गुरुवार, 14 मई 2026
दावों की ‘चकाचौंध’ में खो गया ‘विकास’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-7
उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव 2027 में विकास बनेगा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
क्रासर
---उत्तराखंड राज्य के विकास का एक बड़ा और कड़वा सच
---स्किल के दावों के बीच खाली हाथ खड़े हैं पहाड़ के युवा
---सुविधाओं की कसौटी पर सरकार को परखेंगे पहाड़ के वोटर
देहरादून। राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के करीब हैं, लेकिन आज भी पहाड़ के लोग सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उत्तराखंड के विकास का एक कड़वा सच यह है कि विकास का सारा केंद्र देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर तक सिमट कर रह गया है। आज भी दूरस्थ जिलों में रेफरल सेंटर बने अस्पताल और शिक्षकों की कमी से जूझते स्कूल विकास के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही एक बार फिर विकास को लेकर बहस शुरू हो गई है और आगामी चुनाव में यह सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर सकता है।
राजनीतिक दल अपने-अपने विकास के दावे कर रहे हैं, लेकिन जनता अब आंकड़ों से ज्यादा जमीनी हकीकत देखना चाहती है। गांव खाली हो रहे हैं, युवाओं का पलायन जारी है और पहाड़ की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर उत्तराखंड का विकास किस दिशा में जा रहा है?
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पलायन आज भी सबसे गंभीर समस्या बना हुआ है। हजारों गांव आंशिक या पूर्ण रूप से खाली हो चुके हैं। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण युवा शहरों की ओर जा रहे हैं। गांवों में केवल बुजुर्ग और महिलाएं बची हैं। चुनावी सभाओं में राजनीतिक दल रोजगार सृजन और स्थानीय उद्योगों की बात तो करते हैं, लेकिन जमीन पर हालात अब भी चिंताजनक हैं। पहाड़ के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर राज्य बनने के बाद भी रोजगार के लिए युवाओं को दिल्ली, चंडीगढ़ और देहरादून क्यों जाना पड़ रहा है? सरकारें सड़क निर्माण और कनेक्टिविटी को अपनी उपलब्धि बताती रही हैं, लेकिन कई दूरस्थ गांव आज भी बेहतर सड़क सुविधा से वंचित हैं। बरसात में सड़कें टूट जाती हैं और कई गांवों का संपर्क कट जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चुनावी बहस के केंद्र में है। पहाड़ी जिलों में डाक्टरों और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम के सहारे चल रहे हैं। गंभीर मरीजों को घंटों सफर कर बड़े शहरों तक पहुंचना पड़ता है।
सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या और शिक्षकों की कमी भी बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। कई स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों की कमी के कारण युवाओं को राज्य से बाहर जाना पड़ता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती घोटालों ने युवाओं में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ाई है। बेरोजगार युवा अब चुनाव में जवाब मांगने की तैयारी में हैं। सरकारें चारधाम यात्रा, धार्मिक कारिडोर और पर्यटन परियोजनाओं को विकास का चेहरा बता रही हैं। केदारनाथ, बदरीनाथ और अन्य धार्मिक स्थलों पर बड़े स्तर पर निर्माण कार्य हुए हैं। लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या विकास केवल पर्यटन केंद्रों तक सीमित रह गया है? स्थानीय लोग चाहते हैं कि पर्यटन से गांवों को भी सीधा लाभ मिले, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले और पारंपरिक संस्कृति को भी संरक्षण मिले। विकास की बहस के साथ भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है। पहाड़ में जमीनों की खरीद और बाहरी निवेश को लेकर लोगों में चिंता है। कई सामाजिक संगठन मजबूत भू-कानून की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक दल इस मुद्दे को विकास और जनसंख्या संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव के करीब आते-आते यह मुद्दा और अधिक गर्माएगा। राज्य में विकास को लेकर सबसे बड़ा आरोप क्षेत्रीय असंतुलन का है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और हल्द्वानी जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ, जबकि कई पहाड़ी जिले अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विपक्ष सरकार पर मैदान केंद्रित विकास का आरोप लगा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का दावा है कि दूरस्थ क्षेत्रों तक योजनाएं पहुंचाई जा रही हैं।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 के चुनाव में केवल हिंदुत्व या राष्ट्रीय मुद्दे नहीं, बल्कि स्थानीय विकास, रोजगार, पलायन, भू-कानून और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका निभाएंगे। पहाड़ की खामोश होती बस्तियां, खाली होते खेत और नौकरी की तलाश में भटकता युवा आने वाले चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं।
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