बुधवार, 27 मई 2026
‘देवी’ की सुरक्षा पर दल ‘मौन’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-17
अंकिता भंडारी केस से लेकर 33 प्रतिशत आरक्षण तक बनेगा चुनावी मुद्दा
---महिलाओं के लिए सुरक्षा और सम्मान बड़ा सवाल
---नारी शक्ति को साधने में जुट गए हैं राजनीतिक दल
---साइबर अपराध व छेड़छाड़ के मामलों पर बढ़ी चिंता
---महिला भागीदारी और सुरक्षा बड़ा राजनीतिक फैक्टर
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात धीरे-धीरे सजने लगी है। राज्य में नारी शक्ति को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों महिला वोट बैंक को साधने की तैयारी में जुट गई हैं। हाल की रिपोर्टों में यह सामने आया है कि 2027 चुनाव में महिला भागीदारी और सुरक्षा बड़ा राजनीतिक फैक्टर बन सकता है।
पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच राज्य आंदोलन से लेकर अर्थव्यवस्था को संभालने तक में महिलाओं की भूमिका अग्रणी रही है। हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम और 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लेकर हुई तीखी बहस ने यह साफ कर दिया है कि इस बार कोई भी दल आधी आबादी को हल्के में लेने का जोखिम नहीं उठा सकता।
महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं है। पहाड़ की महिलाओं के सामने आज भी सुनसान सड़कें, कमजोर परिवहन व्यवस्था, रात में पुलिस गश्त की कमी और साइबर ठगी जैसी नई चुनौतियां मौजूद हैं। पर्वतीय जिलों में कई गांव ऐसे हैं जहां शाम ढलते ही महिलाओं की आवाजाही लगभग बंद हो जाती है। कालेज जाने वाली छात्राओं और नौकरीपेशा महिलाओं के बीच भी सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
उत्तराखंड पुलिस के आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि राज्य में अपहरण और अन्य अपराधों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जबकि कुछ गंभीर अपराधों में कमी भी बताई गई है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अपराध कम नहीं हुए, बल्कि कई मामलों में शिकायतें दर्ज ही नहीं हो पातीं। राजनीतिक दल भी अब महिला सुरक्षा को लेकर अपने-अपने एजेंडे तैयार कर रहे हैं। भाजपा महिला हेल्पलाइन, महिला डेस्क और सुरक्षा अभियानों को अपनी उपलब्धि बताने में जुटी है, जबकि कांग्रेस महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षा कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन को बड़ा मुद्दा बना रही है।
विपक्षी दल विशेषकर कांग्रेस कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार को लगातार घेर रहे हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड की गूंज आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों और मैदानों में शांत नहीं हुई है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के ग्राफ में बढ़ोतरी हुई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार केवल नारी वंदन जैसे नारों के पीछे अपनी कमियों को छिपा रही है। विपक्ष का सीधे तौर पर सवाल है कि पर्यटन और होमस्टे नीति के तहत दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाली बेटियों की सुरक्षा के लिए धरातल पर क्या ठोस कदम उठाए गए हैं? दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और सत्तारूढ़ भाजपा इस मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। सरकार का दावा है कि उन्होंने महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में महिला मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों से प्रभावित नहीं होगी। रोजगार, सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान जैसे मुद्दों पर ठोस जवाब मांगने वाली महिला वोटर 2027 में चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। खासकर पहाड़ की महिलाएं, जो जल, जंगल और जमीन से लेकर परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठाती हैं, अब राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षित माहौल दोनों चाहती हैं।
सोशल मीडिया के दौर में महिला सुरक्षा का मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। साइबर स्टाकिंग, फर्जी प्रोफाइल और आनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों ने युवतियों और छात्राओं की चिंता बढ़ाई है। जैसे-जैसे 2027 का चुनावी दंगल करीब आएगा, अंकिता भंडारी मामले का राजनीतिक असर, महिला आरक्षण बिल को लागू करने की समयसीमा और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा के इंतजाम ही यह तय करेंगे कि देवभूमि की मातृशक्ति किस दल के सिर पर जीत का सेहरा बांधती है। फिलहाल, महिला सुरक्षा का यह मुद्दा केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी का मुख्य केंद्र बन चुका है।
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