 करोड़ रूपये का
आपदा के दौरान होटल व लाज का बिल 1.77 करोड़ रूपये का
जिला प्रशासन ने शासन को भेजी आपदा के दौरान हुये खर्चो की रिर्पोट
रुद्रप्रयाग। जिला प्रशासन ने शासन को आपदा के दौरान हुए खर्चो की पूरी रिपोर्ट भेज दी है। शासन ने यह रिपोर्ट सभी जिलों से मांगी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिले में किसी भी अधिकारी ने मीट, चिकन नहीं खाया। वहीं होटलों से दिए गए बिलों में दो करोड़ की कटौती कर होटल स्वामियों को भुगतान किया गया। प्रशासन ने शासन से जारी शासनादेश के बाद ही भुगतान किया। डीएम रुद्रप्रयाग डॉ. राघव लंगर ने शासन को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि आपदा के दौरान होटल व लाज का कुल भुगतान 1.77 करोड़ का किया गया। यह भुगतान 25 होटल व लाज को किया गया। जबकि होटलों का बिल 3.84 करोड़ रुपये था। होटल स्वामियों की सहमति लेकर भुगतान किया गया। डीएम ने कहा कि उस समय मुश्किल हालत में जो निर्णय लिए गए वह सही हैं। शासनादेश निर्गत होने के बाद ही भोजन का बिल दिया गया। वित्तीय आरोप को भी खारिज किए। डीएम ने कहा कि जो कमरा 6750 रुपये का दिखाया गया है, उसका वास्तविक भुगतान होटल स्वामी को चार हजार किया गया। हिमालय कंर्फट में सेना के अधिकारी व पायलट रहे। जिसका बिल 73 लाख था, लेकिन भुगतान पचास फीसद से भी कम कर 33 लाख किया गया। कैलाश होटल को 33 लाख का भुगतान किया गया। चारधाम होटल में पुलिस अधिकारियों के सत्यापन के बाद ही 34 लाख बिल का भुगतान किया गया। गढ़वाल मंडल विकास निगम को भी 34 लाख भुगतान किया गया। 621 कमरों के लिए 25 होटलों का प्रयोग किया। खाना का कुल व्यय 35 हजार किया गया। गत 14 फरवरी को शासन को होटल लाज के भुगतान का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे संशोधन के बाद फिर से 18 फरवरी को दुबारा प्रस्ताव भेजा गया। बिलों के भुगतान के लिए 24 फरवरी को शासनादेश जारी हुआ।
गुरुवार, 4 जून 2015
मंगलवार, 2 जून 2015
सोमवार, 1 जून 2015
रविवार, 31 मई 2015
शुक्रवार, 29 मई 2015
…और चिकन, मटन में मस्त थे अफसर
…और चिकन, मटन में मस्त थे अफसर
2013 उत्तराखंड त्रासदीः चिकन, मटन और गुलाबजामुन उड़ा रहे थे राहत कार्य में जुटे अधिकारी
उत्तराखंड में साल 2013 में आई विनाशकारी बाढ़ में फंसे लाखों लोगों को जहां पीने के लिए पानी तक नहीं मिल रहा था वहीं बाढ़ राहत कार्यों की निगरानी में लगे राज्य सरकार के अधिकारियों ने रोजाना हजारों रुपये का चिकन, मटन, दूध, पनीर और गुलाब जामुन उड़ाए.बाढ़ पीड़ित दाने दाने को मोहताज थे और ये अधिकारी होटलों में बैठकर मटन चाप, चिकन, दूध, पनीर और गुलाम जामुन खाते हुए राहत और बचाव कार्यों की निगरानी में व्यस्त थे. आधा लीटर दूध के लिए 194 रुपये और दोपहिया वाहनों के लिए डीजल की आपूर्ति, होटल में रहने के लिए रोज 7000 रुपये का क्लेम करने, एक ही व्यक्ति को दो बार राहत का भुगतान, लगातार तीन दिन तक एक ही दुकान से 1800 रेनकोट की खरीद और ईंधन खरीद के लिए एक हेलिकॉप्टर कंपनी को 98 लाख रुपये का भुगतान करने जैसी बड़ी बड़ी वित्तीय गड़बड़ियों का खुलासा एक आरटीआई आवेदन के जरिए हुआ है.उत्तराखंड के भीषण प्राकृतिक आपदा की चपेट में रहने के दौरान हुई इन कथित अनियमितताओं का संज्ञान लेते हुए राज्य के सूचना आयुक्त अनिल शर्मा ने सीबीआई जांच की सिफारिश की है. शिकायतकर्ता और नेशनल एक्शन फोरम फॉर सोशल जस्टिस के सदस्य भूपेंद्र कुमार की शिकायत पर सुनवाई करते हुए जारी 12 पन्नों के आदेश में शर्मा ने आरटीआई आवेदनों के जवाब में विभिन्न जिलों द्वारा उपलब्ध कराए गए बिलों का संज्ञान लिया है. इन आरटीआई आवेदनों में प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत कार्यो में खर्च किए गए धन का ब्यौरा मांगा गया था. भीषण बाढ़ में तीन हजार लोग मारे गए थे और बहुत से अभी भी लापता हैं.अधिकारियों द्वारा उपलब्ध करवाए गए रिकॉर्ड के मुताबिक कुछ राहत कार्य 28 दिंसबर, 2013 को शुरू होकर 16 नवंबर, 2013 को समाप्त हो गए. पिथौरागढ़ में कुछ राहत कार्य 22 जनवरी, 2013 को शुरू हुए थे यानी बाढ़ आने से छह माह पहले ही. बाढ़ 16 जून, 2013 को आयी थी. शर्मा ने अपने आदेश में कहा, ‘अपीलकर्ता द्वारा पेश रिकॉर्ड्स से आयोग प्रथम दृष्टया मानता है कि शिकायतकर्ता की अपील और अन्य दस्तावेज उत्तराखंड के मुख्य सचिव के पास इस निर्देश के साथ भेजे जाएं कि ये बातें मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाई जाएं जिससे वह इन आरोपों पर सीबीआई जांच शुरू करने पर निर्णय ले सकें.’अपनी आरटीआई याचिकाओं पर जवाब में अधिकारियों से मिले 200 से अधिक पृष्ठों के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कुमार ने एसआईसी में सुनवाई के दौरान दावा किया कि एक ओर जहां लोग खुले आसमान के नीचे भूख से बिलबिला रहे थे तो वहीं बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित रूद्रप्रयाग जिले में अधिकारियों ने नाश्ते के लिए 250 रुपये, लंच के लिए 300 रुपये और डिनर के लिए 350 रुपये के क्लेम पेश किए. यानी रोजाना 900 रुपये केवल खाने पर.इन अधिकारियों ने राहत कार्यों की निगरानी के लिए होटल प्रवास के दौरान प्रति रात्रि 6750 रुपये के दावे भी पेश किए. कुमार ने इस ‘बेहिसाब खर्च’ पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि प्रति अधिकारी प्रति दिन करीब 7000 रुपए का खर्च आया. उन्होंने सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि उन वाहनों के लिए 30 लीटर और 15 लीटर डीजल के बिल दिए गए हैं जिन पर स्कूटर, मोटरसाइकिल और तिपहिए वाहनों के नंबर थे जबकि ये वाहन पेट्रोल से चलते हैं और इनके ईंधन के टैंक इतने बड़े नहीं होते जितनी मात्रा बिलों में दर्शाई गई.कुमार ने यह दर्शाने के लिए भी रिकॉर्ड पेश किए कि चार दिनों के लिए 98 लाख रुपये का ईंधन बिल हेलीकॉप्टर कंपनी के लिए मंजूर किया गया. उन्होंने कहा, ‘ऐसे भी उदाहरण हैं जब अधिकारियों के होटल में ठहरने की अवधि 16 जून, 2013 को बाढ़ आने से पहले के रूप में दर्शाई गई है. आधा लीटर दूध की कीमत 194 रुपये दिखाई गई है जबकि बकरे का गोश्त, मुर्गी का मांस, अंडे, गुलाब जामुन जैसी चीजें भी बाजार दाम से बहुत ऊंची दरों पर खरीदी दिखाई गई हैं.’
गुरुवार, 28 मई 2015
बुधवार, 27 मई 2015
मंगलवार, 26 मई 2015
start air services from Chandigarh and Amritsar to Dehradun on urgent
New Delhi/Dehradun,Chief Minister Harish Rawat requested Union Minister for Civil aviation P. Ashok Gajapati Raju to start air services from Chandigarh and Amritsar to Dehradun on urgent basis considering the Hemkund Sahib Yatra which is to start on 1st through a letter. He submitted proposal regarding developing the Pantnagar airport as a cargo hub for export of perishable goods. Restricted service of air India from Delhi to Pantnagar to be restored . Chief Minister informed that Civil Aviation authority has adequate land for developing the jollygrant airport into MRO. More parking bays and new terminal building may be constructed for international flights at Jollygrant airport as it would income would increase the income of Airport Authority of India. CM asserted in the letter that Uttarakhand, for its beautiful tourism and pilgrimage destinations, is positioned in the international tourism map. several thousand tourists pilgrims visit the state round the year and this is one of the prominent sectors which contribute in promoting economic activities thereby creating local employment and revenue for the state. Because of the limited revenue resources, state has been categorized as special category state by the government of India. For promoting its tourism and other related activities the state government has established a civil aviation development authority and under its wings it has three airfields in the hilly region and about sixty helipads being constructed. Augmentation of air services in Uttarakhand state is need of the hour and Union government’s kind cooperation is solicited on priority basis. State government is ready to provide necessary land for the airports expansion. CM requested that 24 hours operation of Jollygrant airport is necessary, especially night parking facilities which will facilitate a morning flights from Dehradun to Delhi and other places, that is not available presently. Under the air navigation service, two airports in the state namely Dehradun and Pantnagar need up gradation to CAT-2 and CAT-I ILS facilities to ensure uninterrupted air services to these destination. The three VFR air fields in the mountain region of the state should be exempted from the licensing requirements by the DGCA to undertake commuter air line operation. The reason being limited land availability to meet the ICAO’s licensing norms. To promote the air connectivity in the state, 9-20 seater aircraft should be allowed to the unlicensed airports , the state government will extend all the infrastructural and services support for this. On the lines of Chhattisgarh government , night landing facilities at the helipads under the centeral aid to be extended to the state on the airports/helipads which are close to Indo-Tebetan and Indo-Nepal borders.
सोमवार, 25 मई 2015
शनिवार, 23 मई 2015
शुक्रवार, 22 मई 2015
बुधवार, 20 मई 2015
चारधम यात्रा ने पकड़ी ‘रफ्रतार’
अब तक एक लाख से अध्कि श्र(ालुओं ने किए बदरी-केदार के दर्शन, पर्यटक स्थलों में उमड़े सैलानी
आशुतोष डिमरी
देहरादून। वर्ष 2013 की हिमालयी त्रासदी के बाद उत्तराखंड के चारधमों में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों रफ्रतार थम सी गई थी। लेकिन इस साल उत्तराखंड के चारोंधमों के कपाट खुलते ही यह रफ्रतार ध्ीरे-ध्ीरे बढ़ने लगी और अब रफ्रतार अपनी असली रूप में दिखने लग गयी है। श्री बदरीनाथ धम, श्री केदारनाथ, गंगोत्राी और यमुनोत्राी में श्र(ालुओं और पर्यटकों का जमावड़ा लगने लगा है। इससे जहां स्थानीय लोगों को पफायदा मिल रहा है वही राज्य में पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की बढ़ती आमद से सभी के चेहरों पर रौनक लौट आयी है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2013 को आयी प्राकृतिक आपदा के बाद उत्तराखंड के चारधमों में जो जन और ध्न की हानि हुई थी और उत्तराखंड के चारधमों में आने के लिए तीर्थयात्राी और पर्यटक घबरा रहे थे। प्रदेश सरकार और मंदिर समिति के अथक प्रयासों से इस बार तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को उत्तराखंड के चारधमों और यहां के पर्यटक स्थलों को सुरक्षित बताने में सपफल रहे। यही कारण है कि इस साल तीर्थयात्रियों और पर्यटकों ने उत्तराखंड का रूख किया। इस साल श्री केदारनाथ के कपाट 24 अप्रैल और श्री बदरीनाथ के कपाट 26 अप्रैल और गंगोत्राी-यमुनोत्राी के कपाट अक्षय तृतीया को खोले गए थे। कपाट खुलते समय ही यहां तीर्थयात्रियों का हुजुम उमड़ गया था, जो उस समय से अभी तक जारी है। नित्य श्री केदारनाथ और श्री बदरीनाथ धम में तीर्थयात्रियों का भारी संख्या में आना लगातार जारी है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के मुख्य कार्याध्किारी बीडी सिंह ने बताया कि श्री बदरीनाथ धम में अभी तक अस्सी हजार से अध्कि तीर्थयात्रियों और श्री केदारनाथ में चालीस हजार से अध्कि तीर्थयात्रियों ने भगवान विष्णु और भगवान भोलेनाथ के दर्शनों का पुण्य लाभ अर्जित किया है।
ज्ञात हो कि श्री बदरीनाथ धम में अभी तक 80 हजार से अध्कि श्र(ालु बदरीनाथ धम पहुंचकर भगवान के दर्शन कर चुके हैं। चमोली के जिलाध्किारी अशोक कुमार ने बताया कि तीर्थयात्रियों की संख्या में दिनप्रतिदिन इजापफा हो रहा है और तीर्थयात्राी जिले के पर्यटक स्थलों की भी सैर कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रशासन पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को लेकर सर्तक है और संबंध्ति विभागों को आवश्यक दिशा निर्देश जारी कर दिए गए हैं। केदारनाथ मंदिर समिति के कार्याध्किारी अनिल शर्मा ने बताया कि दिन प्रतिदिन केदारनाथ में तीर्थयात्राी की संख्या बढ़ रही है और जून में और अध्कि बढ़ने की उम्मीद है। केदारनाथ आपदा के बाद यात्रा व्यवस्था को पुराने ढर्रे पर लाना सरकार व प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई थी। सरकार ने 2014 में प्रतिदिन 500 यात्रियों को ही सोनप्रयाग से केदारनाथ रवाना करने का निर्णय लिया था। केदारनाथ में पांच सौ यात्रियों के रहने व खाने की व्यवस्था की गई थी, हालांकि यह संख्या कई बार 700 तक भी पहुंची। लेकिन, इस बार प्रशासन ने यात्रियों की संख्या बढ़ाते हुए प्रतिदिन 1500 यात्रियों को सोनप्रयाग से आगे रवाना करने का निर्णय लिया। यात्रियों की संख्या प्रशासन के अनुमान से कहीं अध्कि है। इन दिनों प्रतिदिन दो हजार से लेकर 2500 यात्राी बाबा के दर्शनों को पहुंच रहे हैं। इस मामले में रूद्रप्रयाग के जिलाध्किारी डा. राघव लंघर से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यात्रियों की बढ़ रही संख्या को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। केदारनाथ, लिनचोली व अन्य पड़ाव स्थालों पर यात्रियों के रहने व खाने की व्यवस्था बढ़ाई जा रही है।
सोमवार, 18 मई 2015
शनिवार, 16 मई 2015
dinmaan
शुक्रवार, 15 मई 2015
आज भी दिलों में कसक
सीमाओं पर पहरे लगे तो मानो हिमालय में जमी बर्फ की तरह रिश्ते भी जम गए। आर्थिक तौर पर उबरने में इन्हें लंबा समय लगा, लेकिन भावनात्मक तौर पर आज भी दिलों में कसक मौजूद है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन पहुंचे तो चमोली जिले की नीति और माणा घाटी के 20 से ज्यादा गांवों में भी उम्मीद की लौ रोशन होने लगी। 55 साल पहले व्यापार के सिलसिले में बेरोकटोक तिब्बत तक आवाजाही करने वाले घाटी के लोगों के लिए भारत-चीन युद्ध के बाद सबकुछ खत्म हो गया।
सरहद के अंतिम गांव नीती में 85 साल के बुजुर्ग रणजीत राणा के लिए तिब्बत भावना से जुड़ा मुद्दा है। वह याद करते हैं कि 'वर्ष 1957 से पहले पिता के साथ वह व्यापार के लिए कई बार तिब्बत गए।' वह कहते हैं तिब्बत हमारे लिए दूसरे घर जैसा ही है। राणा को उम्मीद है कि दोनों देशों के रिश्ते सुधरे तो शायद उनके भी अच्छे दिन लौट आएं।
जोशीमठ से मलारी मार्ग पर है नीती घाटी और बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर है माणा घाटी। दोनों घाटियों के 20 से ज्यादा गांवों में भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं। वर्ष 1959 तक घाटी के अधिकतर परिवार तिब्बत जाकर व्यापार करते थे। इसके लिए दो रास्ते थे एक माणा पास और दूसरा नीती पास। माणा पास से मूसा पानी और ग्यालढुंग होते हुए पैदल तीन दिन में तिब्बत पहुंचा जाता था, जबकि नीती पास से बाड़ाहोती और तुनजनला कस्बों को पार कर दो दिन की यात्रा थी। घाटी के लोग मिश्री, भेली (गुड़ का ही एक रूप), कपड़े, राशन, दाल और मिठाई इत्यादि ले जाते थे और वहां से नमक, ऊन, घी और सोने चांदी के आभूषण लाते थे। वर्ष 1959 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो आना जाना कम हो गया व 62 के युद्ध के बाद आवागमन पूरी तरह से बंद हो गया।
नीती घाटी में गमशाली गांव के निवासी उत्तराखंड के पूर्व पर्यटन मंत्री केदार सिंह फोनिया के पिता स्व.माधो सिंह फोनिया भी इलाके व्यवसायियों में शामिल थे। केदार सिंह फोनिया याद करते हैं कि 'वर्ष 1948 में हाइस्कूल की परीक्षा के बाद मैं भी पिता के साथ तिब्बत की जाफा मंडी गया था।' वह बताते हैं कि यहां के व्यापारियों की तिब्बत के जाफा, गरतोक, बुंबा शहरों में दुकानें और मकान भी थे। फोनिया कहते हैं दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध रहेंगे तो व्यापार को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
तिब्बत की चर्चा होते ही गमशाली गांव के 98 वर्षीय बाल ंिसह चौहान के चेहरे पर आज भी चमक आ जाती है। कभी व्यापार के सिलसिले में तिब्बत जा चुके बाल सिंह कहते हैं उस दौर में हम इतने सुखी थे कि हमारे गांव के लोग सरकारी सेवा में जाना ही पसंद नहीं करते थे। नीती घाटी के बांपा गांव निवासी 95 साल के लखन ंिसह पाल को इतना सुकून है कि दोनों देशों के बीच रिश्तों की बेहतर पहल हुई है। वह कहते हैं 'मालूम नहीं पुराने दिनों की वापसी देखने के लिए मैं जीवित रहूंगा या नहीं, लेकिन इतना विश्वास है कि अच्छे दिन अवश्य लौटैंगे।'
देवेंद्र रावत
शनिवार, 9 मई 2015
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माँ वेदों की मूल चेतना
माँ गीता की वाणी-सी
माँ त्रिपिटिक के सिद्ध सुक्त-सी
लोकोक्तर कल्याणी-सी
माँ गीता की वाणी-सी
माँ त्रिपिटिक के सिद्ध सुक्त-सी
लोकोक्तर कल्याणी-सी
माँ द्वारे की तुलसी जैसी
माँ बरगद की छाया-सी
माँ कविता की सहज वेदना
महाकाव्य की काया-सी
माँ बरगद की छाया-सी
माँ कविता की सहज वेदना
महाकाव्य की काया-सी
माँ अषाढ़ की पहली वर्षा
सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि सरीखी
बगिया की अमराई-सी
सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि सरीखी
बगिया की अमराई-सी
माँ यमुना की स्याम लहर-सी
रेवा की गहराई-सी
माँ गंगा की निर्मल धारा
गोमुख की ऊँचाई-सी
रेवा की गहराई-सी
माँ गंगा की निर्मल धारा
गोमुख की ऊँचाई-सी
माँ ममता का मानसरोवर
हिमगिरि-सा विश्वास है
माँ श्रृद्धा की आदि शक्ति-सी
कावा है कैलाश है
हिमगिरि-सा विश्वास है
माँ श्रृद्धा की आदि शक्ति-सी
कावा है कैलाश है
माँ धरती की हरी दूब-सी
माँ केशर की क्यारी है
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर
माँ की छवि ही न्यारी है
माँ केशर की क्यारी है
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर
माँ की छवि ही न्यारी है
माँ धरती के धैर्य सरीखी
माँ ममता की खान है
माँ की उपमा केवल है
माँ सचमुच भगवान है।
माँ ममता की खान है
माँ की उपमा केवल है
माँ सचमुच भगवान है।
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