शुक्रवार, 29 मई 2026
‘नैरेटिव’ नया और ‘डीएनए’ वही पुराना
गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, मैदानी बनाम पहाड़ी राजनीति और जातीय गणित तय करेंगे चुनावी दिशा
क्रासर
---प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊं में बनेगी अलग-अलग चुनाव की रणनीति
---पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा फिर पकड़ सकता है जोर, रणनीति में जुटे दल
---पलायन, भू-कानून, मूल निवास व सीमांत जिलों में विकास पर होगा फोकस
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में इस बार केवल विकास और बेरोजगारी ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समीकरण भी सत्ता की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। राज्य गठन के बाद से ही उत्तराखंड की राजनीति गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, पहाड़ और मैदान के राजनीतिक प्रभाव और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। आगामी चुनाव में भी यही समीकरण राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र बनने लगे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल अब क्षेत्रवार रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। गढ़वाल मंडल की सीटों पर जहां राष्ट्रवाद, सड़क और चारधाम परियोजनाओं को मुद्दा बनाया जा सकता है, वहीं कुमाऊं में बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय पहचान के सवाल अधिक प्रभावी रहने की संभावना है। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से गढ़वाल और कुमाऊं का संतुलन बेहद अहम माना जाता रहा है। मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन में प्रमुख पदों पर क्षेत्रीय संतुलन साधना हर दल की मजबूरी रही है। भाजपा हो या कांग्रेस दोनों दल जानते हैं कि किसी एक क्षेत्र की उपेक्षा राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है। वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं क्षेत्र से आते हैं और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष गढ़वाल से प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं कांग्रेस भी क्षेत्रीय असंतोष को भुनाने की कोशिश में जुटी हुई है।
उत्तराखंड में हर चुनाव के दौरान पहाड़ और मैदान के बीच विकास असंतुलन का मुद्दा उठता रहा है। पहाड़ी जिलों में पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, बंद स्कूल और खराब सड़कें आज भी बड़ा मुद्दा हैं। दूसरी ओर देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में शहरीकरण, ट्रैफिक, कानून व्यवस्था और रोजगार प्रमुख चुनावी मुद्दे बनते जा रहे हैं। राजनीतिक दल अब इन दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग चुनावी नैरेटिव तैयार करने में जुटे हैं। पहाड़ में मूल निवास, भू-कानून और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दे हवा पकड़ सकते हैं, जबकि मैदान में विकास परियोजनाओं और निवेश को प्रमुखता दी जा सकती है।
राज्य की राजनीति में ठाकुर, ब्राह्मण, दलित और ओबीसी वोट बैंक का प्रभाव भी लगातार बढ़ा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जातीय संतुलन साधने के लिए टिकट वितरण से लेकर संगठन विस्तार तक सावधानी बरत रहे हैं। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की सीटों पर मुस्लिम और प्रवासी वोटरों की भूमिका भी कई सीटों पर परिणाम प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार युवा मतदाता और पहली बार वोट डालने वाली पीढ़ी भी चुनावी समीकरण बदल सकती है। सोशल मीडिया और स्थानीय मुद्दों के प्रभाव से पारंपरिक वोट बैंक में भी बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
चीन और नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे जिलों में राष्ट्रीय सुरक्षा, सड़क और संचार सुविधाएं प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा यहां राष्ट्रवाद और सीमांत विकास को प्रमुख चुनावी एजेंडा बना सकती है। वहीं कांग्रेस स्थानीय समस्याओं और पलायन को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। हालांकि उत्तराखंड की राजनीति मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय संगठन और सामाजिक मंच भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर सक्रिय समूह पहाड़ में जनभावनाओं को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह मुद्दे चुनाव तक मजबूत बने रहते हैं तो मुख्य दलों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामाजिक संतुलन की परीक्षा भी होगा। पहाड़ की नाराजगी, मैदान की अपेक्षाएं और गढ़वाल-कुमाऊं का समीकरण किस दल के पक्ष में जाएगा, यही आने वाले चुनाव की सबसे बड़ी कहानी बनने जा रही है।
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