बुधवार, 27 मई 2026

-पहाडी थाली का ‘देसी सुपरफूड’

पहाड़ में स्वाद और सेहत का खजाना है कंडाली का साग ---चुभन में छिपा स्वाद और पहाड़ की शान है साग ---जंगल से रसोई तक, कंडाली की अनोखी कहानी ---पर्यटकों को भाता है ‘कंडाली के साग’ का स्वाद देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में कंडाली का नाम सुनते ही कई लोगों को बचपन की चुभन याद आ जाती है। जंगलों और खेतों के किनारे उगने वाली यह पौधा छूते ही शरीर में जलन पैदा कर देता है, लेकिन यही कंडाली जब पहाड़ी रसोई में पकती है तो स्वाद और सेहत का अनमोल खजाना बन जाती है। पहाड़ की पारंपरिक थाली में कंडाली का साग केवल भोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और पहाड़ी जीवनशैली की पहचान माना जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में एक बड़ी प्रसि( कहावत हैकृजो कंडाली से डरा, उसने पहाड़ का स्वाद नहीं चखा। कुमाऊं और गढ़वाल में कंडाली हर पहाड़ी रास्ते, खेत की मेड़ और गधेरों के पास बहुतायत में उगती है। इसकी पत्तियों और डंठल पर छोटे-छोटे सुई जैसे कांटे होते हैं, जिनमें फार्मिक एसिड होता है। अगर यह शरीर से छू जाए तो तेज झनझनाहट और खुजली होती है। लेकिन पहाड़ी महिलाओं के पास इस कांटेदार चुनौती को एक बेहतरीन पकवान में बदलने का हुनर पीढ़ियों से चला आ रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के गांवों में आज भी कंडाली का साग बड़े चाव से बनाया जाता है। पुराने समय में जब बाजार और आधुनिक सब्जियां गांवों तक नहीं पहुंचती थीं, तब लोग जंगलों और खेतों से मिलने वाली प्राकृतिक वनस्पतियों पर निर्भर रहते थे। कंडाली का साग उन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में से एक है, जिसने पीढ़ियों तक पहाड़ के लोगों को पोषण दिया। कंडाली को तोड़ना भी किसी कला से कम नहीं माना जाता। इसे तोड़ते समय हाथों में जलन और चुभन होती है, इसलिए लोग विशेष सावधानी बरतते हैं। गांव की महिलाएं और बुजुर्ग इसे दस्ताने या लकड़ी की मदद से इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इसे अच्छी तरह उबालकर और मसालों के साथ पकाकर स्वादिष्ट साग तैयार किया जाता है। सबसे आखिरी और मुख्य कदम है तड़का। सरसों के तेल में जखिया और सूखी लाल मिर्च का छौंक लगाया जाता है। जखिया का कड़कड़ाना कंडाली के साग को उसका असली पहाड़ी मिजाज देता है। कई जगह इसे मंडुवे की रोटी या भात के साथ परोसा जाता है। आयुर्वेद में भी कंडाली को बेहद गुणकारी माना गया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह शरीर को गर्माहट देने के साथ-साथ कई बीमारियों में लाभ पहुंचाती है। पहाड़ के बुजुर्ग आज भी इसे प्राकृतिक औषधि के रूप में देखते हैं। बदलते दौर में अब शहरों के लोग और पर्यटक भी कंडाली के साग की ओर आकर्षित हो रहे हैं। कई होटल और होमस्टे इसे पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन के रूप में अपने मेन्यू में शामिल कर रहे हैं। आज जब दुनिया आर्गेनिक और सुपरफूड के पीछे भाग रही है। उत्तराखंड के गांवों में सदियों से मौजूद यह कंडाली अब बड़े शहरों के फाइव-स्टार होटलों के मेन्यू में नेटल सूप और सिप के नाम से जगह बना रही है। लेकिन जो स्वाद पहाड़ की ठंडी हवाओं के बीच लोहे की कड़ाही से सीधे थाली में आए कंडाली के साग में है उसकी तुलना दुनिया के किसी शेफ के व्यंजन से नहीं की जा सकती।

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