बुधवार, 27 मई 2026

‘बेडू पाका बारामासा...’ है हर उत्तराखंडी का ‘ग्लोबल पासपोर्ट’

---जब तक पहाड़ों में पर काफल पकेंगे, तब तक गूंजेगी बेडू पाका की धुन ---पहाड़ों की शांत वादियों से निकलकर सात समंदर पार तक गूंज रहा है संगीत ---हर उत्तराखंडी को अपनी जड़ों की ओर खींच लाती है यह मिट्टी की सोंधी खुशबू ---मौसम के चक्र और लोकजीवन को समेटे इस गीत का जादू आज भी बरकरार देहरादून। मौसम बदलेंगे, पीढ़ियां बदलेंगी, लेकिन जब तक पहाड़ पर काफल पकेंगे और बेडू के पेड़ रहेंगे, तब तक बेडू पाका बारामासा, ओ नरेन काफल पाका चैता...की अमर धुन उत्तराखंड की वादियों में गूंजती रहेगी और हर उत्तराखंडी को अपनी जड़ों की याद दिलाती रहेगी। यह सिर्फ एक लोकगीत नहीं है, बल्कि दुनिया भर के किसी भी कोने में बैठे उत्तराखंडी के लिए अपनी मिट्टी से जुड़ने का ग्लोबल पासपोर्ट है। बता दें कि उत्तराखंड की पहाड़ियों में जब हवा बांज और बुरांश के जंगलों से होकर गुजरती है, तो ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं कोई धीमे स्वर में गा रहा हो कृबेडू पाको बारामासा, ओ नारैणा। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा की आवाज है, जिसने पीढ़ियों से लोगों की भावनाओं, यादों और संस्कृति को अपने सुरों में बांध रखा है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों अंचलों में लोकप्रिय बेडू पाको बारामासा उत्तराखंड का सबसे प्रसि( लोकगीत माना जाता है। इस गीत में पहाड़ की प्रृिति, प्रेम और लोकजीवन का ऐसा सुंदर मेल है, जो सुनने वाले को सीधे गांव की पगडंडियों, खेतों और पहाड़ी आंगनों तक ले जाता है। बेडू यानी जंगली अंजीर और काफल पहाड़ का प्रिय फल। गीत में बेडू के बारहों महीने पकने और काफल के चौत महीने में पकने का जिक्र केवल फलों का वर्णन नहीं, बल्कि पहाड़ के मौसम और जीवनचक्र का प्रतीक है। लोकगीत के बोल बताते हैं कि पहाड़ का आदमी प्रकृति से कितना गहरे जुड़ा हुआ था। यह गीत वर्षों तक गांवों की चौपालों, शादी-ब्याह, मेलों और लोकनृत्यों का अभिन्न हिस्सा बना रहा। ढोल-दमाऊं की थाप पर जब महिलाएं और पुरुष इस गीत पर थिरकते थे, तब पूरा गांव मानो एक परिवार बन जाता था। आज भी उत्तराखंड के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत अक्सर इसी गीत से होती है। समय बदला, गांव खाली होने लगे, पहाड़ के युवा रोजगार और शिक्षा के लिए शहरों की ओर चले गए, लेकिन बेडू पाको का जादू कभी कम नहीं हुआ। बल्कि आधुनिक दौर में यह गीत उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बन गया। देश-विदेश में बसे उत्तराखंडी जब इस गीत को सुनते हैं, तो उनके भीतर गांव, खेत, बचपन और पहाड़ की स्मृतियां जीवित हो उठती हैं। संगीत विशेषज्ञ मानते हैं कि बेडू पाको की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी है। इसमें न कोई बनावट है और न ही कृत्रिमता। गीत सीधे दिल से निकलता है और दिल तक पहुंचता है। यही कारण है कि दशकों बाद भी इसकी लोकप्रियता बरकरार है। आज के डिजिटल दौर में भी यह गीत सोशल मीडिया, यूट्यूब और सांस्कृतिक आयोजनों में नई पीढ़ी के बीच उतना ही लोकप्रिय है। कई युवा कलाकार इसे नए संगीत के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन इसकी मूल आत्मा अब भी वैसी ही है पहाड़ की मिट्टी की खुशबू से भरी हुई। बाक्स कालजयी गीत के गीतकार इस कालजयी गीत को तराशने का श्रेय बृजेंद्र लाल शाह को जाता है, जिन्होंने 1950 के दशक में इसे लिखा और संगीतब( किया था। लेकिन इसे जन-जन तक पहुंचाने वाले शख्स थे मोहन उप्रेती। मोहन उप्रेती ने इस गीत की धुन को पहली बार अल्मोड़ा के लोधिया नामक स्थान पर सुना था। इसके बाद उन्होंने इसे नया रूप दिया। कहा जाता है कि जब यह गीत पूरी तरह तैयार हुआ, तो इसे सबसे पहले प्रसि( संत नीमकरोली बाबा के सामने कैंची धाम में गाया गया था। बाबा ने इसे सुनकर आशीर्वाद दिया था कि यह गीत युगों-युगों तक अमर रहेगा। जिनेवा तक किया सफर तय बेडू पाका बारामासा ने बहुत जल्दी ही पहाड़ों की कंदराओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज की। 1950 के दशक में नई दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में एक कार्यक्रम के दौरान जब मोहन उप्रेती और उनकी टीम ने इसे गाया, तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने इस गीत की जमकर तारीफ की। इसके बाद इस धुन को सेना के कुमाऊं रेजीमेंट के बैंड में शामिल किया गया। आज भी जब सेना का बैंड इस धुन को बजाता है, तो जवानों का जोश दोगुना हो जाता है। जिनेवा के एक अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोह में भी इस गीत ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

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