गुरुवार, 14 मई 2026
‘माटी’ और ‘मानुष’ पर सियासत
क्रासर
---आगामी विधानसभा चुनाव के रण में होगी पहाड़ का पानी और जवानी अब जमीन पर सियासत
---उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों पर पहला हक किसका सवाल 25 सालों से है सियासत में तैर रहा
---सूबे की सियासत को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे हैं अपणी जमीन-अपणो अधिकार जैसे कई अभियान
देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में इस समय राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। सूबे की राजनीति में एक बार फिर भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा चुनावी केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही पहाड़ में जमीन, पहचान और अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य गठन के 25 साल बाद भी यह सवाल जनता के बीच जिंदा है कि आखिर उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों पर पहला हक किसका होना चाहिए।
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने के मामलों में तेजी आई है। देहरादून, मसूरी, नैनीताल, )षिकेश और चारधाम मार्ग से जुड़े इलाकों में होटल, रिजार्ट और फार्म हाउस संस्कृति बढ़ने से स्थानीय लोगों के बीच अपनी जमीन और संस्कृति के खत्म होने का डर गहरा रहा है। पहाड़ के निवासियों का मानना है कि 2018 के संशोधनों के बाद बाहरी राज्यों के लोगों ने अंधाधुंध जमीनें खरीदी हैं। जनता की मांग है कि हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी कृषि भूमि की खरीद पर पूर्ण प्रतिबंध लगे। सरकार ने हाल ही में संशोधनों के जरिए सख्ती दिखाई है, लेकिन आंदोलनकारी शपथ पत्र जैसे प्रावधानों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक जमीन नहीं बचेगी, तब तक पहाड़ नहीं बचेगा।
वही प्रदेश में स्थायी निवास बनाम मूल निवास की बहस ने युवाओं को सड़कों पर ला दिया है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि 1950 को कट-आफ वर्ष माना जाए, ताकि राज्य के सीमित संसाधनों और नौकरियों पर पहला हक उन लोगों का हो जिनके पूर्वजों ने इस राज्य के लिए संघर्ष किया। यह भावनात्मक मुद्दा सीधे तौर पर राज्य के 70 विधानसभा क्षेत्रों में से पहाड़ी सीटों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। राज्य में 2026 के बाद होने वाला संभावित परिसीमन एक और बड़ी चिंता है। जनसंख्या आधारित परिसीमन से पहाड़ों की सीटें घटने और मैदानों की बढ़ने का डर है। ऐसे में भू-कानून और मूल निवास के मुद्दे पहाड़ी अस्मिता को बचाने के आखिरी हथियार के रूप में देखे जा रहे हैं।
राजनीतिक दल भी अब इन मुद्दों की संवेदनशीलता को समझ रहे हैं। सत्ता पक्ष जहां भू-कानून में संशोधन और सख्ती की बात कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार पर केवल आश्वासन देने का आरोप लगा रहा है। क्षेत्रीय दल और छात्र संगठन इसे चुनाव का सबसे बड़ा जनभावनात्मक मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 2027 का चुनाव केवल सड़क, पानी और बिजली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पहाड़ किसका? जैसे सवाल भी वोट की दिशा तय कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे को सबसे ज्यादा समर्थन युवा और महिलाएं दे रही हैं। गांव खाली होने, खेती खत्म होने और संस्कृति के कमजोर पड़ने की चिंता अब पारिवारिक चर्चा का हिस्सा बन चुकी है। सोशल मीडिया पर भी अपणी जमीन-अपणो अधिकार जैसे अभियान तेजी से चल रहे हैं।
उत्तराखंड के चुनाव अब तक दिल्ली के चेहरे और केंद्र की योजनाओं पर लड़े जाते रहे हैं। लेकिन 2027 में पहली बार लोकल का शोर सबसे तेज होगा। सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपालों तक, युवा वोटर पूछेगा कि अगर हमारी जमीन और पहचान ही नहीं रही, तो सड़कों और पुलों का हम क्या करेंगे? आने वाले विधानसभा चुनावों में यह साफ होगा कि राजनीतिक दल इन भावनाओं को केवल नारों तक सीमित रखते हैं या वास्तव में कोई ठोस नीति सामने लाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की सियासत में भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा आने वाले दिनों में और ज्यादा गरमाने वाला है।
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