गुरुवार, 14 मई 2026

‘तीसरी ताकत’ 2027 का असली ‘सस्पेंस’

विस चुनाव 2027 के प्रमुख मुद्दे भाग-3 विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पहाड़ की सियासत में तीसरे मोर्चे की आहट क्रासर ---पहाड़ पर तीसरे की दस्तक, वोटकटवा या बनेगा सत्ता का सारथी ---इस विस चुनाव चलेगी बदलाव की बयार या फिर वही पुरानी राह ---बागी नेता तीसरे मोर्चे से मिले तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में 2027 के विधानसभा चुनावों की राजनीतिक तपिश अभी से महसूस होने लगी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार मुकाबला केवल हाथ और कमल के बीच नहीं है, बल्कि परदे के पीछे से सक्रिय तीसरी ताकत और निर्दलीय दिग्गजों ने बड़े दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। उत्तराखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले कई क्षेत्रीय दल वर्षों से यह दावा करते रहे हैं कि राष्ट्रीय दल पहाड़ के मूल मुद्दों को समझने में असफल रहे हैं। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी, गैरसैंण, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ी अस्मिता जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर नई राजनीतिक ताकतें सामने आती रही हैं। अब 2027 से पहल राजनैतिक दल जनता के बीच यह संदेश देने में जुटे हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उत्तराखंड की उम्मीदों को पूरा नहीं किया। यही कारण है कि क्षेत्रीय विकल्प की जमीन बनाने की कोशिश हो रही है। उत्तराखंड में कई सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार का अंतर बेहद कम रहता है। ऐसे में तीसरा मोर्चा भले सरकार न बना पाए, लेकिन वह हजारों वोट काटकर समीकरण बदल सकता है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर छोटे दलों और बागी नेताओं की गतिविधियों पर टिकी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर तीसरा मोर्चा कुछ खास क्षेत्रों जैसे कुमाऊं के पर्वतीय इलाके, गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्र या तराई की कुछ सीटों पर प्रभावी हुआ, तो सीधा असर मुख्य दलों की जीत-हार पर पड़ सकता है। उत्तराखंड में तीसरे मोर्चे की सबसे बड़ी चुनौती संगठन और संसाधनों की कमी रही है। चुनाव के समय मुद्दे तो जनता को आकर्षित करते हैं, लेकिन बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क न होने के कारण क्षेत्रीय दल अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। इसके अलावा चुनाव आते-आते कई नेता बड़े दलों में शामिल हो जाते हैं, जिससे तीसरे विकल्प की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यही कारण है कि अब तक प्रदेश में कोई भी क्षेत्रीय शक्ति स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन पाई। इस बार परिस्थितियां कुछ अलग भी नजर आ रही हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पलायन और स्थानीय अधिकारों के मुद्दे युवाओं के बीच चर्चा में हैं। यदि कोई तीसरा मोर्चा इन मुद्दों को मजबूती से उठाता है और साफ नेतृत्व प्रस्तुत करता है, तो उसे युवाओं और नाराज मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है। हालांकि राजनीति के जानकार मानते हैं कि सिर्फ भावनात्मक मुद्दों से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता अब स्थिर नेतृत्व और मजबूत संगठन भी चाहती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में टिकट वितरण के बाद असंतोष की संभावना रहती है। ऐसे में बागी नेता यदि तीसरे मोर्चे के साथ आते हैं तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। पिछले चुनावों में भी बागियों ने कई जगह मुख्य दलों का गणित बिगाड़ा था। उत्तराखंड में अभी तक तीसरा मोर्चा सत्ता तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन उसने कई बार चुनावी परिणामों को प्रभावित जरूर किया है। 2027 में भी यह फैक्टर महत्वपूर्ण रहने वाला है। यदि क्षेत्रीय दल साझा रणनीति, मजबूत चेहरा और जमीनी संगठन तैयार कर लेते हैं, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। लेकिन यदि वह केवल मुद्दों तक सीमित रहे और एकजुटता नहीं दिखा पाए, तो फिर उन पर वोट कटवा होने का आरोप और मजबूत हो जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में तीसरे मोर्चे की हलचल ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है। 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक विकल्प की तलाश का भी चुनाव बनता नजर आएगा। बाक्स चेहरों की भीड़ राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर नजर डालें तो हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में बहुजन समाज पार्टी और आप का बढ़ता प्रभाव कांग्रेस के कोर वोट बैंक में सेंध लगा रहा है। वहीं, पहाड़ की सीटों पर उत्तराखंड क्रांति दल मूल निवास और सशक्त भू-कानून के भावनात्मक मुद्दों को लेकर भाजपा के राष्ट्रवाद को चुनौती देने की तैयारी में है। पिछली बार के आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तराखंड में कई सीटें ऐसी थीं जहाँ जीत का अंतर 1000 से 2000 वोटों के बीच रहा। 2027 में वोटकटवा की भूमिका निभाने वाले प्रत्याशी निर्णायक साबित होंगे।

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