रविवार, 31 मई 2026
‘होमस्टे’ से खंडहरों में लौटी ‘जिंदगी’
---पलायन के जख्मों पर मरहम लगा रही पहाड़ की विरासत
---सूबे पारंपरिक घर अब सैलानियों के संग रच रहे नई जिंदगी
---सैलानियों को भा रहा है पहाड़ की संस्कृति का यह अनूठा रंग
देहरादून। पत्थरों की दीवारें, लकड़ी की नक्काशीदार चौखट, स्लेट की छत, आंगन में रखी पीतल की गागर, और चूल्हे से उठती लकड़ी की खुशबू। उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी यह घर केवल मकान नहीं होते थे, बल्कि पीढ़ियों की यादों, संस्कारों और रिश्तों की जीवित पहचान होते थे। समय बदला, पलायन बढ़ा और धीरे-धीरे यह घर वीरान होने लगे। कई गांवों में ताले लटक गए, आंगनों में घास उग आई और कभी बच्चों की आवाजों से गूंजने वाले घर खामोश हो गए। लेकिन अब पहाड़ की इन्हीं खामोश दीवारों में फिर से जिंदगी लौटने लगी है। पुराने पारंपरिक घर अब होमस्टे बनकर नई पहचान हासिल कर रहे हैं। यह केवल पर्यटन का कारोबार नहीं, बल्कि पहाड़ की विरासत को बचाने की एक भावनात्मक कोशिश बनती जा रही है।
गढ़वाल और कुमाऊं के कई गांवों में लोग अपने पुश्तैनी घरों को आधुनिक सुविधाओं के साथ सजा रहे हैं, लेकिन उनकी आत्मा को वैसा ही रहने दिया गया है। कहीं पुरानी लकड़ी की खिड़कियां आज भी जस की तस हैं, तो कहीं दादी के समय का चूल्हा आज भी पर्यटकों को पहाड़ की असली जिंदगी से रूबरू करा रहा है। पहाड़ छोड़कर शहरों में बस चुके कई युवा अब अपने गांव लौट रहे हैं। जिन घरों में कभी बुजुर्ग अकेले रह गए थे, वहां अब देश-विदेश से आने वाले पर्यटक पहाड़ी संस्कृति को महसूस करने पहुंच रहे हैं। सुबह तांबे के लोटे में पानी, खेतों की पगडंडियां, मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर और लोकगीतों की मधुर आवाज अब होमस्टे का हिस्सा बन चुकी है।
दरअसल, होमस्टे केवल कमाई का जरिया नहीं है। यह उस टूटते रिश्ते को जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है, जो वर्षों से पहाड़ और उसके लोगों के बीच कमजोर पड़ता जा रहा था, जिन घरों को लोग खंडहर समझने लगे थे, वह आज गांव की पहचान बन रहे हैं। कई गांवों में महिलाएं इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी हैं। वह पर्यटकों को स्थानीय भोजन परोस रही हैं, लोककथाएं सुना रही हैं और हस्तशिल्प से जुड़ी चीजें बेचकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इससे गांवों की अर्थव्यवस्था में भी नई जान आ रही है।
हालांकि इस बदलाव के बीच एक चिंता भी है। कुछ जगहों पर आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक वास्तुकला और पहाड़ी संस्कृति को नुकसान पहुंचने लगा है। सीमेंट और चमक-दमक के बीच पुराने घरों की असली आत्मा खोने का डर भी लोगों को सताने लगा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि होमस्टे माडल को स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण के अनुरूप विकसित किया जाए, तभी यह पहाड़ की विरासत को सही मायनों में बचा पाएगा।
पहाड़ के इन पुराने घरों में केवल पत्थर और लकड़ी नहीं बसती, बल्कि वहां पुरखों की यादें, त्योहारों की खुशबू, रिश्तों की गर्माहट और उस मिट्टी की आत्मा रहती है, जिसने पीढ़ियों को पाला है। शायद यही कारण है कि जब कोई पर्यटक इन घरों में ठहरता है, तो उसे होटल जैसा एहसास नहीं होता, बल्कि वह खुद को किसी अपने गांव का मेहमान महसूस करता है। आज जब पहाड़ लगातार पलायन और आधुनिकता की मार झेल रहा है, तब यह होमस्टे केवल पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि उम्मीद की नई रोशनी बनकर उभर रहे हैं। ऐसा लगता है मानो वर्षों से बंद पड़े पहाड़ी घर फिर से कह रहे हों...हम अभी जिंदा हैं और हमारी विरासत अभी बाकी है।
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