शुक्रवार, 29 मई 2026

टिहरी की नथ: पहाड़ की ‘ध्याण’ के श्रृंगार का ‘गौरव’

परंपरा, सौंदर्य और पहाड़ी संस्कृति की पहचान बनी सदियों पुरानी विरासत क्रासर ---सोने की कारीगरी में झलकती पहाड़ की समृ( संस्कृति ---समय बदला लेकिन नथ का सम्मान आज भी है कायम ---नई पीढ़ी फैशन के साथ अपनी परंपरा को भी दे रही जगह देहरादून। ‘तेरी टिहरी की नथुली सुआ, सैंण-सैंण मा लश्कारी...’ पहाड़ में जब-जब इस गढ़वाली गीत की धुन कानों में पड़ती है तो पहाड़ की ध्याण के चेहरे पर पहाड़ की शान टिहरी की नथ आखों के सामने इसका दृश्य दिखता है। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की संस्कृति जितनी समृ( और रंगीन है, उतनी ही खास उसकी पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण भी हैं। इन्हीं में सबसे खास पहचान रखती है टिहरी की नथ जिसे गढ़वाल की शान कहा जाता है। पहाड़ की महिलाओं के सौंदर्य, सम्मान और पारंपरिक गौरव का प्रतीक मानी जाने वाली यह नथ आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। गढ़वाली विवाह की कल्पना टिहरी की नथ के बिना अधूरी मानी जाती है। बड़े आकार की यह सोने की नथ केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी रही है। पुराने समय में परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक सम्मान का अंदाजा भी महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली नथ से लगाया जाता था। कहा जाता है कि टिहरी रियासत के दौर में इस नथ को विशेष पहचान मिली। राजघरानों और समृ( परिवारों की महिलाएं बड़े आकार की नथ पहनती थीं, जिसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा गांव-गांव तक पहुंच गई। समय के साथ टिहरी की नथ गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान बन गई। इस नथ की खासियत इसका बड़ा गोल आकार और उसमें जड़े जाने वाले मोती व लाल-हरे नग होते हैं। पारंपरिक रूप से इसे सोने से तैयार किया जाता है और कई बार इसका वजन भी काफी अधिक होता है। शादी के दौरान दुल्हन जब पारंपरिक गढ़वाली वेशभूषा के साथ टिहरी की नथ पहनती है तो उसका रूप अलग ही दिखाई देता है। गढ़वाल में नथ केवल श्रृंगार का हिस्सा नहीं, बल्कि भावनाओं और परंपराओं से भी जुड़ी हुई है। कई परिवारों में यह पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत के रूप में सौंपी जाती है। दादी-नानी की नथ आज भी परिवारों में संभालकर रखी जाती है और विशेष अवसरों पर नई पीढ़ी उसे गर्व के साथ पहनती है। पहाड़ के लोकगीतों और लोकनृत्यों में भी टिहरी की नथ का जिक्र अक्सर सुनाई देता है। गढ़वाली गीतों में दुल्हन की सुंदरता और उसकी नथ की चमक को खास तौर पर दर्शाया जाता रहा है। समय के साथ फैशन और जीवनशैली में काफी बदलाव आया है, लेकिन टिहरी की नथ का आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ। अब युवा पीढ़ी पारंपरिक डिजाइनों के साथ हल्के और आधुनिक स्टाइल की नथ भी पसंद कर रही है। कई फैशन डिजाइनर और ज्वेलरी कलाकार भी गढ़वाली नथ को नए अंदाज में पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और उत्तराखंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी इस पारंपरिक आभूषण को नई पहचान दी है। पहाड़ी विवाहों में अब भी दुल्हन की सबसे खास पहचान उसकी बड़ी और खूबसूरत नथ ही मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कला और आभूषणों को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। टिहरी की नथ केवल एक गहना नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा है। बदलते दौर में नई पीढ़ी यदि अपनी इस विरासत को अपनाए रखेगी, तो पहाड़ की पहचान और भी मजबूत होगी। टिहरी की नथ आज भी यह एहसास कराती है कि आधुनिकता की दौड़ में भी पहाड़ अपनी परंपराओं और संस्कृति को गर्व के साथ जीवित रखे हुए है।

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