बुधवार, 27 मई 2026
पहाड़ की ‘खामोशी’ में सुलग रहा ‘असंतोष’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-18
उत्तराखंड में बढ़ता असंतोष, 2027 में बदल सकता है सियासत का चेहरा
---रोजगार की आस में भटकता पहाड़ का युवा, खाली होता पहाड़
---महंगाई की मार और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर फूटेगा गुस्सा
---उत्तराखंड में पहाड़ से मैदान तक सुलग रहे हैं बुनियादी सवाल
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी पारा धीरे-धीरे बढ़ने लगा है। इस बार चुनावी मैदान में सबसे बड़ा मुद्दा आमजन का बढ़ता असंतोष बन सकता है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जनता के बीच बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और विकास के असमान वितरण को लेकर नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है।
राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी पहाड़ के हजारों गांव आज बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांवों से लगातार हो रहा पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है, जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब झाड़ियां उग रही हैं। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है और कई गांवों में ताले लगे मकान राज्य की हकीकत बयां कर रहे हैं।
युवाओं के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर दिखाई दे रहा है। पिछले वर्षों में सामने आए भर्ती घोटालों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं में यह भावना गहराती जा रही है कि मेहनत से ज्यादा सिस्टम की पहुंच मायने रखती है। यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक युवाओं का असंतोष लगातार दिखाई दे रहा है।
महंगाई भी आम आदमी की कमर तोड़ रही है। रसोई गैस, बिजली, पेट्रोल और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पहाड़ में आज भी चिंता का विषय बनी हुई है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डाक्टरों और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। गंभीर मरीजों को आज भी इलाज के लिए देहरादून, हल्द्वानी या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार जनता केवल घोषणाओं और नारों से प्रभावित नहीं होगी। लोग जमीन पर बदलाव देखना चाहते हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहेंगे। विपक्ष भी सरकार को इन्हीं मुद्दों पर घेरने की तैयारी में जुटा है। हालांकि सत्ताधारी दल विकास कार्यों, सड़क परियोजनाओं, चारधाम यात्रा, पर्यटन और निवेश को अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रख रहा है। लेकिन गांवों और कस्बों में बढ़ती नाराजगी यह संकेत दे रही है कि जनता अब विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच तुलना करने लगी है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का दावा है कि जनता इस बार भाजपा की नीतियों से पूरी तरह ऊब चुकी है और विकल्प की तलाश में है। वहीं, भाजपा संगठन इस बात से बेफिक्र है और उसका मानना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कड़े फैसले और बुनियादी ढांचे का विकास उन्हें सत्ता विरोधी लहर से बचा ले जाएंगे। जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि सूबे में नौकरशाही आम लोगों और जनप्रतिनिधियों पर हावी है। छोटे-छोटे कामों के लिए जनता को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा भले ही सतह पर न दिखे, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती से लोग खफा हैं।
2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह उस आम आदमी की उम्मीदों और नाराजगी का चुनाव भी बन सकता है जो वर्षों से बेहतर उत्तराखंड का सपना देख रहा है। अगर जनता का यह असंतोष आने वाले समय में और गहराया, तो यह चुनावी नतीजों की दिशा बदलने की ताकत भी रखेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल चेहरों या दावों पर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जन-सरोकारों और बुनियादी मुद्दों पर लड़ा जाएगा।
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प्रदेश के युवाओं में है निराशा
उत्तराखंड के पहाड़ों से सेना में जाने की एक समृ( परंपरा रही है। केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना को लेकर यहां के युवाओं में जो असमंजस और गुस्सा था, वह अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। इसके अलावा राज्य सेवा परीक्षाओं में पेपर लीक के पुराने जख्म और स्थायी नौकरियों की कमी ने पढ़े-लिखे युवाओं को निराश किया है। मैदान से लेकर पहाड़ तक रोजगार आज भी सबसे बड़ा सुलगता हुआ मुद्दा है।
आमजन के पहचान की लड़ाई
पिछले कुछ समय से उत्तराखंड में सख्त भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर जनता सड़कों पर उतरी है। पहाड़ों में बाहरी लोगों द्वारा धड़ाधड़ जमीनें खरीदने और स्थानीय लोगों के अधिकारों के सीमित होने की आशंका ने एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा किया है। जनता में यह धारणा बलवती हो रही है कि सरकारें उनकी जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने में ढुलमुल रवैया अपना रही हैं।
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