बुधवार, 27 मई 2026
पहाड़ की ‘खोली’ अब है ‘खामोश’
कभी यही थी जिंदगी की सबसे गर्म पनाह,पलायन के ग्रहण से आज खोलिया सिसक रही
पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बनी पहाड़ की खोली केवल एक कमरा नहीं गांव की थी आत्मा
रिश्तों की गर्माहट और संघर्ष भरे जीवन की सबसे सजीव कहानी यही से होती थी शुरू
देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक घरों में खोली का मतलब सिर्फ एक दरवाजा नहीं होता। यह पत्थरों को तराशकर, देवदार और टून की लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी से सजा एक ऐसा भव्य प्रवेश द्वार होता है, जो घर के वैभव और संस्कृति को दर्शाता है। इस घर की खोली पर भी देवी-देवताओं, शेर, हाथी और लताओं की इतनी सुंदर नक्काशी थी कि जो भी वहां से गुजरता, एक पल को ठहर जाता।
पहाड़ की खोली केवल रहने की जगह नहीं थी, बल्कि संघर्ष और सादगी की सबसे बड़ी पहचान थी। खेतों के किनारे बनी छोटी-छोटी खोलियों में किसान दिनभर खेती करते, पशुओं की देखभाल करते और रात को वहीं चूल्हे पर मंडुवे की रोटी और गहत की दाल बनती थी।पहले पहाड़ की हर ढलान पर कोई न कोई खोली दिख जाती थी। कहीं घास काटने वाली महिलाओं का विश्राम स्थल, कहीं चरवाहों का ठिकाना और कहीं खेतों की रखवाली करती बुजुर्ग आंखों की आखिरी उम्मीद। लेकिन अब समय बदल गया है।
पलायन ने पहाड़ की खोलियों की रौनक भी छीन ली है। जो खोली कभी धुएं और लोगों की आवाजों से जीवित रहती थी, वहां अब मकड़ियों के जाले हैं। कई खोलियां बारिश और बर्फबारी में टूट चुकी हैं। कुछ पत्थरों के ढेर में बदल गईं तो कुछ जंगल में गुम हो गईं।आधुनिकता के इस दौर में सीमेंट के बड़े घर बन गए, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं रहा जो एक छोटी सी खोली में हुआ करता था। खोली में जगह भले कम होती थी, मगर रिश्तों में दूरी नहीं होती थी। वहां मोबाइल नेटवर्क नहीं था, लेकिन दिलों का संपर्क हमेशा मजबूत रहता था।
गांव के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि खोली केवल दीवारों का ढांचा नहीं थी, बल्कि पहाड़ के आत्मनिर्भर जीवन की पहचान थी। वहीं से खेती चलती थी, वहीं लोकगीत जन्म लेते थे और वहीं पहाड़ का असली जीवन बसता था। आज जब पहाड़ के गांव वीरान हो रहे हैं, तब टूटती हुई खोलियां मानो यह सवाल पूछ रही हैं कि क्या विकास की दौड़ में हमने अपनी जड़ों को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आज पहाड़ की हवाएं जब उस बंद पड़े घर के झरोखों से गुजरती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वह खोली सिसक रही हो। वह आज भी इंतजार कर रही है कि कभी कोई त्योहार आएगा, कोई प्रवासी बेटा वापस लौटेगा। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज ऐसी हजारों खोलियां वीरान पड़ी हैं। यह सिर्फ खाली मकान नहीं हैं, बल्कि पहाड़ की लोक-कला और समृ( इतिहास के वह मूक गवाह हैं, जो पलायन के इस दौर में अपनी पहचान बचाने की गुहार लगा रहे हैं। शायद आने वाले समय में पहाड़ की खोली केवल कहानियों, लोकगीतों और पुरानी तस्वीरों में ही बचकर रह जाए।
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